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वाचस्पति शर्मा जी की वॉल से

तुम्हे याद करते करते ------------------------ भारतीय सिनेमा के इतिहास में यदि किसी गीत को कामुकता का भाव समेटे हुए उत्कृष्टतम गीत कहा जाए, तो वह "आम्रपाली" फिल्म का यह अमर गीत ही होगा. यह गीत अपनी सोलो परफॉर्मेंस और अभिनेत्री वैजयंती माला जी की अनुपम अभिनय क्षमता के कारण विशिष्ट हो जाता है। उन्होंने अपने एकल प्रदर्शन से रुपहले परदे पर अनगिनत भावों की अनूठी छटा बिखेरी है। ये एक सामंती शोषण से ग्रसित समाज में नगरवधू का तमगा लिए एक बेजोड़ कलाकार और एक नर्तकी के मनोभावों को दर्शाता गीत है.जिसमे वो अपने नगरवधू के सामाजिक स्टेटस से बाहर निकल एक आम स्त्री की तरह अपनी मनोव्यथा को व्यक्त करने के लिए व्याकुल है। वो स्त्रैण इच्छाएं जिनमे प्रेम ,कामुकता और अपने प्रियतम के सानिध्य पाने की दबी छुपी लालसा है। गीत की शुरुआत वैजयंती माला जी के "विचित्र-वीणा" वाद्य यंत्र के तारों को छेड़ते अपनी कामनाओं को व्यक्त करने की झिझक भरी कोशिश से होता है। यह दृश्य मानो किसी स्त्री के अंतरंग क्षणों की झलक है, जिसमें वह अपने प्रेम को छिपाने का असफल प्रयास करती है। ये सीन कुछ ऐसा ही ही जिसमे...

उमराव जान किस्सा tv से साभार

मुज़फ्फर अली जब उमराव जान बनाने की प्लानिंग कर रहे थे तब उनके ज़ेहन में हीरोइन की छवि पहले से ही आ गई थी। उन्हें एक ऐसी हीरोइन चाहिए थी जिसमें अदा और नज़ाकत हो। मुज़फ्फर अली को एक ऐसी हीरोइन की तलाश थी जो किसी शायरा और एक तवायफ़, दोनों तरह के किरदारों में फिट लगे। एक दिन उन्होंने रेखा की तस्वीरें एक मैगज़ीन में देखी। उन्हें रेखा में वो दोनों खूबियां दिखी जो उन्हें अपनी फिल्म उमराव जान की हीरोइन के लिए चाहिए थी। किसी ने जब मुज़फ्फर अली से पूछा कि रेखा में उन्हें क्या खास लगा। उन्होंने जवाब दिया, उनकी आंखें। आज उमराव जान फिल्म के 44 साल पूरे हो गए। ये फिल्म रिलीज़ हुई थी 2 जनवरी 1981 के दिन। उमराव जान को डायरेक्ट व प्रोड्यूस किया था मुज़फ्फर अली ने। और इस फिल्म का संगीत दिया था खय्याम साहब ने। रेखा जी के साथ काम करना मुज़फ्फर अली के लिए कतई आसान नहीं था। कई दफ़ा ऐसा हुआ था जब रेखा अचानक ही सेट से गायब हो जाती थी। जबकी उनके अहम दृश्य शूट होने होते थे। कहा जाता है कि रेखा उस सुपरस्टार से मिलने चली जाती थी जिसके साथ उन दिनों उनका कथित अफ़ेयर चल रहा था। और कमाल देखिए। रेखा जी को उमराव जान क...

