बेमिसाल थे फिल्मी कलाकार प्राण फ़िल्मी मौज.काम से साभार

 प्राण जैसे अभिनेता बॉलीवुड को विरले ही मिले हैं। पेश है चंद बातें हिन्दी सिनेमा के सबसे कामयाब चरित्र अभिनेता बारे में 


1) प्राण अपने बुरे किरदारों को इतना डूब कर निभाते थे कि बरसों तक किसी मां ने अपने बेटे का नाम प्राण रखना पसंद नहीं किया। 

2) 12 फरवरी 1920 को जन्मे प्राण अपनी मां के लाड़ले थे क्योंकि उनके पिता सरकारी कॉन्ट्रेक्टर थे और अक्सर दौरे पर रहा करते थे। 

3) प्राण का मन कभी पढ़ाई में नहीं लगा, लेकिन उन्होंने ये ठान लिया था कि कुछ खास करना है। मैट्रिक के बाद उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी। 

4) युवावस्था में प्राण ने अपने फोटोग्राफी के शौक के कारण दिल्ली और शिमला के एक स्टूडियो में नौकरी की और फिर लाहौर चले गए। 

5) छठी क्लास से ही उन्हें सिगरेट पीने का चस्का लग गया। सिगरेट उनका पहला प्यार था।  

6) सिगरेट का यह शौक ही उनका फिल्म लाइन में प्रवेश का द्वार साबित हुआ।

7) पान की दुकान पर सिगरेट लेने गए प्राण की मुलाकात पटकथा-लेखक मोहम्मद वली से हुई। प्राण को देखते ही वली को लगा कि उन्हें अपनी लिखी कहानी का एक चरित्र मिल गया। 

😎 वली के कहने पर ही प्राण ने पंजाबी फिल्म 'यमला जट' से अपना करियर शुरू किया। 

9) मोहम्मद वली को ताउम्र प्राण ने अपना गुरु और पथ प्रदर्शक माना। 

10) यमला जट फिल्म में काम करने के बदले उन्हें पचास रुपये प्रतिमाह मिलते थे।

11) प्राण की दूसरी फिल्म 'खानदान' सुपरहिट रही, लेकिन हीरो बनना उन्हें अच्छा नहीं लगता था। वे कहते थे कि बारिश में भीग कर गाने गाना या पेड़ों के इर्दगिर्द चक्कर लगाना उन्हें नहीं जमता था। 

12) आजादी के बाद प्राण ने मुंबई का रुख किया और फिल्मों में काम पाने के लिए उन्हें कड़ा संघर्ष करना पड़ा। हालत यह हो गई कि पत्नी के गहने तक बेचने पड़े।

13) प्राण धीरे-धीरे खलनायक के रूप में फिल्म इंडस्ट्री में छा गए। हालत ये हो गई कि लोग उन्हें देखते ही बदमाश, लफंगे, गुंडे और हरामी कहा करते थे। बच्चे और महिलाएं उन्हें देख छिप जाया करते थे। 

14) मनोज कुमार की 'शहीद' और 'उपकार' ने प्राण की इमेज में काफी बदलाव किया और उसके बाद उन्होंने कई फिल्मों में सकारात्मक रोल निभाए। 

15) जंजीर फिल्म में अमिताभ और प्राण पर थाने का सीन फिल्माया गया। अमिताभ की प्राण ने हौसला अफजाई की और उसके बाद अमिताभ ने कमाल का शॉट दिया। फिल्म के निर्देशक प्रकाश मेहरा को एक कोने में ले जाकर प्राण ने कहा कि बॉलीवुड को एक बड़ा कलाकार मिल गया है। 

16) विक्टोरिया नं. 203, धर्मा जैसी कई फिल्में प्राण के बलबूते पर चली। उनमें हीरो-हीरोइन थे, मगर गौण थे।

