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Showing posts from July, 2024

बदरुद्दीन से जॉनी वाकर होने का सफरW

 "इस शराबी को उठाकर बाहर फेंक दो।" गुरूदत्त जी ने नवकेतन फिल्म्स के स्टाफ से कहा। और वाकई में उस शराबी को बाहर कर दिया गया। हालांकि वो कई शराबी नहीं था। वो थे बदरुद्दीन जमालुद्दीन काज़ी। जो उस वक्त तक जॉनी वॉकर नहीं बने थे। क्या था वो किस्सा? चलिए, जानते हैं। ये तो हम सभी जानते हैं कि बलराज साहनी जी ने एक दिन बदरुद्दीन काज़ी को बस में देखा था। उन दिनों बदरुद्दीन बस कंडक्टर हुआ करते थे। और टिकट बनाते वक्त वो तरह-तरह की आवाज़ें निकालकर लोगों का मनोरंजन करते थे। उनका वही अंदाज़ बलराज साहनी जी को पसंद आ गया। एक दिन बलराज साहनी बदरुद्दीन को अपने साथ लेकर पहुंच गए नवकेतन फिल्म्स के ऑफिस। वहां उन्होंने गुरूदत्त की ओर इशारा करते हुए बदरुद्दीन से कहा,"देखो, वो फिल्म का डायरेक्टर है। उसका नाम गुरूदत्त है। अगर तुमने उसे पटा लिया तो तुम्हारा काम बन गया समझो।" बदरुद्दीन ने सोचा कि वो ऐसा क्या करें जिससे ये डायरेक्टर खुश हो जाए। वो फिल्मों में काम तो करना ही चाहते थे। चंद फिल्मों में वो क्राउड का हिस्सा बन भी चुके थे। लेकिन अब तो चांस था कि उन्हें फिल्म में कोई रोल मिल जाए। बदरुद...

मन्ना डे का साक्षात्कार

 ना तो कारवां की तलाश है" में कितनी बार आया था "इश्क़" और क्यों थे रफी साहेब श्रेष्ठतम गायक जानिए मन्ना डे जी से ------------------------------------------------------ कोई दस बारह साल पुरानी बात है , मैनें  बंगलौर में मन्ना डे जी से उनके निवास पर फिल्म संगीत पर  लंबी बात की थी । कई बातें उनसे जानी जैसे किसी  गीत की लोकप्रियता और उसके कालजई होने के पीछे कौन कौन से तत्व सबसे अहम भूमिका निभाते हैं । हिंदी फिल्म संगीत में आपकी दृष्टि से कौन हैं श्रेष्ठ गायक । उनके गाए  कई फिल्मी गीतों पर विस्तार से बात हुई  और उसी क्रम में " बरसात की रात " मशहूर कव्वाली "ना  तो कारवां  की तलाश है" पर भी कुछ सवाल पूछे थे जिसकी कल इस लेख के पहले भाग में पूरे 12 मिनट की कव्वाली के एक एक बंद  की विस्तृत विवेचना  का प्रयास किया था है मैनें। हालांकि लेख बड़ा हो जाने के कारण कम लोगों ने उसे पढ़ा । आज इस लेख के दूसरे भाग में  जानिए  इस कव्वाली से जुड़ी कुछ और रोचक बातें .... (ये बातचीत के सिर्फ कुछ अंश है ) प्रश्न : किसी फिल्मी गीत की लोकप्रियता और कालजई...

