Posts

Showing posts from June, 2024

जद्दन बाई

  प्रसिद्ध फिल्म स्टार संजय दत्त (Sanjay Dutt) की नानी अपने जमाने की प्रसिद्ध तवायफ हुआ करती थी। उसी प्रसिद्ध तवायफ की बेटी थी फिल्म स्टार नर्गिस। नर्गिस तथा सुनील दत्त के पुत्र हैं फिल्म स्टार संजय दत्त। संजय दत्त की नानी उनके नाना से विवाह करने के बाद मुंबई की फिल्म इंडस्ट्री में म्यूजिक डायरेक्टर बन गई थीं। संजय दत्त की नानी ने फिल्मों में एक्टिंग भी की थी। हीरामंडी के बाद हुआ है खुलासा आपको बता दें कि हाल ही के दिनों में एक वेब सीरीज खूब चर्चा में है। इस वेब सीरीज का नाम हीरामंडी। हीरामंडी को तवायफों की सच्ची कहानी बताया जा रहा है। तवायफों की कहानी सुनते तथा पढ़ते हुए कुछ जानकारों ने खोज कर ली है कि फिल्म स्टार संजय दत्त का नाम भी तवायफों के खानदान से जुड़ा हुआ है। दावा किया जा रहा है कि संजय दत्त की नानी अपने जमाने की प्रसिद्ध तवायफ हुआ करती थी। संजय दत्त की नानी का नाम जद्दन बाई था। जद्दन बाई तवायफ कैसे बनी? इस बात को लेकर अनेक रिपोर्ट अलग-अलग दावे पेश करती हैं। सबसे सटीक दावा यह है कि संजय दत्त की नानी जद्दन बाई तवायफ थीं। संजय दत्त की नानी जद्दन बाई ऐसे बनी तवायफ एक रिपोर्ट...

राजीव वर्मा किस्सा tV से साभार

 ये हैं बच्चन साहब के साढू जी। सलमान खान के ऑन स्क्रीन पप्पा। फिल्म मैंने प्यार किया में सलमान खान के घमंडी पिता का किरदार इन्होंने ही निभाया था। इनकी पत्नी रीता वर्मा बच्चन साहब की साली साहिबा हैं। यानि जया बच्चन जी की बहन हैं। कुछ लोग गलतफहमी में एक्ट्रेस स्वर्गीय रीता भादुड़ी को इनकी पत्नी मान लेते हैं। लेकिन वो रीता भादुड़ी एकदम अलग हैं। और ये गलतफहमी होती है जया भादुड़ी( जो कि अब बच्चन हैं) और रीता भादुड़ी का एक जैसा सरनेम होने की वजह से। उस पर भी जया जी की सगी छोटी बहन का नाम भी रीता ही है। लेकिन एक्ट्रेस रीता भादुड़ी और जया बच्चन की बहन रीता दोनों अलग हैं। खैर, बात करते हैं राजीव वर्मा जी के बारे में। क्योंकि आज इनका जन्मदिन है। 28 जून 1949 को होशंगाबाद में राजीव जी का जन्म हुआ था। ये डेढ़-दो साल के ही थे जब इनके पिता परिवार सहित भोपाल शिफ्ट हो गए थे। इनके पिता होशंगाबाद में वकालत की प्रैक्टिस करते थे। वास्तव में इनके पिता होशंगाबाद से भोपाल मुख्य शहर नहीं, अपने पुश्तैनी गांव मंडीदीप लौटे थे। आज मंडीदीप कोई गांव नहीं, बल्कि भोपाल के पास स्थित एक विशाल इंडस्ट्रियल एरिया है। र...

