साधना की झिझक

 साधना जी बड़ी कनफ्यूज़्ड थी। वो फैसला नहीं कर पा रही थी कि एच.एस.रवैल साहब ने उन्हें जो फिल्म ऑफर की है उसमें काम करना चाहिए कि नहीं करना चाहिए। क्योंकि एच.एस.रवैल की फिल्म रूप की रानी चोरों का राजा, जिसमें वहीदा रहमान और देव आनंद थे, वो बुरी तरह फ्लॉप हो चुकी थी। साधना जी ऋषिकेश मुखर्जी के पास पहुंची। उन्होंने अपनी कशमकश से ऋषि दा को अवगत कराया। ऋषि दा ने साधना जी से कहा,"तुम ये फिल्म बेझिझक साइन कर लो। क्योंकि इसमें राजेंद्र कुमार हीरो है। और राजेंद्र कुमार खराब स्क्रिप्ट्स साइन नहीं करता है। मतलब कि फिल्म अच्छी होगी।" ऋषि दा की बात मानते हुए साधना जी ने राजेंद्र कुमार जी के अपोज़िट बतौर हीरोइन वो फिल्म साइन कर ली। फिल्म रिलीज़ हुई तो दर्शकों ने फिल्म की खूब तारीफें की। और बॉक्स ऑफिस पर वो फिल्म ब्लॉक बस्टर साबित हुई। उस फिल्म का नाम था मेरे महबूब, जो साल 1966 में रिलीज़ हुई थी।


आज राजेंद्र कुमार जी की पुण्यतिथि है। 12 जुलाई 1999 को 69 साल की उम्र में राजेंद्र कुमार जी का निधन हुआ था। आज राजेंद्र कुमार जी के बारे में कुछ दिलचस्प बातें जानते हैं।


संगीतकार नौशाद जब फिल्म मेरे महबूब का टाइटल ट्रैक 'मेरे महबूब तुझे मेरी मुहब्बत की कसम' कंपोज़ कर रहे थे तो एच.एस.रवैल साहब बड़े हैरान व परेशान हो गए। वो राजेंद्र कुमार जी के पास आए और बोले,"नौशाद साहब तो बस चार-पांच म्यूज़िशियन्स के साथ गाना रिकॉर्ड कर रहे हैं।" दरअसल, नौशाद साहब को मेरे महबूब फिल्म का संगीत कंपोज़ करने के लिए राजेंद्र कुमार जी ने ही राज़ी किया था। और एच.एस.रवैल जी को भी राजेंद्र कुमार जी ने ही नौशाद को साइन करने को कहा था।


इसलिए जब एच.एस.रवैल जी को लगा कि नौशाद सिर्फ चंद म्यूज़िशियन्स के साथ फिल्म का इतना अहम गाना रिकॉर्ड कर रहे हैं तो नौशाद से कुछ कहने कि बजाय रवैल साहब राजेंद्र कुमार जी के पास अपनी परेशानी लेकर आए। राजेंद्र कुमार जी ने रवैल साहब से कहा कि आप घबाइए मत। नौशाद जो करते हैं बहुत सोच-समझकर करते हैं। आप रिज़ल्ट को देखिएगा। आखिरकार जब गाना रिकॉर्ड हो गया और सबने गाना सुना तो हर किसी को वो गाना बहुत पसंद आया। उस गाने को सबसे पहले रिकॉर्ड किया गया था। आज भी वो गाना लोग बहुत पसंद करते हैं। 


फिल्म के रिलीज़ होने के बाद राजेंद्र कुमार जी ने नौशाद साहब को बताया कि कैसे एच.एस.रवैल गाने की रिकॉर्डिंग के वक्त परेशान हो गए थे। वो सुनकर नौशाद साहब मुस्कुराए और बोले,"कोई शायर जब अपनी लिखी कोई गज़ल या नज्म स्टेज पर सुनाता है तो उसके पीछे बड़ा सा ऑर्केस्ट्रा या कई सारे म्यूज़िशियन्स नहीं होते। इसी बात को ध्यान में रखकर हमने वो गाना चार-पांच म्यूज़िशियन्स के साथ कंपोज़ किया था।"


राजेंद्र कुमार जी की एक और बहुत कामयाब फिल्म थी गूंज उठी शहनाई जो साल 1959 में रिलीज़ हुई थी और जिसे विजय भट्ट ने डायरेक्ट किया था। इस फिल्म में राजेंद्र कुमार एक शहनाई वादक बने थे। और उन्होंने इसके लिए बाकायदा उस्ताद बिस्मिल्लाह खान से सीखा था कि शहनाई कैसे बजाई जाती है। शहनाई बजाते हुए वादक की भाव-भंगिमा कैसी होती है। राजेंद्र कुमार जी ने एक शहनाई अपने लिए तब बनवाई भी थी और वो शीशे के सामने रोज़ खड़े होकर उस्ताद बिस्मिल्लाह खान कि तरह शहनाई बजाते दिखने का अभ्यास करते थे। जी हां, सिर्फ अभ्यास। क्योंकि शहनाई बजाना उन्होंने सीखा नहीं था। तब वो मुमकिन भी नहीं था। क्योंकि शहनाई बजाने के लिए बहुत अभ्यास की आवश्यकता जो पड़ती है।


गूंज उठी शहनाई जब रिलीज़ हुई तो उस्ताद बिस्मिल्लाह खान को भी फिल्म के प्रीमियर में इनवाइट किया गया। फिल्म खत्म होने के बाद जब उस्ताद जी बाहर आए तो राजेंद्र कुमार जी ने उनसे हिचकिचाते हुए पूछा कि मैं आपको कैसा लगा था। जवाब में उस्ताद जी ने कहा,"अरे भई हमने तो तुम्हें देखा ही नहीं। हम तो अपने आप को देख रहे थे।"


1960 में आई कानून भी राजेंद्र कुमार जी की एक बहुचर्चित फिल्म थी। कानून का निर्माण-निर्देशन बी.आर.चोपड़ा साहब ने किया था। वो भारत की पहली फिल्म थी जिसमें एक भी गाना नहीं था। उस फिल्म को याद करते हुए राजेंद्र कुमार जी ने एक दफा कहा था कि कानून फिल्म की सफलता का जश्न मनाने के लिए बी.आर.चोपड़ा जी ने एक बड़ी सी महफिल बुलाई थी। उस महफिल में फिल्म इंडस्ट्री के कई बड़े सितारे व नामचीन हस्तियां शरीक हुई थी। उन्हीं दिनों बॉम्बे हाईकोर्ट के कोई जज भी थे जिन्हें उस महफिल में इनवाइट किया गया था। और फिल्म के कलाकारों को ट्रॉफीज़ उन्हीं के हाथों दिलाई गई थी। तब उन जज साहब ने अपनी स्पीच में कहा था कि मैंने अपने पूरे करियर में अशोक कुमार जैसा जज नहीं देखा और राजेंद्र कुमार जैसा वकील नहीं देखा। #RajendraKumar

किस्सा tV से साभार

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