नन्दा ने की मनोजकुमार की मदद किस्सा tV से साभार

 मनोज कुमार जी ने कई हीरोइनों से मदद करने मांगी थी। लेकिन किसी ने मदद नहीं की। तब एक हीरोइन उनके लिए आगे आई थी। कौन थी वो हीरोइन? चलिए, मनोज कुमार जी के जन्मदिन के मौके पर ये कहानी भी जानते हैं। मनोज कुमार बॉलीवुड के उन सितारों में से एक रहे हैं जिन्होंने अपनी मेहनत के दम पर अपना मुकाम बॉलीवुड में बनाया है। अपनी एक्टिंग स्किल्स से मनोज कुमार ने भारत कुमार का खिताब हासिल किया। मनोज कुमार ना केवल एक शानदार अभिनेता हैं। बल्कि एक ज़बरदस्त इंसान भी हैं। फिल्म इंडस्ट्री के जानकार लोग कहते हैं कि मनोज कुमार बहुत बड़े दिल वाले हैं। जब वो फिल्म इंडस्ट्री में एक्टिव थे तो लोगों की खूब मदद भी किया करते थे। मगर एक वक्त ऐसा भी आया था जब मनोज कुमार को खुद भी मदद की ज़रूरत पड़ी थी। ऐसे में अभिनेत्री नंदा उनकी मदद के लिए आगे आई थी। ये कहानी कई साल पुरानी है। बात मनोज कुमार की फिल्म शोर की मेकिंग के दौरान की है। दरअसल, फिल्म की कहानी के मुताबिक फिल्म शुरू होने के कुछ ही देर बाद हीरोइन की मौत हो जानी थी। कोई भी हीरोइन ये रोल करने के लिए तैयार नहीं थी। मनोज कुमार ने कई अभिनेत्रियों से बात की। लेकिन क...

किशोर दा गोल्डन एरा से साभार

 जावेद अख्तर   साहब ने बताया कि जब किशोर दा ने यह गाना गाया, तो वे हैरान रह गए। उन्होंने कहा, तब मैंने जाना कि किशोर कुमार आखिर किशोर कुमार ही है। फिल्म ‘सागर’ में कमल हसन, डिंपल कपाड़िया और ऋषि कपूर लीड रोल में थे। ऋषि कपूर के लिए किशोर कुमार और कमल हसन के लिए बालासुब्रमण्यम गा रहे थे। 'सागर' फिल्म के गाने को रिकाॅर्ड करने से पहले किशोर दा को हार्ट अटैक आया था। किशोर कुमार हिंदी सिनेमा के ऐसे गायक थे, जिनके हुनर की कोई सीमा नहीं थी। उन्होंने गायकी के साथ एक्टिंग की दुनिया में भी अपनी चमक बिखेरी। वहीं, 1985 में रिलीज हुई फिल्म ‘सागर’ में कमल हसन, डिंपल कपाड़िया और ऋषि कपूर लीड रोल में थे। फिल्म का एक गाना 'यूं ही गाते रहो' कमल हसन और ऋषि कपूर के बीच फिल्माया गया था। ऋषि कपूर के लिए किशोर दा और कमल हसन के लिए बालासुब्रमण्यम साहब गा रहे थे। जावेद अख्तर ने इस फिल्म का एक किस्सा सुनाते हुए बताया था कि उस समय टेक्निक इतनी विकसित हो गई थी कि अगर दो लोग एक गाने को गा रहे हैं, तो वे अपने हिसाब से कभी-भी आते थे और गाकर चले जाते थे। गाने को रिकॉर्ड करने के लिए दोनों का एक साथ होन...

गीतकार मुकेश किस्सा tv से साभार

 उस ज़माने में डीजे तो हुआ नहीं करते थे। इसलिए मुकेश जी को बारात का मनोरंजन करने के लिए कहा गया। इनसे कहा गया कि तुम बहुत गाते हो ना। चलो आज कुछ गाने गाओ। उस दिन मुकेश जी की बहन की शादी थी। ज़ाहिर है, वो इन्कार नहीं कर सकते थे। मुकेश जी ने गाना शुरू किया। और उन्होंने के.एल.सहगल साहब का एक गाना गाया। उस शादी में मुंबई(तब बॉम्बे) से भी दो लोग शिरकत करने आए थे। सारी रात गाना-बजाना होता रहा। अगली सुबह बारात विदा होने के बाद बॉम्बे से आए वो दोनों आदमी मुकेश जी के पिता से मिले। उन्होंने मुकेश जी के पिता से कहा कि आपका बेटा तो बहुत अच्छा गाता है। ये तो बहुत अच्छा गायक बन सकता है। अब मुकेश जी के पिता ठहरे सीधे-सादे आम इंसान। उन्हें समझ ही नहीं आया कि ये लोग कहना क्या चाह रहे हैं। उन्होंने हैरत से उन दोनं आदमियों को देखा। फिर मुकेश जी से पूछा कि ये लोग कौन हैं और क्या चाहते हैं? मुकेश जी ने उन्हें बताया कि ये फिल्मी दुनिया के लोग हैं और बहुत मशहूर हैं। उन दोनों में से एक मुकेश जी के पिता से बोला,"आप इसे हमारे साथ फिल्मों में काम करने भेज दीजिए। ये सहगल से भी ज़्यादा नाम कमाएगा।" उस दौ...

