ऋषिकेश मुखर्जी जी के 102वें जन्मदिन पर विशेष ----------------------

 जीवन से लंबे हैं बंधु ........                             


ऋषिकेश मुखर्जी जी के 102वें जन्मदिन पर विशेष

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राज कपूर और बिमल रॉय की फिल्मों के बाद मुझे जिनकी फिल्में सबसे ज्यादा पसंद आईं वो ऋषिकेश मुखर्जी ही है । मुसाफिर (1957) से उन्होंने अपने जीवन काल में जितनी भी फिल्में बनाईं वो सब मैनें देखी । इनमें से कुछ फिल्में जैसे "अनुराधा", "अनुपमा" , "आनंद", "सत्यकाम" और "आशीर्वाद" तो मैनें कई कई बार देखी और आज भी देखना पसंद करता हूं । अपनी इन बेहद पसंदीदा फिल्मों में से अनुराधा के दो गीत सुना चुका हूं और अब इस क्रम में तीसरा गीत फिल्म आशीर्वाद से सुना रहा हूं । मैं इस फिल्म को अशोक कुमार जी के लम्बे कैरियर की सबसे बड़ी उपलब्धि मानता हूं । कहने को फिल्म के नायक संजीव कुमार थे और नायिका सुमिता सान्याल ,थी , लेकिन पूरी फिल्म की आत्मा अशोक कुमार ही थे  । मेरी समझ से  गुलजार ने भी अपने कैरियर के सर्वोत्कृष्ट गीत ( कुछ कविताएं भी ) इस फिल्म के लिए लिखे थे।इस फिल्म का जो गीत मैं सुनाने जा रहा हूं उसमें जीवन का वह दर्शन छिपा हुआ है जिसे आज हमने भुला दिया है ....


गीत सुनाने से पहले इसकी संक्षिप्त पृष्ठ भूमि भी बता देता हूं । सजा याफ्ता बीमार जोगी ठाकुर (अशोक कुमार )   दुनियां से विदा होने के पहले अपनी बिट्टू को दुल्हन के रूप में देखकर उसे आशीर्वाद देने अपने गांव जा रहा है । लंबा रास्ता किसी तरह कट जाए तो गाड़ीवान (असीम कुमार ) से कोई गीत सुनाने को कहता है । गाड़ीवान कहता है आपको कैसे मालूम कि मैं गा लेता हूं । जोगी ठाकुर कहते है तुम रास्ते में किसी से कह रहे थे न ! गाड़ीवान कहता है  अच्छा तो आप चंदन पुर जा रहे हैं तो जोगी ठाकुर का नाम तो सुना ही होगा । ये गीत जो मैं आपको सुनाने जा रहा हूं ये उन्हीं का लिखा है और तर्ज़  भी उन्हीं की बनाई हुई है । इसके बाद  गाड़ीवान ये गीत सुनाता है इस बात से बेखबर कि उसे अपना प्रिय गीत उसके रचयिता को ही सुनाने का सौभाग्य मिल रहा है ।  जोगी ठाकुर भी वर्षों पहले लिखे इस गीत की स्मृतियों में खो जाते हैं । गीत के आखिर में जीवन के अंतिम सत्य से साक्षात्कार कराती जलती चिता पर कैमरा फोकस होता है और इस तरह यह गीत दृश्य अपने  पीछे एक मरमान्तक पीड़ा छोड़ कर जाता है ....


जीवन से लंबे हैं बंधु                                                    

यह जीवन के रस्ते

इक पल थम के रोना होगा

इक पल चलना हंस के

यह जीवन के रस्ते

यह जीवन के रस्ते


राहों से राही का रिश्ता

कितने जनम पुराण

एक को चलते जाना आगे

एक को पीछे आना

मोड़ पे मत रुक जाना बंधु 

दोराहों में फँस के

यह जीवन के रस्ते

यह जीवन के रस्ते 

जीवन से लंबे हैं बंधु ...                         


दिन और रात के हाथों                                                   

नपी नपी एक उमरिया

साँस की डोरी छोटी पड़

गयी लम्बी बस डगरिया

भोर के मंजिलवाले उठकर

भोर से पहले चलते

यह जीवन के रस्ते

यह जीवन के रस्ते

जीवन से लम्बे हैं बंधु ........


गायक : मन्ना डे

संगीत : बसंत देसाई

गीत : गुलजार

फिल्म : आशीर्वाद (1968)


----- कृष्ण कुमार शर्मा :  30 सितंबर 2024 ------

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