ए.के.हंगल

 गुजरे ज़माने के बेहतरीन एक्टर ए.के.हंगल  ऐसे कलाकार थे जिन्होंने 50 साल की उम्र में फिल्म इंडस्ट्री में कदम रखा. इसके बावजूद इन्होंने 225 फिल्मों में काम किया. इनकी रियल लाइफ भी उतार-चढ़ाव से भरी थी. अभिनेता का जन्म 1 फरवरी 1914 को सियालकोट पंजाब (पाकिस्तान)में हुआ था और उन्होंने पूरा बचपन पेशावर( पाकिस्तान) में बिताया. वह एक कश्मीरी पंडित परिवार से संबंध रखते थे. अभिनेता एक स्वतंत्रता सेनानी भी थे, उन्होंने 1936 से 1965 तक स्टेज अभिनय भी किया था. इसके बाद उन्होंने हिंदी फिल्मों की ओर रुख किया, लेकिन वह अभिनय में अपने करियर की शुरुआत से पहले एक टेलर का काम किया करते थे. बंटवारे के समय आए थे मुंबई एके हंगल ने अपना बचपन पेशावर से करांची तक में बिताया। हिंदुस्तान के बंटवारे बाद 1949 में वो मुंबई आ गए थे. एके हंगल ने बचपन से ही अपनी जिंदगी में तमाम संघर्ष किए थे. एके हंगल ने अपनी पत्नी के निधन के बाद अपने बेटे की अकेले ही परवरिश की. फिल्मों के साथ-साथ एके हंगल को नाटक में भी अभिनय करने में सफलता प्राप्त हुई. हंगल साहब 18 वर्ष के थे जब उन्होंने नाटकों में अभिनय करने की शुरुआत की थी...

जयंत

 दोस्तों हिंदी सिनेमा में कई कलाकार थे और हैं जिन्होंने कभी एक्टिंग के बारे में नहीं सोचा था...लेकिन किस्मत उन्हें सिल्वर स्क्रीन तक ले आई...ऐसी ही एक कलाकार थे जयंत...जयंत को शायद आप ऐसे न पहचाने लेकिन अगर ये कहा जाए कि जयंत अमजद खान के पिता थे तो शायद उनकी तस्वीर आपको याद आ जाए....जयंत की पहचान एक अच्छे अभिनेता के रूप में बनी और उन्होंने लगभग 150 फिल्मों में अभिनय किया। फिल्मी दुनिया में कभी न मिटने वाली पहचान बनाने वाली और अपनी अमिट छाप छोड़ने वाली फिल्म शोले का नाम जब भी आता है तो गब्बर सिंह का किरदार लोगों के जहन में कौंधने लगता है. गब्बर सिंह का किरदार निभाने वाले अमजद खान का नाम और उनके फेमस डॉयलॉग 'जो डर गया...समझो मर गया' आज भी लोगों की जुबान पर चढ़े हैं. खास बात ये है कि मुंबई में अपनी खास पहचान बनाने वाले अमजद खान और उनके पिता जकारिया खान का अलवर से गहरा नाता रहा है. जकारिया खान भी सफल फिल्मी कलाकार रहे हैं. फिल्मी दुनिया में कदम रखने से पहले जकारिया अलवर में पुलिस ऑफिसर के पद पर तैनात थे. जिले में जहां वह रहते थे, वहां के लोग आज भी उनको याद करते हैं. दिवंगत जकारिया ...

मदनमोहन संगीतकार

 ( इस आलेख को न्यूज़ पोर्टल पर लिया गया, इसका यूट्यूब वीडियो बनाया गया, इसका पॉडकास्ट बना। इसे पहले भी कई बार लगाया है। आगे भी लगाऊंगा। ) मदनमोहन --------------- ■ मदनमोहन जैसा  कोई संगीतकार न हुआ, न होगा। एक फौजी आदमी। फिर रेडियो की नौकरी। उस्तादों की सोहबत। बेगम अख़्तर का साथ।  और नामी गिरामी बेहद सफल संगीतकारों के बीच कितना चमकता हुआ , कितना अलग, कितना अनोखा संगीत। मदनमोहन के कमतर गीतों को खोजना भी एक मुश्किल काम है।  लता मंगेशकर हर संगीतकार के साथ उसकी तरह की लता हैं। पर मदनमोहन के साथ तो वे अपने भी सीमांत को छू लेती हैं। लता - मदनमोहन के गीत और ग़ज़लें हिंदी फ़िल्म संगीत में अलग से अपने सुरों का नूर बिखेरते नज़र आते हैं। कितने अफ़सोस की बात है कि ऐसा नायाब कलाकार इतनी जल्दी दुनिया से चला गया । पता नहीं ऐसा मुझे ही लगता है या क्या है, सत्तर की दहाई में मदनमोहन की रेकॉर्डिंग्स की क्वालिटी भी  बहुत बेहतर है। यह बात तो अलग है ही कि इस दौर में उनका संगीत, उनका ऑर्केस्ट्रेशन भी बहुत आधुनिक है। समय से भी ज़्यादा। इसीलिए बरसों बाद बनने वाली 'वीर ज़ारा' में उनकी धुनें उतनी ह...