साधना की झिझक

 साधना जी बड़ी कनफ्यूज़्ड थी। वो फैसला नहीं कर पा रही थी कि एच.एस.रवैल साहब ने उन्हें जो फिल्म ऑफर की है उसमें काम करना चाहिए कि नहीं करना चाहिए। क्योंकि एच.एस.रवैल की फिल्म रूप की रानी चोरों का राजा, जिसमें वहीदा रहमान और देव आनंद थे, वो बुरी तरह फ्लॉप हो चुकी थी। साधना जी ऋषिकेश मुखर्जी के पास पहुंची। उन्होंने अपनी कशमकश से ऋषि दा को अवगत कराया। ऋषि दा ने साधना जी से कहा,"तुम ये फिल्म बेझिझक साइन कर लो। क्योंकि इसमें राजेंद्र कुमार हीरो है। और राजेंद्र कुमार खराब स्क्रिप्ट्स साइन नहीं करता है। मतलब कि फिल्म अच्छी होगी।" ऋषि दा की बात मानते हुए साधना जी ने राजेंद्र कुमार जी के अपोज़िट बतौर हीरोइन वो फिल्म साइन कर ली। फिल्म रिलीज़ हुई तो दर्शकों ने फिल्म की खूब तारीफें की। और बॉक्स ऑफिस पर वो फिल्म ब्लॉक बस्टर साबित हुई। उस फिल्म का नाम था मेरे महबूब, जो साल 1966 में रिलीज़ हुई थी। आज राजेंद्र कुमार जी की पुण्यतिथि है। 12 जुलाई 1999 को 69 साल की उम्र में राजेंद्र कुमार जी का निधन हुआ था। आज राजेंद्र कुमार जी के बारे में कुछ दिलचस्प बातें जानते हैं। संगीतकार नौशाद जब फिल्म मेर...

पाकीज़ा कौन थी ? 😊

  अधिकतर दर्शक यही समझते हैं - इस सिनेमा में मीना कुमारी ही पाकीज़ा हैं - बल्की कहानी कुछ और है - बकौल कमाल अमरोही के पुत्र :  सिनेमा के अंतिम दृश्यों में - जब राजकुमार मीना कुमारी को इज्जत के साथ विदा कर के ले जाते हैं - उसी दृश्य में - एक छोटी सी टीनएजर लड़की पर कैमरा फोकस करता है - वो लड़की बारात को देख बहुत खुश होती है - उसे लगता है एक दिन उसके लिए भी बारात आयेगी और वो भी मीना कुमारी की तरह हंसी खुशी विदा लेगी - पर ऐसा नहीं है - वो लड़की अब बस चंद दिनों में कोठे पर नाचने को थी ।  इस सिनेमा के एडिटर डी एन पाई ने लगभग इस दृश्य को उड़ा दिया था - जब कमाल अमरोही को पता चला - वो पाई साहब को समझाए - पाई साहब बोले - "यही लड़की पाकीज़ा है ..यह बात कौन समझेगा ? " कलाम अमरोही बोले - " अगर एक आदमी भी समझ गया - यही लड़की पाकीज़ा है - समझो मेरी मेहनत पुरी हुई - दिल को तसल्ली मिलेगी " .. 😊 लगभग एक साल बाद - कमाल अमरोही को एक दर्शक का ख़त आया - जिसमे उस मासूम लड़की के पाकीज़ा होने का ज़िक्र था ! कमाल आरोही ने पाई साहब को बुलाया और ख़त दिखाया ...🙂 फिर उस दर्शक को पुरे देश के सिनेमा हॉल के ल...