राजेश खन्ना

 ये कहानी तब की है जब राजेश खन्ना कोई फिल्मस्टार नहीं, कॉलेज स्टूडेंट हुआ करते थे। तब वो राजेश खन्ना भी नहीं, जतिन खन्ना थे। उनका एक कॉलेज फ्रेंड एक ड्रामा कंपनी से जुड़ा था, जिसका नाम था आईएनटी ड्रामा कंपनी। उस ड्रामा कंपनी के डायरेक्टर थे वी.के.शर्मा। मशहूर लेखक व डायरेक्टर सागर सरहदी भी तब उसी ग्रुप का हिस्सा थे। राजेश खन्ना साहब की बायोग्राफी लिखने वाले लेखक यासिर उस्मान को सागर सरहदी जी ने एक इंटरव्यू दिया था, जिसमें उन्होंने वी.के.शर्मा साहब के बारे में कहा था,"उस ड्रामा ग्रुप के सबसे महत्वपूर्ण शख्स हुआ करते थे वी.के.शर्मा। वो उत्तर प्रदेश से थे। कद तो उनका छोटा था। पर प्रतिभा के मामले में वो बहुत बड़े थे। वो नाटक लिखते थे। नाटकों का निर्देशन करते थे। और उनमें अभिनय भी करते थे। जतिन(राजेश खन्ना) उन्हें अपना गुरू मानते थे। हालांकि शुरुआत में ना तो वी.के.शर्मा, और ना ही अन्य लोग जतिन को गंभीरता से लेते थे।" सागर सरहदी जी के मुताबिक, जतिन हर शाम रिहर्सल में आते थे और एक कोने में खड़े होकर अन्य एक्टर्स को अपने-अपने किरदारों की प्रिपेरेशन करते देखते थे। तब शायद जतिन इसी उम्...

नोशाद साहब किस्सा tv से साभार

 बैजू बावरा के हर गीत को नौशाद साहब ने किसी ना किसी राग पर आधारित रखा था। हालांकि नौशाद जब बैजू बावरा का म्यूज़िक कंपोज़ कर रहे थे तब उनके सामने एक चुनौती भी थी। नौशाद चाहते थे कि बैजू बावरा के गीतों में भारतीय शास्त्रीय संगीत को प्रमुखता से जगह दी जाए। लेकिन नौशाद को ये भी पता था कि आम जनता, जिसे शास्त्रीय संगीत सुनने की आदत नहीं थी, वो एक हैवी क्लासिकल संगीत की डोज़ को शायद हजम ना कर पाए।  नौशाद की ख्वाहिश थी कि आम लोग भी शास्त्रीय संगीत को सुनने की आदत डालें। इसलिए उन्होंने एक योजना बनाई। उन्होंने गीतों का संगीत कुछ इस तरह से रचा कि शुरुआती गीत रागों पर आधारित भी रहें, और उनकी ट्यून इतनी हल्की-फुल्की हो कि लोगों को सुनने में मज़ा आए। जबकी आखिर में तानसेन व बैजू के बीच हुए संगीत के महा मुकाबले में उन्होंने विशुद्ध भारतीय शास्त्रीय संगीत रखा। "आज गावत मन मेरो झूमके।" राग देसी पर आधारित इस गीत को उस्ताद अमीर खान और पंडित डी.वी.पलुस्कर ने गाया था।  तानसेन की आवाज़ बने थे उस्ताद अमीर खान। और बैजू को आवाज़ दी थी पंडित डी.वी.पलुस्कर जी ने। नौशाद ने बहुत सोच-समझकर पंडित डी.वी....

ऋषिकेश मुखर्जी जी के 102वें जन्मदिन पर विशेष ----------------------

 जीवन से लंबे हैं बंधु ........                              ऋषिकेश मुखर्जी जी के 102वें जन्मदिन पर विशेष ----------------------------------------------------------------- राज कपूर और बिमल रॉय की फिल्मों के बाद मुझे जिनकी फिल्में सबसे ज्यादा पसंद आईं वो ऋषिकेश मुखर्जी ही है । मुसाफिर (1957) से उन्होंने अपने जीवन काल में जितनी भी फिल्में बनाईं वो सब मैनें देखी । इनमें से कुछ फिल्में जैसे "अनुराधा", "अनुपमा" , "आनंद", "सत्यकाम" और "आशीर्वाद" तो मैनें कई कई बार देखी और आज भी देखना पसंद करता हूं । अपनी इन बेहद पसंदीदा फिल्मों में से अनुराधा के दो गीत सुना चुका हूं और अब इस क्रम में तीसरा गीत फिल्म आशीर्वाद से सुना रहा हूं । मैं इस फिल्म को अशोक कुमार जी के लम्बे कैरियर की सबसे बड़ी उपलब्धि मानता हूं । कहने को फिल्म के नायक संजीव कुमार थे और नायिका सुमिता सान्याल ,थी , लेकिन पूरी फिल्म की आत्मा अशोक कुमार ही थे  । मेरी समझ से  गुलजार ने भी अपने कैरियर के सर्वोत्कृष्ट गीत ( कुछ कविताएं भी ) इस फिल्म के ल...

