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देव आनंद: रोमांसिंग विद लाइफ और मानवीयता की मिसाल

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  देव आनंद: रोमांसिंग विद लाइफ और मानवीयता की मिसाल हिंदी सिनेमा के स्वर्णिम दौर का नाम आते ही सबसे पहले जिन अभिनेताओं की छवि मन में उभरती है, उनमें देव आनंद का नाम सबसे ऊपर आता है। 26 सितंबर 1923 को जन्मे देव आनंद को अपने समय का रोमांटिक आइकन कहा जाता था। उनकी तेज़ आंखें, मुस्कुराता हुआ चेहरा, लहराते बाल और अनोखा अंदाज़—हर चीज़ में ऐसा करिश्मा था जो दर्शकों के दिलों को छू लेता था। उनकी डायलॉग डिलीवरी, रोमांटिक अदाएं और आत्मविश्वास से भरा व्यक्तित्व उन्हें उस दौर के सबसे मोहक सितारों में शुमार करता था। 1940 के दशक से लेकर 1980 तक के अपने शानदार करियर में उन्होंने हिंदी सिनेमा को कई यादगार फिल्में दीं। ‘गाइड’, ‘ज्वेल थीफ’, ‘हम दोनों’, और ‘हरे रामा हरे कृष्णा’ जैसी फिल्में न सिर्फ बॉक्स ऑफिस पर सफल रहीं, बल्कि हिंदी फिल्मों को नई ऊंचाइयों तक ले गईं। रोमांस, रहस्य और सामाजिक संदेश—देव आनंद हर शैली में दर्शकों को मोह लेते थे। अभिनय में अपार सफलता के बाद उन्होंने अपना खुद का प्रोडक्शन हाउस नवकेतन फिल्म्स की स्थापना की। इस बैनर तले उन्होंने नए टैलेंट को मौका दिया, बोल्ड विषयों पर फिल्में...

आशा पारेख

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  द हिट गर्लःआशा पारेख -----------------------------* आशा पारेख 60 के दशक की मशहूर अभिनेत्रियों में से एक है. 1959 से लेकर 1973 तक वह बॉलीवुड फिल्मों की टॉप अभिनेत्रियों में शामिल रही. बहुत कम उम्र से ही उन्होंने फिल्मों में काम करना शुरू कर दिया. 17 साल की उम्र में उन्होंने बतौर अभिनेत्री फिल्म ‘दिल दे के देखो’ जोकि शम्मी कपूर के साथ थी, में अभिनय किया. और वह फ़िल्म दर्शकों को खूब पसंद आई. फ़िल्म बहुत हिट हो गई साथ ही आशा पारेख जी का भी सफल फ़िल्मी सफ़र शुरू हो गया. उन्होंने बहुत सारे अवार्ड भी जीते है. उन्होंने बहुत ही उम्दा उम्दा फ़िल्में की है लेकिन उनकी अपनी पसंदीदा फ़िल्में है दो बदन, चिराग, कटी पतंग, मै तुलसी तेरे आँगन. वे एक साधारण से मध्यम वर्गीय गुजराती जैन परिवार में जन्मी थी. बचपन में कभी वो डॉक्टर तो कभी आई एस अधिकारी बनने के बारे में सोचती थी. बहुत छोटी सी उम्र से ही उनकी माता जी ने उन्हें डांस सिखाने के लिए विभिन्न डांस इंस्टिट्यूट में उनका दाखिला कराती रहती थी. वे उन्हें एक अच्छी डांसर बनते देखना चाहती थी. बहुत से डांस के शिक्षकों ने उन्हें डांस की तालीम दी, जिनमे से एक ड...