महान गीतकार भरत व्यास जी

●बेटे के वियोग में गीत बनाया,बन गया प्रेमियों का सबसे अमर गाना :-  साल था 1957,फ़िल्म "जनम-जनम  के फेरे"  रिलीज हुई ।  यह म्यूजिकल  हिट  साबित हुई ।  इस फ़िल्म के एक गाने   "जरा सामने तो आओ छलिये"  ने  तो  जैसे  उस दौर में तहलका मचा दिया। ये गानाइतना सुपरहिट साबित हुआ कि उस साल की ''बिनाका गीत माला" का यह नम्बर 1 गीत बन गया। इस गाने का  अनोखा किस्सा है । इस गाने को लिखा था  पंडित भरत व्यास जी ने। तो हुआ यों था कि पंडित भरत व्यास जी के एक बेटा था  श्याम सुंदर व्यास ! श्याम सुंदर बहुत संवेदनशील था । एक दिन भरत जी से किसी बात पर नाराज़ होकर  बेटा श्याम सुंदर घर छोड़ कर चला गया। भरत जी ने  उसे  लाख  ढूंढा ।  रेडियो और अख़बार में विज्ञापन दिया। गली गली दीवारों पर पोस्टर भी चिपकाए। धरती, आकाश और पाताल सब एक कर दिया ।  ज्योतिषियों, नजूमियों से पूछा।  मज़ारो,गुरद्वारो,चर्च, मंदिरों में मत्था  टेका।  लेकिन  वो  नही  मिला। ज़मी खा गई या आसमां निगल गया। आख़िर हो कहां ...

संगीतकार मदन मोहन

 एक दफा मदन मोहन जी ने एक गज़ल कंपोज़ की थी जिसके बोल थे 'है इसी में प्यार की आबरू। वो जफ़ा करे मैं वफ़ा करूं।' ये गज़ल 1962 में आई फिल्म अनपढ़ में है। और इसे लता जी ने गाया था। ये गज़ल राजा मेहदी अली खान साहब ने लिखी थी। उस दौर के एक और दिग्गज संगीतकार नौशाद साहब को ये गज़ल बहुत पसंद आई। इतनी पसंद आई कि नौशाद मदन मोहन जी की तारीफ करने उनके घर पहुंच गए। वहां नौशाद साहब ने मदन मोहन जी से कहा कि तुम्हारी इस गज़ल पर मैं अपना सारा संगीत निसार करता हूं। कितनी बेहतरीन गज़ल कंपोज़ की है तुमने।  नौशाद मदन मोहन जी से सीनियर थे। एक सीनियर, वो भी नौशाद, उनके मुंह से अपनी इतनी तारीफ सुनकर मदन मोहन जी की आंखें खुशी से भर आई। वो बोले,"कैसी बात करते हैं नौशाद साहब। मैं तो आपसे इतना जूनियर हूं। आपकी बराबरी कहां कर सकूंगा।" नौशाद ने कहा,"इसमें जूनियर-सीनियर वाली कोई बात नहीं है। तुमने जो कंपोज़ किया है वो बहुत अच्छा है। और अच्छी चीज़ की तारीफ होनी ही चाहिए। तुमने बहुत अच्छी गज़ल बनाई है। आज तो मैं ये बात इस चार दीवारी में कह रहा हूं। कल को किसी पब्लिक मीटिंग में भी मैं ऐसा ही कहू...