कहानी अमर प्रेम की। गोल्डन इरा से साभार

 उन दिनों काका यानि कि राजेश खन्ना की गड्डी सातवें आसमान पर उड़ रही थी. हर तरफ दौलत और शोहरत. एक दिन काका को ख़बर लगी कि शक्ति सामंत के पास बहुत बड़ा सब्जेक्ट हैं और वो बहुत जल्दी फिल्म बनाने जा रहे हैं. काका को हैरानी हुई. शक्ति दा फिल्म बना रहे हैं और हमसे पूछा भी नहीं. यह शक्ति दा ही थे जिनकी 'आराधना' और 'कटी पतंग' ने काका को स्टार बनाया था. काका लपक कर पहुंचे शक्ति दा के घर. शक्ति दा ने बताया - कई साल से अधूरी 'जाने अंजाने' पूरी हो रही है.  अब 'अमर प्रेम' बनाने का इरादा है. हीरो की तलाश है....काका ने खुद को ऑफर किया - मैं हूं न...शक्ति दा ने राजेश को उपेक्षा से देखा - तुम्हारे पास वक्त कहां है? तुम्हारी डायरी में डेट्स ही नहीं हैं. और मैं नहीं चाहता किसी अन्य प्रोड्यूसर की डेट काट कर मुझे दो और मैं उसकी बद्दुआएं लूं...काका गहरी सोच में डूब गए. उन्हें सब्जेक्ट के बारे मालूम था. लाईफ़टाईम रोल समझिये. एक शादी-शुदा आदमी घर जैसी ख़ुशी तलाशने के लिए वेश्यालयों के चक्कर लगाता फिरता है. कहानी में कई और भी ट्विस्ट थे. अचानक काका को आईडिया सूझा. वो उछल पड़े. प्रॉब्ल...

बेमिसाल थे फिल्मी कलाकार प्राण फ़िल्मी मौज.काम से साभार

 प्राण जैसे अभिनेता बॉलीवुड को विरले ही मिले हैं। पेश है चंद बातें हिन्दी सिनेमा के सबसे कामयाब चरित्र अभिनेता बारे में  1) प्राण अपने बुरे किरदारों को इतना डूब कर निभाते थे कि बरसों तक किसी मां ने अपने बेटे का नाम प्राण रखना पसंद नहीं किया।  2) 12 फरवरी 1920 को जन्मे प्राण अपनी मां के लाड़ले थे क्योंकि उनके पिता सरकारी कॉन्ट्रेक्टर थे और अक्सर दौरे पर रहा करते थे।  3) प्राण का मन कभी पढ़ाई में नहीं लगा, लेकिन उन्होंने ये ठान लिया था कि कुछ खास करना है। मैट्रिक के बाद उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी।  4) युवावस्था में प्राण ने अपने फोटोग्राफी के शौक के कारण दिल्ली और शिमला के एक स्टूडियो में नौकरी की और फिर लाहौर चले गए।  5) छठी क्लास से ही उन्हें सिगरेट पीने का चस्का लग गया। सिगरेट उनका पहला प्यार था।   6) सिगरेट का यह शौक ही उनका फिल्म लाइन में प्रवेश का द्वार साबित हुआ। 7) पान की दुकान पर सिगरेट लेने गए प्राण की मुलाकात पटकथा-लेखक मोहम्मद वली से हुई। प्राण को देखते ही वली को लगा कि उन्हें अपनी लिखी कहानी का एक चरित्र मिल गया।  😎 वली के कहने पर ही ...