टॉम ऑल्टर किस्सा tv से साभार

 "टॉम भाई, क्या तुम वाकई में इतनी अच्छी हिंदी व उर्दू बोलते हो?" बड़ी हैरानी से अमजद खान ने टॉम ऑल्टर से पूछा। जवाब में जब टॉम ऑल्टर ने उनसे हिंदी में बात की तो वो जल्दी से यकीन नहीं कर पाए। ये बात साल 1977 में रिलीज़ हुई फिल्म "हम किसी से कम नहीं" की शूटिंग के दौरान की है। उस वक्त तक फिल्म इंडस्ट्री में बात फैल चुकी थी कि एक नया एक्टर आया है जो दिखने में तो अंग्रेज है। लेकिन हिंदी और उर्दू एकदम भारतीयों की तरह बोलता है। उस एक्टर का नाम टॉम ऑल्टर है। "हम किसी से कम नहीं" फिल्म में अमजद खान मुख्य विलेन थे।  अमजद खान ने भी टॉम ऑल्टर के बारे में काफी सुन रखा था। अमजद खान को जब पता चला कि "हम किसी से कम नहीं" फिल्म में टॉम उनके साथ काम करने वाले हैं तो वो टॉम साहब से मिलने को बड़े उत्सुक हो गए। वैसे तो 1976 में आई धर्मेंद्र की फिल्म चरस में भी टॉम ऑल्टर जी ने काम किया था। अमजद खान उसमें भी मुख्य विलेन थे। लेकिन चरस में टॉम साहब संग अमजद खान जी का कोई सीन नहीं था। इसलिए दोनों की मुलाकात भी नहीं हो सकी। "हम किसी से कम नहीं" में भी टॉम ऑल्टर ज...

देव आनन्द किसा tv से साभार

 "कल जब मुझसे मिलने आओगे तो अपनी सबसे बेस्ट शर्ट पहनकर आना।" एक दिन वो लड़की गेस्ट हाउस के डायनिंग रूम में देव आनंद से बोली। वो दिन उस लड़की के लिए बहुत खास था। और फिर वो दिन देव साहब के लिए भी यादगार बन गया।  ये किस्सा तब का है जब देव साहब अपनी पहली फिल्म "हम एक हैं" में काम करने के चलते पूना(पुणे) में थे। उन्हें एक गेस्ट हाउस में ठहराया गया था। दो कमरों के उस गेस्ट हाउस में से एक में देव साहब ठहरे थे। दूसरे कमरे में एक लड़की थी। एक बड़ा सा हॉल और एक डायनिंग रूम भी उस गेस्ट हाउस में थे। कुछ ही दिनों में खूबसूरत सी दिखने वाली उस लड़की से देव साहब की अच्छी दोस्ती हो गई। रात के खाने के वक्त डायनिंग रूम में उस लड़की से देव साहब की खूब बातें होती थी। वो लड़की देव साहब को आकर्षित करने लगी। वो रोज़ रात के खाने का इंतज़ार बेसब्री से करने लगे।  एक रात जब देव साहब शूटिंग खत्म करके वापस लौटे तो उन्होंने देखा कि वो लड़की डायनिंग रूम में नहीं है। रोज़ उन्हें वो वहीं मिलती थी। देवानंद कुछ समझ पाते इससे पहले ही उस गेस्ट हाउस का कुक आकर उनसे बोला,"आज वो यहां खाना नहीं खाएंगी।...