राजकुमार

 "जानी...❤️ जानी...हम तुम्हें मारेंगे और जरूर मारेंगे, पर बंदूक भी हमारी होगी और गोली भी हमारी होगी और वह वक्त भी हमारा होगा। सौदागर जब ख़ून टपकता है तो जम जाता है, अपना निशान छोड़ जाता है, और चीख़-चीख़कर पुकारता है कि मेरा इंतक़ाम लो, मेरा इंतक़ाम लो। इंसानियत का देवता हम आंखों से सुरमा नहीं चुराते, हम आंखें ही चुरा लेते हैं। तिरंगा हम तुम्हे वो मौत देंगे जो ना तो किसी कानून की किताब में लिखी होगी, और ना ही कभी किसी मुजरिम ने सोची होगी। तिरंगा बिल्ली के दांत गिरे नहीं और चला शेर के मुंह में हाथ डालने. ये बद्तमीज हरकतें अपने बाप के सामने घर के आंगन में करना, सड़कों पर नहीं। बुलंदी जब राजेश्वर दोस्ती निभाता है तो अफसाने लिक्खे जाते हैं और जब दुश्मनी करता है तो तारीख़ बन जाती है। सौदागर हम अपने कदमों की आहट से हवा का रुख़ बदल देते हैं। बेताज बादशाह घर का पालतू कुत्ता भी जब कुर्सी पर बैठ जाता है तो उसे उठा दिया जाता है. इसलिए क्योंकि कुर्सी उसके बैठने की जगह नहीं. सत्य सिंह की भी यही मिसाल है. आप साहेबान ज़रा इंतजार कीजिए। गॉड एंड गन बच्चे बहादुर सिंह, कृष्ण प्रसाद मौत की डायरी में ए...

कुलभूषण पंडित

 कुलभूषण पंडित पुलिस में नौकरी कर रहे थे। जिस थाने में ये तैनात थे उसके ठीक सामने एक मजिस्ट्रेट रहा करते थे जिनका नाम था मिस्टर खान। उन्हीं मिस्टर खान के एक भाई थे अली, जिनकी कुलभूषण पंडित जी से दोस्ती थी। अली की दोस्ती फिल्म इंडस्ट्री के कुछ लोगों से थी। अली अक्सर कुलभूषण पंडित जी से कहते थे कि आपको तो फिल्मों में आना चाहिए। शुरू में कुलभूषण जी ने मना कर दिया। क्योंकि तब ये फिल्में देखते ही नहीं थे। ना ही इन्हें फिल्मों में कोई दिलचस्पी थी।  मगर जब अली बार-बार इनसे फिल्मों में आने को कहते रहे तो कुलभूषण पंडित एक दिन अली के साथ जाकर डायरेक्टर के.बी.लाल से मिले। के.बी.लाल उस वक्त फिल्म इंडस्ट्री के मशहूर डायरेक्टर थे। उन्होंने कुलभूषण पंडित जी की कुछ अच्छी-अच्छी तस्वीरें खिंचाई। वो तस्वीरें के.बी.लाल ने अपने पास रख ली। वही तस्वीरें उस दौर के एक और बड़े नाम एस.यू.सनी के पास भी भेजी गई, जो उन्हें बहुत पसंद आई। के.बी.लाल अक्सर कुलभूषण पंडित जी की कमर पर हाथ रखकर उन्हें फेमस स्टूडियो में घुमाते थे।  उनका अपनी कमर पर हाथ रखना कुलभूषण पंडित को अच्छा नहीं लगता था। एक दिन कुलभूषण ...

अरुण कुमार आहूजा किस्सा tV से साभार

 इस तस्वीर में दिख रहे एक कलाकार की बात करनी आज ज़रूरी है। वो कलाकार हैं अरुण कुमार आहूजा। अपने समय के नामी और बहुत हैंडसम माने जाने वाले एक्टर। व आज के ज़माने का बड़ा नाम गोविंदा के पिता। वैसे, ये जानना भी रोचक है कि तस्वीर में जो महिला कलाकार इनके साथ दिख रही हैं वो कौन हैं। वो हैं दि वन एंड ओनली लीला मिश्रा जी। वही जिन्होंने शोले फिल्म में मौसी का वो मासूम सा किरदार निभाया था। इनकी बात तो फिर कभी की जाएगी। फिलहाल अरुण कुमार आहूजा जी के बारे में बात करते हैं। क्योंकि बीते कल ही अरुण कुमार आहूजा जी की पुण्यतिथि थी। 03 जुलाई 1998 को अरुण जी का देहांत हुआ था। 17 जनवरी 1917 को गुजरांवाला में अरुण कुमार आहूजा जी का जन्म हुआ था। माता-पिता ने इनका नाम रखा था गुलशन। यानि इनका वास्तविक नाम था गुलशन कुमार आहूजा। अरुण जी के पिता, यानि गोविंदा जी के दादा स्टेशन मास्टर हुआ करते थे। अरुण जी पढ़ाई-लिखाई में बहुत अच्छे थे। यही वजह है कि उनके पिता ने उनका दाखिला लाहौर इंजीनियरिंग कॉलेज में कराया था। चूंकि अरुण जी को फुटबॉल बहुत पसंद था, और फुटबॉल के बहुत अच्छे खिलाड़ी थे, तो फुटबॉल की वजह से ही अ...

