देव आनन्द किसा tv से साभार

 "कल जब मुझसे मिलने आओगे तो अपनी सबसे बेस्ट शर्ट पहनकर आना।" एक दिन वो लड़की गेस्ट हाउस के डायनिंग रूम में देव आनंद से बोली। वो दिन उस लड़की के लिए बहुत खास था। और फिर वो दिन देव साहब के लिए भी यादगार बन गया। 


ये किस्सा तब का है जब देव साहब अपनी पहली फिल्म "हम एक हैं" में काम करने के चलते पूना(पुणे) में थे। उन्हें एक गेस्ट हाउस में ठहराया गया था। दो कमरों के उस गेस्ट हाउस में से एक में देव साहब ठहरे थे। दूसरे कमरे में एक लड़की थी। एक बड़ा सा हॉल और एक डायनिंग रूम भी उस गेस्ट हाउस में थे। कुछ ही दिनों में खूबसूरत सी दिखने वाली उस लड़की से देव साहब की अच्छी दोस्ती हो गई। रात के खाने के वक्त डायनिंग रूम में उस लड़की से देव साहब की खूब बातें होती थी। वो लड़की देव साहब को आकर्षित करने लगी। वो रोज़ रात के खाने का इंतज़ार बेसब्री से करने लगे। 


एक रात जब देव साहब शूटिंग खत्म करके वापस लौटे तो उन्होंने देखा कि वो लड़की डायनिंग रूम में नहीं है। रोज़ उन्हें वो वहीं मिलती थी। देवानंद कुछ समझ पाते इससे पहले ही उस गेस्ट हाउस का कुक आकर उनसे बोला,"आज वो यहां खाना नहीं खाएंगी।" देवानंद को सुनकर अच्छा नहीं लगा। वो कुछ बोलते उससे पहले ही कुक बोला,"आज वो अपने ही रूम में खाएंगी। मैंने आपका खाना भी उनके रूम में पहुंचा दिया है।" देव साहब ने उस लड़की के कमरे की तरफ देखा। दरवाज़ा हल्का सा खुला था। "वो आज आपके साथ अपने रूम में ही खाना चाहती हैं। उन्होंने आपके लिए कुछ स्पेशल पकाया है।" कुक बोला। 


उस लड़की का वो आइडिया देव साहब को पसंद आया। उन्होंने कुक, जिसका नाम कुलकर्णी था, उसे थैंक्यू कहा। कुक उन्हें गुड नाइट कहकर वहां से चला गया। कुक के जाने के बाद देव साहब ने लड़की के दरवाज़े की तरफ देखा। अब वो दरवाज़े पर खड़ी थी। उसने एक नाइट ड्रैस पहन रखी थी। यहां से आगे का किस्सा मैं नहीं लिख रहा हूं। आप समझ ही जाएंगे कि आगे की कहानी क्या होगी। मैं वैसे नहीं लिख सकूंगा जैसे कि देव साहब ने अपनी ऑटोबायोग्राफी "रोमांसिंग विद लाइफ" में लिखा है। 


तो आपको ये अंदाज़ा तो हो गया कि ये कहानी मैं देवानंद जी की ऑटोबायोग्राफी "रोमांसिंग विद लाइफ" के हवाले से लिख रहा हूं। देव साहब लिखते हैं कि उस दिन उन्होंने पहली दफा खुद को एक कंप्लीट मैन के तौर पर फील किया। उन्हें इंसान के जीने और होने का अहसास हुआ। उस एक ही रात में वो अपनी ज़िंदगी की सभी पुरानी लड़कियों को भूल गए। लाहौर कॉलेज की उषा को भूल गए। स्कूल में साथ पढ़ने वाली मारिया को भूल गए। खाना यूं ही रखा रह गया था। उस रात के बाद वो सिर्फ गेस्ट हाउस में रहने वाले दो लोग नहीं रह गए थे। वो लड़की भी देवानंद को लेकर कुछ ज़्यादा ही दीवानी हो गई। देव साहब और उस लड़की का काफी वक्त गेस्ट हाउस के आस-पास मौजूद गन्ने और मक्का के खेतों में भी गुज़रा करता था।


देव साहब लिखते हैं,"उन दिनों पूना में रहना मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मैं किसी बेहद हसीन ख्वाब में आ गया हू्ं। जैसे किसी इंद्रधनुषी शहर में रहने लगा हूं। एक ऐसा शहर जहां दूर क्षितिज तक सिर्फ और सिर्फ चमक और चांदनी है। सबकुछ साफ दिखाई दे रहा है। सबकुछ खूबसूरत दिखाई दे रहा है। जैसे पाने के लिए सारा जहां पड़ा है। बस चलना शुरू करना है।"