17) आवाज के उतार-चढ़ाव को प्राण अभिनय का सबसे अहम हिस्सा मानते थे। 

18) प्राण के घर एक लाल तांगा था, जिसे दौड़ाकर वे खुद को बड़ा रोमांचित महसूस करते थे। तांगे के जलने के बाद वे कई दिनों तक रोये। 

19) अपने किरदारों में जान डालने के लिए प्राण को अपनी वेशभूषा और गेटअप के साथ प्रयोग करना बेहद पसंद रहा। प्राण ने फिल्मों में जो विभिन्न किरदार निभाए थे, उन चरित्र वाले चित्रों से उनका घर भरा हुआ है। 

20) लगातार विलेन बन जब प्राण बोर होने लगे तो उन्होंने अपने बुरे किरदारों को कॉमिक टच देना शुरू किया।

21) रावण प्राण का पसंदीदा चरित्र था।

22) प्राण ने किसी की नकल नहीं की। वे आम आदमी को बारीकी से देखते और फिर अपने अभिनय ने उस हाव-भाव को इस्तेमाल करते थे।  

23) राजनीति और नेताओं से प्राण को चिढ़ थी।  

24) प्राण का कहना था कि अगले जन्म में भी वे प्राण ही बनना चाहेंगे। 

25) शूटिंग के दौरान सेट पर वे सबसे पहले पहुंचते और पैक होने के बाद ही लौटते। 

26) प्राण द्वारा बोले गए कई मशहूर संवाद उनके ही दिमाग की उपज थी।

27) पर्दे पर प्राण को दिलीप कुमार और धर्मेन्द्र से मार खाना पसंद था क्योंकि वे इन दोनों हीरो को शेर मानते थे। 

28) दिलीप कुमार और प्राण बेहद अच्छे दोस्त थे। दिलीप की शादी में हिस्सा लेने वे कश्मीर से मुंबई पहुंचे थे। 

29) परदे पर क्रूर और बुरे आदमी का किरदार निभाने वाले प्राण निजी जिंदगी में बेहद भले और संवेदनशील इंसान थे। गरीब, बेसहारा और अनाथों की उन्होंने हमेशा मदद की। 

30) प्राण पर फिल्माए गए कई गीत सु‍परहिट रहे। मन्ना डे की आवाज उन पर खूब जमी।

31) प्राण अपनी फिल्में कभी नहीं देखते थे। उनकी नजर में यह समय की बर्बादी था।

32) प्राण का मानना है कि खलनायक के कारण नायक जाना जाता है। जैसे कंस से कृष्ण और रावण से राम।

33) प्राण की नजर में आजकल के खलनायक लाउड, ओवर एक्टिंग और विलेन की तरह होते हैं। उन्हें हीरो जैसा होना चाहिए।

34) परेश रावल, प्राण को पसंद थे। दक्षिण के शिवाजी गणेशन उनके फेवरिट रहे।

35) मेहबूब खान तथा वी. शांताराम के साथ काम न करने का प्राण को अफसोस रहा।

36) प्राण की नजर में उनका सबसे कठिन रोल फिल्म 'परिचय' (1972) में जीतेंद्र-जया भादुड़ी के दादाजी की भूमिका रही।

37) सबसे कीमती उपहार प्राण को सितंबर 2004 में मिला, जब उनकी पोती ने बेटे को जन्म दिया और उसका नाम रखा-अमर प्राण।

38) प्राण ने साढ़े तीन सौ से ज्यदा फिल्मों में काम किया और ज्यादातर फिल्मों में उनका नाम कलाकारों की सूची में आखिर में बड़े अक्षरों में लिखा आता था- 'और प्राण'। 

39) अमिताभ और प्राण ने 14 फिल्मों में साथ काम किया और जंजीर, कसौटी, मजबूर जैसी कुछ फिल्मों में अमिताभ से ज्यादा पारिश्रमिक प्राण को मिला था। कई हीरो के मुकाबले प्राण को फिल्म में काम करने के बदले में ज्यादा पैसे मिलते थे। 