मजरूह सुल्तानपुरी

 मजरूह सुल्तानपुरी एक ऐसा शायर जिसने कई हजार फिल्मी गाने भी लिखे। लेकिन, वो अपने गानों को नौटंकी कहता था। सियासत के साथ 36 के आंकड़े ने उन्हें जेल भी पहुंचाया। लेकिन, मार्क्स और लेनिन को पढ़ने वाले इस शायर ने सियासतदानों के आगे सर नहीं झुकाया। मजरूह का  मतलब होता है घायल। और, इस घयल शायर के दिल से जो भी शब्द निकले वो अमर हो गए। मजरूह सुल्तानपुरी की बात करते हुए जो बात सबसे पहले दिमाग में आती है वो है उनकी अलग-अलग जॉनर में लिख लेने की बड़ी क्षमता। वो शायद इकलौते गीतकार है्ं जो कुंदन लाल सहगल से लेकर आमिर खान तक के लिए सुपर हिट गाने लिख चुके हैं। फिल्मी गीतों के बेताज बादशाह ‘मजरूह सुल्तानपुरी का जन्म एक अक्टूबर १९१९ को उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर में हुआ था। वैसे इनके बचपन का नाम था असरार हसन खां। लेकिन फ़िल्मी दुनिया में इनका नाम पड़ा मजरूह सुल्तानपुरी। मजरूह का खानदान पुरानी सोच का था। बचपन में उनके लिए तय किया गया कि मजरूह मौलाना बनेंगे। मगर मजरूह मदरसे में फुटबॉल खेलने लगे। जिसके चलते उनके ऊपर फतवा जारी हो गया इसके बाद वो हकीम बनने की बात सोचने लगे। मजरूह ने हकीमी की तालीम ली ...

कोई पत्थर से न मारे मिरे दीवाने को जिया इम्तियाज साहब की फेसबुक वाल से साभार

 कुछ दिनों पहले एक मौलाना साहब की रील दिखी, वो बता रहे थे कि फ़िल्म "लैला मजनू" का मशहूर गीत 'कोई पत्थर से ना मारे' ये मिसरा साहिर लुधियानवी का नही बल्कि तुराब काकोरवी नाम के एक शायर का है जिनका ज़माना 1768 से 1858 तक था, ये मिसरा सबसे पहले उनका लिखा मिलता है, तुराब काकोरवी का शे'र ये है "शहर में अपने ये लैला ने मुनादी कर दी कोई पत्थर से न मारे मिरे दीवाने को" अच्छी बात...  दूसरे शायरों के मिसरे पर ग़ज़ल लिखना, शाइरी की दुनिया मे बुरा नही माना जाता, वैसे मौलाना साहब के बताने के पहले ही हमें पता था कि ओरिजनल गाना 1976 की कलर फ़िल्म का नही है, बल्कि "कोई पत्थर से ना मारो मेरे दीवाने को" इस गीत का 1957 का एक वर्ज़न हमने अपने बचपन मे खूब सुना था .... हमारे घर मे 1957 में आई "भाभी" फ़िल्म की ऑडियो कैसेट रखी थी, उसमें लैला मजनूं पर एक गाना था नौटंकी के स्टाईल में... उस गीत में यही लाइन थी 'कोई पत्थर से न..."  इसके अलावा घर मे बड़े बूढ़ों से कुछ हल्की फुल्की लाइनें सुनने को मिलतीं "मेरा दीवाना कहीं सड़कों पे होगा कोई नौकर न बना ले मेरे द...