सनी देओल किस्सा tv

 सनी देओल उन दिनों मुश्किल वक्त से गुज़र रहे थे। उनकी डकैत और राम अवतार फ्लॉप हो चुकी थी। उन्हें तलाश थी एक सुपरहिट फिल्म की। राजकुमार संतोषी ने जब उन्हें घायल की कहानी सुनाई तो वो बहुत खुश हुए। क्योंकि उन्हें इस कहानी में दम लग रहा था। मगर एक परेशानी थी। प्रोड्यूसर ए.सुब्बा राव चाहते थे कि सनी देओल को अपनी फीस कम करनी होगी। दरअसल, राजकुमार संतोषी को इस फिल्म के लिए कोई प्रोड्यूसर नहीं मिल रहा था। चूंकि राजकुमार संतोषी गोविंद निहलानी के असिस्टेंट थे तो लगभग सभी प्रोड्यूसर ये मान चुके थे कि राजकुमार संतोषी तो कोई आर्ट फिल्म बनाएंगे। और आर्ट फिल्मों से कमाई कुछ खास होती नहीं है।  बड़ी मुश्किल से ए.सुब्बा राव इस फिल्म को प्रोड्यूस करने को तैयार हुए थे। हालांकि वो चाहते थे कि फिल्म में संजय दत्त को हीरो लेना चाहिए। मगर संजय दत्त के पास फुर्सत नहीं थी इस फिल्म में काम करने की। इसलिए राजकुमार संतोषी ने उन्हें राज़ी किया था कि सनी देओल को ही हीरो लेना चाहिए। पर चूंकि सुब्बा राव खुद उन दिनों आर्थिक परेशानियों में फंसे थे और उनके पास भी फंड की कमी थी तो वो चाहते थे कि सनी देओल अपनी फीस...

एक्टर के साथ गायक भी थे डेनी

 हाथ में धारदार हथियार लिए डैनी डैनजोंग्पा एक घने जंगल में कांटेदार झाड़ झंखाड़ साफ करते हुए, पसीने में तरबतर आगे बढ़ते जा रहे हैं। अगर आपसे पूछा जाए कि इस दृश्य के बाद क्या हुआ होगा तो शायद आप कहेंगे कि हिंदी फिल्मों के खूंखार विलेन डैनी अगले ही पल अपने धारदार दाव से अपने दुश्मन के चार टुकड़े कर देते हैं और फिर बड़े पर्दे पर दांत भींचते हुए उनकी खूंखार हंसी गूंजती है। ये डैनी की किसी फिल्म का दृश्य नहीं है बल्कि वो अपनी असल जिंदगी में भी सिक्किम के जंगलों में मिशैटी या दाव लिए झाड़ काटते हुए पैदल ही निकल पड़ते हैं, घुड़सवारी करते हैं और 76 बरस की उम्र में भी पेड़ों पर चढ़ जाते हैं। डैनी कहते हैं उनकी सेहत का राज भी यही है।  वो कहते हैं,"हम लोग शिकारी हुआ करते थे। ये हमारे जींस में है। हम जानवरों के पीछे भागा करते थे। लेकिन अब जबसे गाड़ियां आ गई हैं, एसी आ गया है, लोग टीवी के सामने बैठ जाते हैं या फिर एसी गाड़ी से सफर करते हैं। मैंने पैदल चलना नहीं छोड़ा है"।  चार दशक के ज्यादा समय से फिल्म इंडस्ट्री में गुजारने के बाद भी डैनी सबके बारे में सिर्फ अच्छी बातें ही कहते हैं। ...

वो एक्टर जिन्होंने 1000 बार टकले आदमी का किरदार निभाया

  40 के दशक में जन्मे अभिनेता मनमौजी जी का असली नाम राम मोहन मिश्र है और वो रहने वाले थे उन्नाव के दुबेपुर गांव के जो कि उत्तर प्रदेश में स्थित है। ‘ द गवर्नमेंट टेक्सटाइल इंस्टीट्यूट ऑफ कानपुर’ से टेक्सटाइल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा करने के बाद वर्ष 1972 में मनमौजी जी मुंबई चले गये जहाँ वे स्वान, सेंचुरी और एम्पायर जैसी बड़ी मीलों में बतौर टेक्निकल एडवाइज़र काम करने लगे। फिल्मों में काम करने की बात को मनमौजी भाग्य के साथ जोड़ते हुये कहते हैं कि शायद यह उनके भाग्य में पहले से ही लिखा था। दोस्तों फिल्मों से जुड़ने की उनकी कहानी बहुत ही दिलचस्प है, उन्होंने बताया कि वर्ष 1973 में एक बार जब वे एम्पायर मिल में अपनी शिफ्ट में काम कर रहे थे तभी उनके पास वॉचमेन आके बोला कि कोई बहुत बड़ा ऐक्टर मिल के किसी कर्मचारी से मिलना चाहता है। वॉचमेन की बात सुनकर मनमौजी तुरंत बाहर गये तो उन्होंने देखा कि उनके सामने दिग्गज अभिनेता महमूद खड़े हैं। महमूद ने मनमौजी जी से हाथ मिलाते हुये रिक्वेस्ट किया कि कुछ देर के लिये वे अपनी अम्पाला कार को मिल के कैम्पस में खड़ी करना चाहते हैं। महमूद ने कहा कि थोड़ी दे...

