अमजद खान किस्सा tv से साभार

 "तुम्हें लगता है मैं ये रोल सही से निभा पाऊंगा?" एक बेचैनी भरी आवाज़ में अमजद खान ने अपनी पत्नी शैला से पूछा। वो बार-बार शैला से यही पूछ रहे थे। शैला बोली,"बिल्कुल। तुम अच्छे एक्टर हो। मैंने तुम्हारे सभी नाटक देखे हैं।" पत्नी की वो बात सुनकर अमजद बोले,"लेकिन ये नाटक नहीं है। ये फिल्म है। एकदम अलग चीज़ है नाटक से।" 


"तो क्या हुआ? तुम लव एंड गॉड फिल्म से जुड़े रहे हो। तुम्हारे पिता भी एक्टर हैं। तुम भी कर लोगे।" परेशान अमजद से शैला बोली। लेकिन उस वक्त बेचैनी अमजद खान पर इतनी हावी थी कि पत्नी की बातों से उन्हें कोई शांति नहीं मिल रही थी। वो बोले,"इस सबसे कोई फर्क नहीं पड़ता। पता नहीं मैं रोल सही से कर भी सकूंगा कि नहीं।"


उसी शाम अमजद खान को शोले की शूटिंग के लिए बैंगलोर निकलना था। लेकिन वो मन ही मन बहुत ज़्यादा बेचैन हो रहे थे। शोले बहुत बड़ी फिल्म थी। उनके पास असफल होने का ऑप्शन नहीं था। उन्हें हर हाल में अच्छा काम करना था। जब बेचैनी कम नहीं हुई तो अमजद खान ने कुरान को अपने माथे से लगा लिया। और आंख बंद करके प्रार्थना करने लगे। 


अमजद को ऐसा करते देख उनकी पत्नी शैला बड़ी हैरान हुई। अमजद खान स्पिरिचुअल ज़रूर थे। लेकिन इस तरह कुरान के साथ कोई दुआ-प्रार्थना करते हुए उन्होंने अमजद को बहुत कम ही देखा था। शैला के लिए अमजद का वो सब करना एक दुर्लभ बात थी। कुछ देर बाद कुरान को उसकी जगह रखकर अमजद खान शैला जी से बोले,"मुझे लगता है मैं कर लूंगा।"


अमजद खान एयरपोर्ट के लिए निकल गए। मुंबई एयरपोर्ट से प्लेन टेकऑफ तो हुआ। लेकिन बैंगलोर पहुंचा नहीं। हाइड्रोलिक फेल्योर की वजह से पायलट मुंबई के ऊपर ही प्लेन को घुमाता रहा। कुछ घंटे तक प्लेन यूं ही मुंबई के चारों तरफ उड़ता रहा। और फिर वापस मुंबई एयरपोर्ट पर ही आकर लैंड हो गया।


अमजद खान एयरपोर्ट पर रुक गए। उन्होंने घर फोन करके नहीं बताया कि उनकी फ्लाइट के साथ क्या हुआ। कोई पांच घंटे बाद घोषणा हुई कि प्लेन की टैक्निकल समस्या दूर कर ली गई है। प्लेन फिर से उड़ान भरने के लिए तैयार है। लेकिन अधिकतर यात्री उस प्लेन में में फिर से सवार होने की हिम्मत ना जुटा सके।


आखिर में चार या पांच लोग ही उस जहाज में फिर से बैठे। उनमें से एक अमजद खान थे। अमजद को हर हाल में बैंगलोर पहुंचना था। कुछ देर बाद प्लेन ने फिर से उड़ान भरी। रास्ते भर अमजद को इस बात की फ़िक्र नहीं हुई कि उनकी पत्नी और उनका एक महीने का बेटा घर पर अकेले हैं। वो सोच रहे थे कि अगर ये फ्लाइट क्रैश हो गई तो डैनी को गब्बर सिंह के रोल में फिर से साइन कर लिया जाएगा।