"कल जब मुझसे मिलने आओगे तो अपनी सबसे बेस्ट शर्ट पहनकर आना।" एक दिन वो लड़की गेस्ट हाउस के डायनिंग रूम में देव साहब से बोली। "क्या मैं रोज़ अच्छे कपड़े नहीं पहनता?" देव साहब ने मुस्कुराते हुए उसे देखकर कहा। "हां, लेकिन कल सबसे बेस्ट वाली शर्ट पहनकर आना।" लड़की बोली। "कल ही क्यों?" देव साहब ने पूछा। "कल मेरा बर्थडे है। कल मैं भी अपनी सबसे बेस्ट साड़ी पहनूंगी।" लड़की ने कहा। देवानंद बोले,"वाओ, यानि कल तो मुझे तुम्हें कोई गिफ्ट देना चाहिए। कोई ऐसा गिफ्ट जो सबसे बेस्ट लड़की को दिया जाता हो।" देव साहब उसे चूमना चाहते थे। लेकिन वहां कुक भी मौजूद था तो उन्होंने खुद को थामे रखा।


"कोई गिफ्ट नहीं लाना। मैं यहां नहीं मिलूंगी।" लड़की ने ज़ोर देकर कहा। देवानंद ने उससे पूछा कि वो कहां मिलना चाहती है तो उसने कुछ ऐसा कहा जिससे देवानंद को बड़ा तगड़ा झटका लगा। वो बोली,"वहीं गन्ने के खेत में मिलेंगे। कल मेरे हसबेंड आ रहे हैं।" ये हसबेंड वाली बात पढ़कर आपको भी हल्का सा झटका लगा होगा। मैं जब किताब पढ़ रहा था तो मुझे भी लगा था। खैर, कहानी जारी रखते हैं। उस लड़की के मुंह से हसबैंड वाली बात सुनकर देवानंद को वाकई में तगड़ा झटका लगा था। त्वरित प्रतिक्रिया में उनके मुंह से बस दो शब्द ही निकले,"तुम्हारा हसबैंड?" 


"वो मेरे जन्मदिन की शाम मेरे साथ बिताना चाहते हैं।" लड़की ऐसे बोली जैसे कोई बड़ी बात ना हो। "तुम शादीशुदा हो?" देव साहब अब भी शॉक्ड थे। कोई भी होता। "हां। लेकिन मेरा हसबैंड किसी और लड़की के चक्कर में फंसा है। हमारा रिश्ता अब बस एक दिखावे का रिश्ता है।" लड़की ने कहा। "पता नहीं क्यों मुझे लग रहा है जैसे मैं तुम्हारे पति के साथ धोखा कर रहा हूं।" देवानंद दुखी मन से बोले। "अगर मैं तुम्हें बताती ही ना तो? लड़की देवानंद से बोली। "तुम्हें वाकई में नहीं बताना चाहिए था।" देवानंद बोले। लड़की बोली कि तब तो वो ईमानदारी ना होती। उसने ये भी कहा कि उसका हसबैंड जल्द ही उस दूसरी लड़की के लिए किसी ना किसी दिन उसे छोड़ ही देगा। 


आगे लड़की कहती है कि उसकी शादी इसी दिन हुई थी। उसके जन्मदिन के दिन। हो सकता है उसका हसबैंड आखिरी दफा इस रात को उसके साथ बिताना चाहता हो। इसलिए वो दिन का समय देवानंद के साथ बिताना चाहती है। "कहां?" देवानंद ने उससे पूछा। "कहां क्या? खेत में उसी जगह जहां हम हमेशा मिलते हैं।" लड़की बोली। देवानंद ने पूछा कि कब पहुंचना है? उसने कहा कि सूरज ढलने से कुछ देर पहले पहुंच जाना है। 


अगले दिन देवानंद ने अपनी कपड़ों वाली अलमारी में एक कमीज़ ढूंढनी चाही। लेकिन उन्हें वो मिली नहीं। उन्होंने अपनी बड़ी बहन से उस कमीज़ के बारे में पूछा। उनकी बड़ी बहन कुछ ही दिन पहले पूना में उनके साथ रहने के लिए आई थी। बहन ने कबर्ड में से एक कमीज़ देवानंद को निकालकर दी। "ये तो मेरी कमीज़ नहीं है।" उस कमीज़ को देखते ही देवानंद बोले। "लेकिन धोबी ने तो यही कमीज़ लाकर दी है।"बहन ने कहा। 