सदाबहार देवानंद

 देवानंद 21 साल की उम्र में बंबई आए थे और अपने कॉन्फिडेंस के बलबूते फिल्म प्रोड्यूसर को इंप्रेस कर डाला था। देव आनंद की छवि देख कर उस वक्त वह फिल्म प्रोड्यूसर भी उन्हें देखता रह गया था। देव आनंद ने फिल्म ‘हम एक हैं’ से अपने करियर की शुरुआत की थी। फिल्म इंडस्ट्री में देव आनंद का रुतबा ऐसा था जैसा आज तक किसी एक्टर का न हो सका। बेहद खूबसूरत काया वाले देव आनंद जब काला कोट पहनते थे तो लाखों करोड़ों लड़कियां उनपर फिदा हो जाया करती थीं। एक्टर एक नॉन फिल्मी बैकग्राउंड से ताल्लुक रखते थे। वह 21 साल की उम्र में बंबई आए और अपने कॉन्फिडेंस के बलबूते फिल्म प्रोड्यूसर को इंप्रेस कर डाला। देव आनंद की छवि देख कर उस वक्त वह फिल्म प्रोड्यूसर भी देखता रह गया था। इस बारे में खुद देवआनंद साहब ने जिक्र किया था। लेहरन रेट्रो के एक वीडियो में देव आनंद से जब सवाल किया गया था कि ‘आपको अपनी पहली फिल्म कैसे मिली?’ इस सवाल पर देव आनंद ने बताया था- ‘मुझे 1945 में जाना पड़ेगा। 45 का मतलब पता है क्या? कितने साल हो गए? मुझे किसी ने कहा कि किसी जगह किसी दफ्तर में एक साहब खड़े हैं जो फिल्म बनाने की तैयारी कर रहे हैं...

नानी-परनानी थीं तवायफ, मां बनी बॉलीवुड की पहली सुपरस्टार,

 नानी-परनानी थीं तवायफ, पर मां बनी बॉलीवुड की पहली सुपरस्टार, दिलीप कुमार से शादी से पहले ऐसी थी सायरा बानो की जिंदगी 70 के दशक में सायरा बानो का सिक्का चलता था, वो बॉलीवुड की सबसे खूबसूरत अभिनेत्रियों में से एक थीं। वो न सिर्फ बेहतरीन अदाकारा थीं बल्कि बेहद पढ़ी लिखी एक्ट्रेस थीं। सायरा की मां नसीम बानो ने उन्हें लंदन में पढ़ाया था। सायरा बानो की मां नसीम बानो बॉलीवुड की पहली सुपरस्टार थीं। लेकिन ये मुकाम पाने के लिए नसीम बानो ने बहुत संघर्ष किया। उनकी मां और नानी तवायफ थीं, उस जिंदगी से निकलकर फिल्मी पर्दे पर आना और सुपरस्टार बनने की राह बहुत मुश्किल थी। नसीम बानो की मां छमिया बाई उर्फ शमशाद बेगम एक तवायफ थीं और दिल्ली में उनका खुद का एक कोठा था। वो बेहद खूबसूरत थीं और उनका कोठा बहुत मशहूर था। अंग्रेज और नवाब उनके कोठे पर अपना दिल बहलाने आया करते थे। नौशाद अली नाम के राइटर की किताब 'दिल्ली टू हसनपुर एक यात्रा', में बताया गया है कि 1890 के दशक में शमशाद बेगम का जन्म कोठे में हुआ। उनकी मां जुम्मनबाई उस कोठे में तवायफ थीं और जब वो महज 7 साल की थीं तब उनके पिता ने ही उन्हें इस को...