आज अमजद खान का जन्मदिन है साथियों। 12 नवंबर 1940 को मुंबई में अमजद खान का जन्म हुआ था। अमजद खान साहब का ज़िक्र हो तो ज़ेहन में पहली छवि शोले के गब्बर सिंह की ही उभरती है। हालांकि अमजद खान जी ने और भी कई शानदार किरदार फिल्मों में निभाए थे। लेकिन गब्बर सिंह की छवि से वो कभी उबर नहीं सके थे। और उन्हें इस बात का दुख हमेशा रहा।

 

एक रोचक इत्तेफ़ाक अमजद खान जी की जन्मतिथि से जुड़ा है। जिस दिन अमजद खान का जन्मदिन होता है, ठीक उसी दिन किसी समय में बॉलीवुड के बहुत नामी स्क्रीनराइटर व शायर रहे अख़्तर-उल-ईमान साहब का जन्मदिन भी होता है। अख़्तर-उल-ईमान 12 नवंबर 1915 को जन्मे थे। लेकिन जो असली इत्तेफ़ाक है वो कुछ यूं है कि अमजद खान की पत्नी शैला इन्हीं अख़्तर-उल-ईमान की बेटी हैं। यानि अमजद खान अख़्तर-उल-ईमान के दामाद थे। और ससुर-दामाद, दोनों का जन्मदिन एक ही तारीख को होता था।


ख़ैर, इस लेख में हम अमजद खान के बारे में बात कर रहे हैं तो फिलहाल पूरा फोकस उन्हीं पर रखते हैं। अमजद खान को जब गब्बर सिंह का किरदार निभाने के लिए रमेश सिप्पी द्वारा फाइनल कर लिया गया तो उन्होंने अपनी तरफ से तैयारी करनी शुरू कर दी। डाकुओं के बारे में अधिक जानने के लिए अमजद ने "अभिशप्त चंबल" नाम की एक किताब खरीदी। वो किताब लिखी थी जया बच्चन के पिता "तरून कूमार भादुड़ी" ने। 


उस किताब में लिखी जो बातें अमजद खान को पसंद आती थी वो उन्हें पैन से अंडरलाइन कर लेते और अपनी पत्नी शैला से कहते कि तुम भी ये लाइनें पढ़ो। शीशे के सामने खड़े होकर सारा दिन अपने डायलॉग्स बोलने की प्रैक्टिस करते रहते। अमजद को अपने बचपन के दिनों का एक धोबी बहुत अच्छी तरह से याद था। वो धोबी अक्सर अपनी पत्नी को पुकारते हुए बोलता था,"अरे ओ शांति।" उस धोबी की इसी लाइन से प्रेरित होकर अमजद खान ने "अरे ओ सांभा" डायलॉग बोला था।


साथियों, अब जानते हैं कि अमजद खान शोले फिल्म का हिस्सा कैसे बने थे। वैसे तो ये किस्सा मैं कोई एक महीना पहले किस्सा टीवी पर लिख चुका हूं। लेकिन तब ये किस्सा अधिक लोगों ने नहीं पढ़ा। क्योंकि लोगों तक पहुंचा ही नहीं आज फिर से वही किस्सा इस लेख के साथ बताता हूं। किस्सा अच्छा है। पूरी उम्मीद है कि आपको ये किस्सा पसंद आएगा। लाइक-शेयर कर दीजिएगा पसंद आए तो। नापसंद आए तो कमेंट के माध्यम से बताइएगा कि क्या सही नहीं लगा। 


डैनी के शोले छोड़ने के बाद सिप्पी कैंप में खलबली मची थी। शूटिंग शुरू होने में एक महीने से भी कम वक्त रह गया था। और गब्बर सिंह कोई मामूली नहीं, फिल्म का केंद्रीय किरदार था। गब्बर का किरदार निभाने के लिए ऐसा शख्स चाहिए था जो ना सिर्फ अच्छा एक्टर हो, बल्कि एक करिश्माई व्यक्तित्व का मालिक भी हो। गब्बर सिंह उतना ही मजबूत दिखना चाहिए था जितने कि फिल्म के दूसरे स्टार्स थे। गलत कास्टिंग करने की कोई गुंजाइश नहीं थी। 