देव आनंद की गाइड: जिसे सबने ठुकराया, लेकिन बनी बॉलीवुड की ऐतिहासिक फिल्म

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  देव आनंद की गाइड: जिसे सबने ठुकराया, लेकिन बनी बॉलीवुड की ऐतिहासिक फिल्म हिंदी सिनेमा के इतिहास में कुछ फिल्में ऐसी भी रही हैं, जिन्हें बनाने से पहले किसी ने उम्मीद नहीं की थी कि ये दर्शकों के दिलों पर राज करेंगी। लेकिन जब वो रिलीज हुईं, तो उन्होंने न केवल बॉक्स ऑफिस पर झंडे गाड़ दिए बल्कि सिनेमा के इतिहास में अपनी अमिट छाप छोड़ दी। ऐसी ही एक फिल्म है देव आनंद की गाइड (1966)। . रिजेक्ट होती रही गाइड कहा जाता है कि जब इस फिल्म की स्क्रिप्ट तैयार हुई तो हिंदी सिनेमा के लगभग सभी बड़े कलाकारों ने इसे रिजेक्ट कर दिया। फिल्म की कहानी उस दौर के पारंपरिक विषयों से बिल्कुल अलग थी। एक ऐसी कहानी, जिसमें समाज और रिश्तों को एक नए दृष्टिकोण से दिखाया गया था। यही वजह थी कि बहुत से कलाकार इस फिल्म का हिस्सा बनने से पीछे हट गए। . देव आनंद का फैसला देव आनंद ने इस फिल्म को करने का बड़ा जोखिम उठाया। निर्देशक विजय आनंद के निर्देशन और आर.के. नारायण के उपन्यास पर आधारित इस फिल्म को लेकर लोगों को संदेह था कि यह दर्शकों के सिर चढ़कर बोलेगी या नहीं। . पहली रंगीन फिल्म और अनोखा प्रीमियर गाइड देव आनंद की पह...

सोनू निगम

  आज मैं भी सोनू निगम जी के उस गाने से जुड़ी एक कहानी कहना चाहता हूं जो अभी कुछ दिनों पहले बहुत ज़्यादा वायरल हुआ था। अभी भी चल ही रहा है। गाना है "तूने, मिल के रकीबों संग मेरे, ओ दिल पे चलाई छुरियां।" मैंने सबसे पहली दफ़ा जब ये गाना सुना था एक शादी के कार्यक्रम में। मेरा एक दोस्त था तब जिसे मेरे घरवाले बड़ा नापसंद करते थे। लेकिन मेरा बढ़िया यार था वो। और वो डांस बहुत बढ़िया करता था। वो भी वेस्टर्न स्टाइल वाला। बड़ी बात ये थी कि उसने कहीं डांस सीखा नहीं था। टीवी व सीडी प्लेयर पर डांस देखकर ही उसने अभ्यास किया और इतना बढ़िया डांस करने लगा कि हमारे यहां के, और आस-पास के लोग उसे डांस करने अपने घर बुलाने लगे। जैसे किसी जनमदिन पार्टी वगैरह में। और वो शौक से जाता। उसे कोई फ़र्क नहीं पड़ता था कि बुलाने वाले ने उसे कुछ दिया है कि नहीं, खाना-पीना वगैरह पूछा है कि नहीं। ज़्यादातर लोग वैसे पूरा सत्कार करते थे उसका। मगर कुछ होते थे जो इतने बेढंगे होते थे कि डांस हो गया, चलो घर जाओ अब, इस टाइप का एटीट्यूड दिखाते थे। मगर बबलू, बबलू नाम था उसका, उसे कोई फ़र्क नहीं पड़ता था। क्योंकि डांस उसक...

जानी वाकर

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 "इस शराबी को उठाकर बाहर फेंक दो।" गुरूदत्त जी ने नवकेतन फिल्म्स के स्टाफ से कहा। और वाकई में उस शराबी को बाहर कर दिया गया। हालांकि वो कई शराबी नहीं था। वो थे बदरुद्दीन जमालुद्दीन काज़ी। जो उस वक्त तक जॉनी वॉकर नहीं बने थे। क्या था वो किस्सा? चलिए, जानते हैं।   ये तो हम सभी जानते हैं कि बलराज साहनी जी ने एक दिन बदरुद्दीन काज़ी को बस में देखा था। उन दिनों बदरुद्दीन बस कंडक्टर हुआ करते थे। और टिकट बनाते वक्त वो तरह-तरह की आवाज़ें निकालकर लोगों का मनोरंजन करते थे। उनका वही अंदाज़ बलराज साहनी जी को पसंद आ गया। एक दिन बलराज साहनी बदरुद्दीन को अपने साथ लेकर पहुंच गए नवकेतन फिल्म्स के ऑफिस। वहां उन्होंने गुरूदत्त की ओर इशारा करते हुए बदरुद्दीन से कहा,"देखो, वो फिल्म का डायरेक्टर है। उसका नाम गुरूदत्त है। अगर तुमने उसे पटा लिया तो तुम्हारा काम बन गया समझो।"   बदरुद्दीन ने सोचा कि वो ऐसा क्या करें जिससे ये डायरेक्टर खुश हो जाए। वो फिल्मों में काम तो करना ही चाहते थे। चंद फिल्मों में वो क्राउड का हिस्सा बन भी चुके थे। लेकिन अब तो चांस था कि उन्हें फिल्म में कोई रोल मिल जाए। ब...