40) हिंदी सिनेमा में फैले प्राण के छ: दशक लंबे करियर के कारण उन्हें 'विलेन ऑफ मिलेनियम' कहा जाता है।

किस्सा tV से साभार नीचे का लेख

"हे भगवान। मुझे नहीं पता था कि इतनी लड़कियां मेरी फैन हैं।" सालों पहले प्राण साहब ने ये बात कलकत्ता में अपनी एक फिल्म की शूटिंग के दौरान कही थी। किस्सा कुछ यूं है कि एक बार प्राण साहब डायरेक्टर सलिल राय की एक बांग्ला फिल्म की शूटिंग कलकत्ता में कर रहे थे। उस फिल्म का नाम था जीवन रहस्य। एक दिन फिल्म की हीरोइन को सेट पर आने में बहुत देर हो गई। प्राण साहब चूंकि वक्त के पाबंद थे तो उस दिन उन्हें हीरोइन का समय पर ना आना बहुत बुरा लगा। और वो कुछ उखड़ से गए। उनका मूड खराब हो गया। मगर जब उन्हें पता चला कि सेट के बाहर कोई 20-25 लड़कियां उनसे मिलने व उनका ऑटोग्राफ लेने के लिए खड़ी हैं तो उनका मूड ठीक हो गया। वो हैरानी और खुशी से बोले,"हे भगवान। मुझे नहीं पता था कि इतनी लड़कियां मेरी फैन हैं।"


प्राण साहब के बारे में एक दफा शशिकला जी ने कहा था,"मैंने इतना हैंडसम और खूबसूरत विलेन इस फिल्म इंडस्ट्री में कोई दूसरा नहीं देखा। प्राण साहब के चलने का ढंग, बोलने का अंदाज़, कपड़े पहनने का सलीका और दूसरों संग उनका बर्ताव, सब कुछ शानदार था। मैंने कभी प्राण साहब को किसी और के बारे में कुछ गलत बोलते नहीं सुना।"


वहीं एक्ट्रेस नादिरा जी ने प्राण साहब के बारे में कहा,"प्राण शराब बहुत पीते हैं। लेकिन शराब से उनकी खूबसूरती पर कोई बुरा असर नहीं पड़ा। जितनी ज़्यादा शराब वो पीते हैं उतने ही खूबसूरत लगते हैं। उनके साथ बैठकर जाम लेना और उनसे बातें करना बहुत मज़ेदार होता है। मैं प्राण जी को पसंद करती हूं। उनसे विशेष लगाव रखती हूं। क्योंकि प्राण किसी खुली किताब की तरह हैं। एक दफा मैंने उनके बारे में कुछ लिखा था। तब उन्होंने मुझे एक बुके गिफ्ट किया था। कहने को ये छोटी-छोटी बातें हैं। मगर ये बातें लंबे वक्त तक याद रह जाती हैं। वे सचमुछ बहुत सॉबर और प्यारे इंसान हैं।"


एक्ट्रेस शुभा खोटे जी ने प्राण साहब के बारे ेमं कहा था,"प्राण बहुत डाउन टू अर्थ इंसान हैं। उनके अंदर ज़रा भी घमंड नहीं है। उन्होंने कभी भी अपने सीनियर होने का घमंड किसी दूसरे एक्टर को नहीं दिखाया। कोई रौब नहीं झाड़ा। वो तो नए कलाकारों की मदद करते हैं। मैंने उनके साथ कई फिल्मों में काम किया। लेकिन मुझे कभी ये नहीं लगा कि मैं उस शानदार एक्टर के साथ काम कर रही हूं जिसे मैंने अपने बचपन में मुनीमजी, आज़ाद और हलाकू जैसी फिल्मों में देखा था। वो सबसे एकदम सामान्य होकर  बात करते थे। मैं सोचा करती थी कि इतना खूबसूरत होने पर भी ये विलेन की भूमिकाएं क्यों करते हैं। हीरो क्यों नहीं बन जाते। मगर फिर सोचती थी कि ठीक ही है। हीरो से कॉम्पिटीशन करने के लिए विलेन को उससे ज़्यादा खूबसूरत तो दिखना ही चाहिए। क्या प्राण ऐसे ही नहीं हैं?"