यानि धोबी उस दिन कोई दूसरी कमीज़ पकड़ा गया था। और अब देवानंद के पास उस कमीज़ को पहनने के अलावा कोई और विकल्प नहीं बचा था। धोबी को मन ही मन गालियां बकते हुए उस दिन उन्होंने वही शर्ट पहनी। उनकी बहन ने भी कहा था कि ये कमीज़ तुम्हें फिट आएगी। जब उन्होंने वो कमीज़ पहनकर देखी तो उन्हें वाकई में वो अच्छी लगी।


दोपहर के वक्त देवानंद शूटिंग के लिए प्रभात स्टूडियो पहुंचे। जिस वक्त वो स्टूडियो में दाखिल हो रहे थे ठीक उसी वक्त एक लड़का, जो उनकी ही उम्र और शारीरिक बनावट का था, वो वहां से बाहर की तरफ निकल रहा था। देवानंद को देखकर वो लड़का रुका। उसने देवानंद को हैलो कहा। देवानंद ने भी बड़ी तहज़ीब से उसके हैलो का जवाब दिया। उस लड़के ने देवानंद से पूछा,"क्या तुम ही यहां के नए हीरो हो?" देवानंद बोले,"तुमने मुझे पहचान लिया?" उस लड़ने ने कहा,"हां। क्योंकि तुम ही हीरो जैसे लग रहे हो।" "थैंक्यू।" उसकी बात से खुश होकर मुस्कुराते हुए देवानंद बोले।


"मेरा नाम गुरूदत्त है। मैंने यहां मिस्टर बेडेकर के असिस्टेंट के तौर पर जॉइन किया है।" फिर उसने यानि गुरूदत्त ने देवानंद की तरफ हाथ बढ़ाया। और दोनों ने उस दिन पहली दफा हाथ मिलाया। कुछ इस तरह से देवानंद और गुरूदत्त की पहली मुलाकात हुई थी।इस मुलाकात की आगे की कहानी आपको और पसंद आएगी। हाथ मिलाने के बाद जब गुरूदत्त अपने रास्ते बढ़ने वाले ही थे कि तभी वो एकदम से रुके और देवानंद को देखने लगे। देवानंद ने भी गुरूदत्त को उसी तरह देखा। वास्तव में गुरूदत्त उस कमीज़ को देख रहे थे जो उस वक्त देवानंद ने पहनी हुई थी। 


गुरूदत्त के उस तरह देखने से कन्फ्यूज़ हुए देवानंद ने पहले अपनी पहनी हुई कमीज़ को देखा। और फिर उस कमीज़ को देखा जो गुरूदत्त ने पहनी हुई थी। गुरूदत्त देवानंद की कमीज़ की तरफ इशारा करके बोले,"ये शर्ट अच्छी लग रही है।" देवानंद ने भी गुरूदत्त की कमीज़ को देखते हुए कहा,"तुम्हारी कमीज़ भी अच्छी है।" "तुमने इसे कहां से खरीदा?" गुरूदत्त ने देवानंद से पूछा। देवानंद ने गुरूदत्त से कहा,"तुम बताओ। तुमने इसे कहां से खरीदा?" गुरूदत्त ने मुस्कुराकर जवाब दिया,"मुझे ये बहुत अच्छी लग रही थी। इसलिए मैंने इसे चुरा लिया।" देवानंब ने कहा,"और मुझे मेरा धोबी ये कमीज़ गिफ्ट देकर गया। ताकि मैं इसे किसी के जन्मदिन पर पहन सकूं।" फिर गुरूदत्त और देवानंद खूब हंसे। दोनों गले भी मिले। और ऐसे गले मिले कि हमेशा के लिए दोस्त बन गए।    


शाम को देवानंद उस लड़की से मिले। माहौल की रुमानियत उन पर हावी थी। वो उस लड़की से बोले कि मैं आज अपने आपको तुम्हें गिफ्ट कर रहा हूं। तुम आज जहां चाहे मुझे ले जा सकती हो। लड़की ने कहा,"मैं आज अपने पति को फाइनल गुड बाय कह दूं। फिर मैं तुम्हारे पास आऊंगी। वो कल शाम तक गेस्ट हाउस में ही रहेगा।" लड़की भी उस वक्त खूब रुमानी मूड में थी। देवानंद ने उसे बताया कि वो भी कल गुरूदत्त नाम के एक नए दोस्त के साथ बियर पीने "लकी रेस्टोरेंट" जाएंगे। 