अगर गब्बर सिंह के लिए किसी गलत एक्टर को चुन लिया जाता तो पूरी फिल्म बर्बाद हो सकती थी। रमेश सिप्पी और उनके पिता गोपालदास परमानंद सिप्पी(जी.पी.सिप्पी) ने रंजीत और प्रेम चोपड़ा के नामों पर विचार किया। रंजीत के नाम पर तो मुहर लगने ही वाली थी। मगर जाने क्यों, रमेश सिप्पी के मन को संतुष्टी नहीं मिली। और रंजीत को कास्ट करने का विचार ड्रॉप कर दिया गया।


रमेश सिप्पी उस वक्त गब्बर सिंह के कैरेक्टर को लेकर इतने डैस्पेरेट थे कि वो प्रेमनाथ जी को भी गब्बर के रोल में इमैजिन करने लगे थे। प्रेमनाथ जी को साइन करने के बारे में सोचने लगे थे। लेकिन जब रमेश सिप्पी यथार्थ के धरातल पर वापस लौटे तो उन्हें अहसास हुआ कि प्रेमनाथ जी के साथ काम करना किसी भी डायरेक्टर के लिए बड़ा मुश्किल होता है। और वैसे भी शोले में पहले ही कई बड़े कलाकार थे। एक साथ इतनी स्टार ईगो झेलना भी तो हैक्टिक होता। उस वक्त सलीम खान ने अमजद खान का नाम सुझाया।


अमजद खान के पिता ज़कारिया खान उर्फ जयंत एक वक्त पर हीरो और बाद में मशहूर चरित्र अभिनेता थे। अमजद उनके छोटे बेटे थे। पिता बेशक नामी कलाकार रहे हों। लेकिन अमजद खान तब सिर्फ एक स्ट्रगलिंग एक्टर थे। एक दफा अमजद के पिता ने उन्हें हीरो के तौर पर लॉन्च करने के लिए 'पत्थर के सनम' नाम से एक फिल्म अनाउंस की थी। लेकिन वो फिल्म कभी बन ना सकी। अमजद ने के.आसिफ को फिल्म 'लव एंड गॉड' में असिस्ट किया था। लव एंड गॉड में अमजद के पिता जयंत ने भी काम किया था। और विकीपीडिया की मानें तो वो उनकी आखिरी फिल्म भी थी। अमजद ने भी एक छोटा सा रोल 'लव एंड गॉड' फिल्म में निभाया था।


कुल मिलाकर फिल्म जगत में अमजद खान की तब कोई पहचान नहीं थी। लेकिन थिएटर जगत में वो बहुत मशहूर थे तब। सबसे पहले साल 1963 में जावेद अख्तर ने अमजद को दिल्ली के ताल कटोरा स्टेडियम में हुए यूथ फैस्टिवल के दौरान हुए 'ऐ मेरे वतन के लोगों' नाम के नाटक में आर्मी अफसर का किरदार निभाते देखा था। कुछ साल बाद रमेश सिप्पी ने भी मुंबई में हुए एक नाटक में अमजद खान को देखा था। उस नाटक में रमेश सिप्पी की बहन सुनीता सिप्पी उर्फ सोनी ने अमजद खान की मां का किरदार जिया था। लेकिन गब्बर सिंह के किरदार के लिए जब माथापच्ची चल रही थी तब ना तो रमेश सिप्पी को और ना ही जावेद अख्तर को अमजद खान का नाम याद आया।


डैनी के शोले छोड़ने के कुछ दिनों बाद इत्तेफाक से बांद्रा के बैंडस्टैंड इलाके में सलीम खान और अमजद खान की मुलाकात हुई। सलीम खान अमजद के पिता को जानते थे। अमजद जब छोटे थे तब उनके पिता से मिलने सलीम खान उनके घर जाते भी थे। उस दिन अमजद खान और सलीम खान की बात हुई तो सलीम खान ने अमजद से पूछा कि वो क्या कर रहे हैं आजकल। अमजद ने बताया कि वो थिएटर कर रहे हैं। 


फिल्मी काम तब कुछ खास था नहीं अमजद के पास। सलीम खान ने अमजद के बारे में काफी सुन रखा था। उस दिन अमजद से मिलने के बाद गब्बर के किरदार की गुंजाइश सलीम खान को दिखी भी। उन्होंने अमजद से कहा कि मैं तुमसे कोई वादा तो नहीं करूंगा। लेकिन एक बड़ी फिल्म में एक बहुत अच्छा रोल है। मैं तुम्हें डायरेक्टर से मिला दूंगा। क्या पता तुम्हारी किस्मत से या कोशिश से ये रोल तुम्हें मिल जाए। ये इस फिल्म का सबसे फाइन रोल है।