नोट- प्राण साहब के बारे में ये सब बातें इन अभिनेत्रियों ने उस इंटरव्यू में कही थी जो प्राण साहब की जीवनी लिखने के लिए लिया गया था। ये इंटरव्यू प्राण साहब की बायोग्राफी "...और प्राण" में लिखित है। अच्छी किताब है। और सबसे अच्छी बात इस किताब के संग ये है कि ये हिंदी में भी उपलब्ध है। आप इसे खरीद सकते हैं। प्राण साहब के बारे में बहुत कुछ इस किताब में लिखा है। #ActorPran #andpran



प्राण साहब को सिगरेट पीने की बड़ी पुरानी लत थी। वो अक्सर शाम को अपना काम ख़त्म करने के बाद शिमला में एक पान की दुकान पर जाया करते और बेफ़िक्र होकर सिगरेट पिया करते। सिगरेट के प्रति उनकी दीवानगी बहुत पहले से थी इसीलिये बड़े आसानी से वो सिगरेट के धुएं के छल्ले आसमान में उड़ाते। एक शाम ऐसे ही जब वो बड़े स्टाइल से खड़े होके धुएं के छल्ले हवा में उड़ा रहे थे उसी वक़्त वहां उस ज़माने के पंजाबी फ़़िल्मों के पटकथा लेखक मोहम्मद वली आ पहुँचे और प्राण का अंदाज़ देखकर बहुत प्रभावित हुये। शायद उन्हें अपनी अगली फिल्म यमला जट के लिये एक ऐसे ही लड़के की तलाश थी।


उन्होंने प्राण से अगले दिन मिलने को बुलाया। प्राण साहब ने उनकी बात को बहुत गंभीरता से नहीं लिया। वो अगले दिन तो नहीं पहुँचे लेकिन कुछ दिनों बाद ही एक फिल्म देखने के दौरान प्राण की मुलाकात फिर मोहम्मद वली से हुई . और इस बार प्राण को उनकी बात माननी ही पड़ी । उनका सिलेक्शन होता हुआ फिल्म यमला जट के लिये। मेहनताना 50 रुपये प्रति माह तय हुआ . प्राण साहब ने यह शर्त रखा कि वो ख़ाली दिनों में अपना वक़्त अपने फोटोग्राफी के काम में देंगे जिसे सबको मानना ही पड़ा । उसका एक बड़ा कारण यह भी था कि वो नहीं चाहते थे कि उनके पिताजी को उनका फ़िल्मों में काम करने के बारे में पता चले। दोस्तों आप अंदाज़ा लगा सकते हैं आज़ादी के पहले का वो ज़माना वो 40 का दशक।


ख़ैर 1940 में यमला जट रिलीज़ हुयी और सफल भी रही प्राण साहब का काम सभी को पसंद आया और प्राण साहब को एक के बाद एक 20-22 पंजाबी और हिंदी फ़िल्में मिलीं जिसमें सबसे प्रमुख है 1942 में निर्माता दलसुख पंचोली की ख़ानदान . इस फिल्म में उन्होंने उस ज़माने की जानी मानी अभिनेत्री और गायिका नूरजहाँ जी के साथ नायक का क़िरदार निभाया। प्राण साहब लाहौर सिने जगत का एक जाना माना नाम बन गये ।अब तक उनके पिताजी को भी उनका फिल्मों में काम करने के बारे में पता चल गया था और इसका उन्हें कोई एतराज़ नहीं था .ठीक वैसे ही जैसे उन्हें प्राण का मैट्रिक के बाद पढ़ाई छोड़ के फोटोग्राफी करने के निर्णय से कोई एतराज़ नहीं था। इसी बीच 1945 में प्राण साहब की शादी हो गयी . उनके यहाँ एक पुत्र का जन्म हुआ।