अमजद खान किस्सा tv से साभार

 "तुम्हें लगता है मैं ये रोल सही से निभा पाऊंगा?" एक बेचैनी भरी आवाज़ में अमजद खान ने अपनी पत्नी शैला से पूछा। वो बार-बार शैला से यही पूछ रहे थे। शैला बोली,"बिल्कुल। तुम अच्छे एक्टर हो। मैंने तुम्हारे सभी नाटक देखे हैं।" पत्नी की वो बात सुनकर अमजद बोले,"लेकिन ये नाटक नहीं है। ये फिल्म है। एकदम अलग चीज़ है नाटक से।"  "तो क्या हुआ? तुम लव एंड गॉड फिल्म से जुड़े रहे हो। तुम्हारे पिता भी एक्टर हैं। तुम भी कर लोगे।" परेशान अमजद से शैला बोली। लेकिन उस वक्त बेचैनी अमजद खान पर इतनी हावी थी कि पत्नी की बातों से उन्हें कोई शांति नहीं मिल रही थी। वो बोले,"इस सबसे कोई फर्क नहीं पड़ता। पता नहीं मैं रोल सही से कर भी सकूंगा कि नहीं।" उसी शाम अमजद खान को शोले की शूटिंग के लिए बैंगलोर निकलना था। लेकिन वो मन ही मन बहुत ज़्यादा बेचैन हो रहे थे। शोले बहुत बड़ी फिल्म थी। उनके पास असफल होने का ऑप्शन नहीं था। उन्हें हर हाल में अच्छा काम करना था। जब बेचैनी कम नहीं हुई तो अमजद खान ने कुरान को अपने माथे से लगा लिया। और आंख बंद करके प्रार्थना करने लगे।  अमजद को ऐ...

राज कुमार किस्सा टीवी से साभार

 ये उस ज़माने की कहानी है जब राजकुमार जी का नाम कुलभूषण पंडित हुआ करता था। मतलब कि वो फ़िल्म इंडस्ट्री में नहीं आए थे। वो पुलिस अफ़सर थे। और बंबई के जिस थाने में तैनात थे, उसके ठीक सामने मिस्टर खान नाम के एक मजिस्ट्रेस भी रहते थे। उनसे राजकुमार उर्फ़ कुलभूषण पंडित की जान-पहचान थी। जबकी मिस्टर खान के एक भाई अली से कुलभूषण पंडित की दोस्ती थी। उन्हीं अली साहब की जान-पहचान तब फ़िल्म इंडस्ट्री के कुछ लोगों से भी थी।  चूंकि कुलभूषण पंडित शानदार व्यक्तित्व के मालिक थे, तो मिस्टर अली अक्सर उनसे कहा करते थे कि आपको तो फ़िल्मों में होना चाहिए। लेकिन उस ज़माने में कुलभूषण पंडित को फ़िल्में देखने का कोई शौक नहीं था। इसलिए वो मिस्टर अली से हंसकर मना कर दिया करते थे। उस ज़माने में कुलभूषण पंडित जी को फ़िल्मों में ज़रा भी दिलचस्पी नहीं हुआ करती थी। मगर मिस्टर अली बार-बार कुलभूषण पंडित से फ़िल्मों में आने की बात कहते रहते थे। आखिरकार एक दिन कुलभूषण पंडित ने मिस्टर अली की बातों पर ज़रा गौर दिया। और वो उनके साथ जाकर उस दौर के बड़े डायरकेक्टर के.बी.लाल से मिले। के.बी.लाल को भी कुलभूषण पंडित का व...