सलीम खान ने रमेश सिप्पी से अमजद खान का ज़िक्र किया। अमजद को मिलने के लिए बुलाया गया। उनसे दाढ़ी बढ़ाने को कहा गया। सलीम-जावेद और रमेश सिप्पी ने अमजद के बारे में काफी विचार किया। अमजद लग तो फिट रहे थे। लेकिन उनकी कोई पहचान तब नहीं थी। सलीम-जावेद की तरफ से तो अमजद खान फाइनल थे। लेकिन आखिरी फैसला तो रमेश सिप्पी को ही लेना था। 


इत्तेफाक से उसी दिन एक्टर सत्येन कप्पू जी भी सिप्पीज़ के ऑफिस आए थे। रामलाल का कैरेक्टर निभाने के लिए उन्हें तब तक साइन किया जा चुका था। सलीम खान ने उस दिन सत्येन कप्पू से पूछा,"कप्पू साहब, क्या अमजद खान आपसे अच्छा आर्टिस्ट है?" कप्पू जी ने फौरन जवाब दिया,"हां, मुझसे अच्छा एक्टर है। यंग है। उसकी थिंकिंग भी फ्रैश है।"


चार दिन बाद अमजद खान का एक स्क्रीनटेस्ट हुआ। सिप्पीज़ के ऑफिस के गार्डन में अमजद खान की कुछ तस्वीरें ली गई। कहने के मुताबिक अमजद खान ने दाढ़ी बढ़ा ली थी। अपने दांत भी उन्होंने काले किए थे। उनका डिक्शन एकदम सही था। भाषा भी एकदम परफेक्ट थी। आखिरकार अमजद खान को गब्बर सिंह के रोल के लिए फाइनल कर दिया गया। वो तारीख थी 20 सितंबर 1973. अमजद खुशी-खुशी हॉस्पिटल की तरफ दौड़े। उसी दिन उनकी पत्नी शैला ने एक बेटे को जन्म दिया। अमजद ने बेटे का नाम रखा शादाब। 


तो ये थी अमजद खान साहब और शोले फिल्म की कुछ अनसुनी और रोचक बातें। उम्मीद है कि आपको ये लेख पसंद आया होगा। किस्सा टीवी आपके लिए समय-समय पर ऐसे लेख लाता रहेगा। प्रयास तो रहता है हमारा कि हर दिन कम से कम एक कोई अनोखी या एकदम नई कहानी अपने पाठकों को बताई जाए। लेकिन इस प्रयास में शत-प्रतिशत सफलता नहीं मिल पाती है। हां, स्कोर हमारा बुरा नहीं है। 95 प्रतिशत तो मैं हर दिन कुछ ना कुछ नया लिखता ही हूं। ये और बात है कि फेसबुक रीच घटाकर सारा खेल बिगाड़ देता है। 


साथियों आज अमजद खान पर ये दिन की तीसरी स्टोरी है। अगर आपने ये स्टोरी पढ़ी है और इससे पहले आई अन्य दो स्टोरीज़ नहीं पढ़ी हैं तो आपको वो दोनों स्टोरीज़ भी ज़रूर पढ़नी चाहिए। उनमें भी कुछ बहुत ही रोचक बातें बताई गई हैं। इस स्टोरी की बात करूं तो इसमें जितनी भी जानकारियां आपने पढ़ी हैं वो सब हमने पत्रकार अनुपमा चोपड़ा द्वारा लिखित किताब "शोले: मेकिंग ऑफ़ ए क्लासिक" से ली हैं। यह पुस्तक अंग्रेजी में है और ऑनलाइन उपलब्ध है। अमजद खान जी को किस्सा टीवी का नमन।

Comments

Popular posts from this blog

मौत एक ख्याल है जैसे ज़िंदगी एक ख्याल है" भारती गौड़ की वॉल से

उमराव जान किस्सा tv से साभार

सोनू निगम