11 अगस्त 1947 को .अपने बेटे का पहला जन्म दिन मनाने प्राण लाहौर से इंदौर आये थे , क्योंकि उस वक़्त उनकी पत्नी और बेटा वहीं मौजूद थे . ये वही वक़्त था जब विभाजन के दंगों की आग से पूरा देश झुलस रहा था। प्राण को जब पता चला कि लाहौर में माहौल पूरी तरह से बिगड़ चुका है और अब उनका वहां जाना ख़तरे से ख़ाली नहीं है तो वो उन्होंने निर्णय लिया कि वो अब लाहौर ना जा कर बम्बई फिल्म जगत् में ही प्रयास करेंगे। उन्हें पूरा विश्वास था कि 20-22 फिल्मों में काम करने के बाद अब उन्हें बम्बई में फ़िल्मों में आसानी से काम मिल ही जायेगा।


लेकिन कहते हैं ना कि इंसान को अपने हिस्से का संघर्ष भी भोगना ही पड़ता है। किसी को बहुत संघर्ष के बाद काम मिलता है तो किसी को काम मिलने के बाद सफलता के लिये संघर्ष करना पड़ता है और किसी को एक बार सफल होने के के बाद भी दोबारा नये सिरे से उस मुकाम को पाने के लिए जूझना पड़ता है। समय किसी को भी कभी भी अर्श से फ़र्श पे ला पटकता है। प्राण के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। एक सफल अभिनेता होने के बावजूद उन्हें दोबारा काम पाने के लिए बहुत संघर्ष करना पड़ा।


उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि उन्हें इतने पापड़ बेलने पड़ेंगे ,वे तो बहुत निश्चिंत हो के सपरिवार बम्बई गए और बड़े होटल में रूम लिया ताकि उनकी पत्नी और बच्चे को कोई परेशानी न हो सके।


वक़्त गुज़रता गया पैसे भी ख़त्म होने लगे। एक वक़्त ऐसा भी आया जब प्राण साहब को अपनी पत्नी के गहने तक बेचने पड़े। प्राण को जितना ख़ुद पर विश्वास था उतना ही उनकी पत्नी को भी । हमसफ़र का यही साथ और विश्वास उन्हें हौसला देता रहा ।


कुछ ही दिनों में प्राण साहब होटल छोड़ कर परिवार सहित एक छोटे से लाॅज में जाकर रहने लगे, छोटी मोटी जो भी नौकरियां मिलती वो करते रहे और साथ ही साथ लोगों से मिलना भी ज़ारी रखा ।


एक रोज़़ उनकी मुलाकात अपने पुराने साथी लेखक शहादत हसन मन्टो और अभिनेता श्याम से हुई . उन्होंने उनको बाॅम्बे टाॅकीज़ की अगली फिल्म जिद्दी के ऑडिशन के लिये बुलाया । अब समस्या ये थी कि वहाँ तक जाने के लिए प्राण साहब के पास लोकल ट्रेन के किराये तक के भी पैसे नहीं थे लेकिन जाना भी ज़रूरी था और इतना वक़्त भी नहीं था कि वो पैसों का इंतज़ाम कर सकें ऐसे में वो काम छीन जाने का भी दर भी उन्हें बार -बार सता रहा था । उन्होंने यह निर्णय लिया कि भले ही पहले पहुँच कर वहां मुझे घंटों का इंतज़ार करना पड़े लेकिन मैं ये काम हाथ से न जाने दूंगा . उन्होंने एकदम सवेरे-सवेरे वाली ट्रेन से वहां जाने का फैसला किया , क्योंकि उस वक़्त ट्रेन में टिकट चेक करने के लिए टी टी नहीं आता था । अगले दिन उन्होंने तय समय पर पहुँच के ऑडिशन स्क्रीन टेस्ट दिया।उनके अभिनय में तो कोई कमी थी नहीं, जो उनका सिलेक्शन न होता। सबको उनकी परफार्मेंस पसंद आयी और वो चुन लिए गये। 500 रुपये महीने पे बात तय हुई। चूँकि प्राण साहब की ज़ेब ख़ाली थी इसलिए कुछ पैसे एडवांस की मांग की और उन्हें तुरंत 100 रूपये मिल गये।