अगली शाम देवानंद गेस्ट हाउस के डाइनिंग रूम में पहुंचे तो वो लड़की उन्हें वहां नहीं दिखी। उसका कमरा देखा तो वो लॉक्ड था। निराश देवानंद डायनिंग रूम के एक कोने में रखी कुर्सी पर बैठ गए। कुछ देर बाद उन्होंने गेस्ट हाउस के बाहर एक कार रुकने की आवाज़ सुनी। उन्होंने देखा तो उस कार से वही लड़की उतरी। दूसरी तरफ से एक मोटा दिखने वाला आदमी निकला। डायनिंग रूम के पास आकर लड़की ने उस मोटे आदमी(अपने पति) से कहा कि वो रूम में जाकर उसका इंतज़ार करे। वो अभी आ जाएगी। पति जब कमरे में चला गया तो लड़की जल्दी से डायनिंग रूम में आई और देवानंद का हाथ पकड़कर उसने अपनी आंखें बंद कर ली। जैसे वो कुछ कहना चाहती है लेकिन कह नहीं पा रही है।


"कोई दिक्कत है?" देवानंद ने उससे पूछा। लड़की ने अपनी आंखें खोली। देवानंद का हाथ छोड़ा। फिर एक कुर्सी पर बैठकर उसने दोनों हाथों से अपना चेहरा ढक लिया। कुछ सेकेंड बाद उसने देवानंद की तरफ देखते हुए कहा,"तुम्हें बुरा तो नहीं लगेगा ना?" "क्या बुरा नहीं लगेगा?" देवानंद ने पूछा। लड़की बोली,"मेरे और मेरे पति के बीच में जो दिक्कतें थी वो सब उसने ठीक कर दी हैं। उसने मुझसे वादा किया है कि अब कभी वो किसी और लड़की के लिए मुझे धोखा नहीं देगा। वो मेरे साथ ही रहना चाहता है।" देवानंद खामोशी से उसे देख रहे थे। उन्हें उस वक्त उस लड़की की बातें अच्छी नहीं लग रही थी। क्योंकि उस लड़की संग एक इमोशनल अटैचमेंट तब तक देवानंद का भी हो चुका था।


देवानंद की आंखों में भी नमी आ चुकी थी। खुद पर काबू करते हुए वो लड़की से बोले,"तुम्हारा दिल जो कह रहा है तुम वही करो। अपने दिल की मानो।" लड़की ने कहा,"और मेरा एक बेटा भी है जो पंचगनी के एक बोर्डिंग स्कूल में पढ़ता है। वो पांच साल का है।" "तुम अपने बेटे से मिलने नहीं जाती?" देवानंद ने उससे पूछा। उसने एक गहरी सांस छोड़ी और बोली,"हां, कभी कभी मैं उससे मिलने जाती हूं। मेरा बेटा अपने मम्मी डैडी को बहुत मिस करता है।" ये कहकर लड़की ने फिर से अपनी आंखें बंद कर ली। "सुनो",देवानंद ने कहा। लड़की ने उन्हें देखा तो वो बोले,"मैं प्रार्थना करूंगा कि तुम और तुम्हारे हसबैंड अपने बेटे के साथ आगे का जीवन हमेशा हंसी-खुशी गुज़ारो।" फिर देवानंद ने लड़की(महिला) के हाथ को किस किया। आखिरी किस।


देवानंद की बात ने उस महिला को शायद बड़ी राहत दी थी। उसके चेहरे पर एक संतुष्टी भरी मुस्कान आई। देवानंद दूसरी तरफ मुंह करके एक जग से गिलास में पानी लेकर पीने लगे। वो सोच रहे थे कि काश जब पानी खत्म करके वो मुड़कर देखें तो लड़की जा चुकी हो। ऐसा ही हुआ भी। जब देवानंद ने पीछे मुड़कर देखा तो लड़की वहां से जा चुकी थी। वो हमेशा-हमेशा के लिए देवानंद की ज़िंदगी से जा चुकी थी। और यूं कुछ दिनों का वो रोमांटिक रिलेशन खत्म हो गया।


नोट: इस लेख के साथ सुरैया जी व देवानंद जी की तस्वीर आप देख रहे होंगे। सुरैया जी की तस्वीर प्रतीकात्मक है। उनका इस लेख से कोई लेना-देना नहीं है। हालांकि देवानंद जी की कहानी में सुरैया जी का ज़रुर एक चैप्टर है। आपने उसके बारे में खूब सुना भी होगा। लेकिन किस्सा टीवी देव साहब के नज़रिए से उनके जीवन के "चैप्टर सुरैया" से आपको किसी दिन अवगत कराएगा। देव साहब को किस्सा टीवी ससम्मान याद करता है। और भारतीय सिनेमा में उन्होंने जो योगदान दिया है उसके लिए उन्हें सैल्यूट करता है। #DevAnand

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