फिल्म ज़िद्दी 1948 में रिलीज़ हुई और उनके अभिनय की हर किसी ने सराहना की। एक के बाद एक कई फिल्मों में खलनायक के चरित्र को बखूबी निभाने के कारण प्राण साहब फिल्मी दुनियां के सबसे बड़े खलनायक बन गये। एक वक़्त ऐसा भी था जब वो पर्दे पर आते लोग उनको देखते ही गालियाँ देने लगते। लोगों ने अपने बच्चों का नाम भी प्राण रखना बंद कर दिया । रास्ते में भी अगर कोई उन्हें देख लेता तो गूंडा बदमाश बोल कर चिल्ला उठता। प्राण साहब ऐसी बातों को अपनी सफलता से जोड़ कर देखा करते थे। उन्हें इस बात का यकीन हो जाता कि उन्होंने अपना किरदार सफलता पूर्वक निभाया है और जो ये गालियाँ मिल रहीं हैं वो उन्हें नहीं बल्कि उस किरदार को मिल रही हैं .


प्राण साहब को नकारात्मक भूमिकायें ही ज़्यादा पसंद थीं हालांकि उन्होंने बाद में काॅमेडी और ढेरों चरित्र किरदार भी किये जिसे दर्शकों ने खूब पसंद किया। उनकी संवाद अदायगी को भी लोगों ने खूब पसंद किया। चाहे वो 50 के दशक की फिल्म हलाकू हो या 70 के दशक की ज़जीर और कालिया . और चाहे वो 90 के दशक की फिल्म सनम बेवफ़ा हो। इन फिल्मों की सफलता का श्रेय काफी हद तक प्राण साहब की संवाद अदायगी को भी दिया जाता है।


मनोज कुमार की फिल्म उपकार से प्राण ने अपनी छवि को एकदम बदल दिया। इसे उनके अभिनय का जादू ही तो कहेंगे जो उन्होंने एक फिल्म से ही लोगों के दिलों में बरसों से पल रही नफरत को प्यार में बदल दिया।


प्राण साहब ने 6 दशकों तक लगभग 400 फिल्मों में काम किया और दर्शकों ने उन्हें हर रूप में पसंद किया। उनकी आख़िरी फिल्म दोष 2007 में आयी थी।


अपने बेहतरीन अदायगी के लिए इन्हे 3 बार फिल्म फेयर अवार्ड से सम्मानित किया गया .


भारत सरकार ने प्राण साहब को सन २००१ में कला क्षेत्र में पद्म भूषण से भी सम्मानित किया।


और दादा साहब फाल्के अवार्ड से 2013 में सम्मानित किया गया।


इसके आलावा भी सैकड़ों पुरस्कार और उपलब्धियां हैं अभिनेता प्राण साहब की जिन्हें बता पाना हमारे एक वीडियो में संभव नहीं है।


100 साल जीने की चाह रखने वाले महान अभिनेता प्राण साहब ने 93 वर्ष की आयु में 12 जुलाई 2013 को मुंबई के लीलावती हस्पताल में अपने प्राण त्याग दिए। 2016 में उनकी पत्नी शुक्ला सिकंद का भी निधन हो गया। तब वो 91 वर्ष की थी। प्राण साहब के 3 बच्चे हैं जिनमें 2 बेटे सुनील सिकंद और अरविंद सिकंद तथा एक बेटी पिंकी सिकंद हैं।


सुनील सिकंद फ़िल्मों मे निर्देशन का कार्य करते हैं उनकी 2 फिल्म्स रिलीज़ हो चुकी हैं 1984 में आयी फरिश्ता और लक्ष्मण रेखा जो कि 1991 में आयी थी।

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