Posts

जद्दन बाई

  प्रसिद्ध फिल्म स्टार संजय दत्त (Sanjay Dutt) की नानी अपने जमाने की प्रसिद्ध तवायफ हुआ करती थी। उसी प्रसिद्ध तवायफ की बेटी थी फिल्म स्टार नर्गिस। नर्गिस तथा सुनील दत्त के पुत्र हैं फिल्म स्टार संजय दत्त। संजय दत्त की नानी उनके नाना से विवाह करने के बाद मुंबई की फिल्म इंडस्ट्री में म्यूजिक डायरेक्टर बन गई थीं। संजय दत्त की नानी ने फिल्मों में एक्टिंग भी की थी। हीरामंडी के बाद हुआ है खुलासा आपको बता दें कि हाल ही के दिनों में एक वेब सीरीज खूब चर्चा में है। इस वेब सीरीज का नाम हीरामंडी। हीरामंडी को तवायफों की सच्ची कहानी बताया जा रहा है। तवायफों की कहानी सुनते तथा पढ़ते हुए कुछ जानकारों ने खोज कर ली है कि फिल्म स्टार संजय दत्त का नाम भी तवायफों के खानदान से जुड़ा हुआ है। दावा किया जा रहा है कि संजय दत्त की नानी अपने जमाने की प्रसिद्ध तवायफ हुआ करती थी। संजय दत्त की नानी का नाम जद्दन बाई था। जद्दन बाई तवायफ कैसे बनी? इस बात को लेकर अनेक रिपोर्ट अलग-अलग दावे पेश करती हैं। सबसे सटीक दावा यह है कि संजय दत्त की नानी जद्दन बाई तवायफ थीं। संजय दत्त की नानी जद्दन बाई ऐसे बनी तवायफ एक रिपोर्ट...

राजीव वर्मा किस्सा tV से साभार

 ये हैं बच्चन साहब के साढू जी। सलमान खान के ऑन स्क्रीन पप्पा। फिल्म मैंने प्यार किया में सलमान खान के घमंडी पिता का किरदार इन्होंने ही निभाया था। इनकी पत्नी रीता वर्मा बच्चन साहब की साली साहिबा हैं। यानि जया बच्चन जी की बहन हैं। कुछ लोग गलतफहमी में एक्ट्रेस स्वर्गीय रीता भादुड़ी को इनकी पत्नी मान लेते हैं। लेकिन वो रीता भादुड़ी एकदम अलग हैं। और ये गलतफहमी होती है जया भादुड़ी( जो कि अब बच्चन हैं) और रीता भादुड़ी का एक जैसा सरनेम होने की वजह से। उस पर भी जया जी की सगी छोटी बहन का नाम भी रीता ही है। लेकिन एक्ट्रेस रीता भादुड़ी और जया बच्चन की बहन रीता दोनों अलग हैं। खैर, बात करते हैं राजीव वर्मा जी के बारे में। क्योंकि आज इनका जन्मदिन है। 28 जून 1949 को होशंगाबाद में राजीव जी का जन्म हुआ था। ये डेढ़-दो साल के ही थे जब इनके पिता परिवार सहित भोपाल शिफ्ट हो गए थे। इनके पिता होशंगाबाद में वकालत की प्रैक्टिस करते थे। वास्तव में इनके पिता होशंगाबाद से भोपाल मुख्य शहर नहीं, अपने पुश्तैनी गांव मंडीदीप लौटे थे। आज मंडीदीप कोई गांव नहीं, बल्कि भोपाल के पास स्थित एक विशाल इंडस्ट्रियल एरिया है। र...

ए.के.हंगल

 गुजरे ज़माने के बेहतरीन एक्टर ए.के.हंगल  ऐसे कलाकार थे जिन्होंने 50 साल की उम्र में फिल्म इंडस्ट्री में कदम रखा. इसके बावजूद इन्होंने 225 फिल्मों में काम किया. इनकी रियल लाइफ भी उतार-चढ़ाव से भरी थी. अभिनेता का जन्म 1 फरवरी 1914 को सियालकोट पंजाब (पाकिस्तान)में हुआ था और उन्होंने पूरा बचपन पेशावर( पाकिस्तान) में बिताया. वह एक कश्मीरी पंडित परिवार से संबंध रखते थे. अभिनेता एक स्वतंत्रता सेनानी भी थे, उन्होंने 1936 से 1965 तक स्टेज अभिनय भी किया था. इसके बाद उन्होंने हिंदी फिल्मों की ओर रुख किया, लेकिन वह अभिनय में अपने करियर की शुरुआत से पहले एक टेलर का काम किया करते थे. बंटवारे के समय आए थे मुंबई एके हंगल ने अपना बचपन पेशावर से करांची तक में बिताया। हिंदुस्तान के बंटवारे बाद 1949 में वो मुंबई आ गए थे. एके हंगल ने बचपन से ही अपनी जिंदगी में तमाम संघर्ष किए थे. एके हंगल ने अपनी पत्नी के निधन के बाद अपने बेटे की अकेले ही परवरिश की. फिल्मों के साथ-साथ एके हंगल को नाटक में भी अभिनय करने में सफलता प्राप्त हुई. हंगल साहब 18 वर्ष के थे जब उन्होंने नाटकों में अभिनय करने की शुरुआत की थी...

जयंत

 दोस्तों हिंदी सिनेमा में कई कलाकार थे और हैं जिन्होंने कभी एक्टिंग के बारे में नहीं सोचा था...लेकिन किस्मत उन्हें सिल्वर स्क्रीन तक ले आई...ऐसी ही एक कलाकार थे जयंत...जयंत को शायद आप ऐसे न पहचाने लेकिन अगर ये कहा जाए कि जयंत अमजद खान के पिता थे तो शायद उनकी तस्वीर आपको याद आ जाए....जयंत की पहचान एक अच्छे अभिनेता के रूप में बनी और उन्होंने लगभग 150 फिल्मों में अभिनय किया। फिल्मी दुनिया में कभी न मिटने वाली पहचान बनाने वाली और अपनी अमिट छाप छोड़ने वाली फिल्म शोले का नाम जब भी आता है तो गब्बर सिंह का किरदार लोगों के जहन में कौंधने लगता है. गब्बर सिंह का किरदार निभाने वाले अमजद खान का नाम और उनके फेमस डॉयलॉग 'जो डर गया...समझो मर गया' आज भी लोगों की जुबान पर चढ़े हैं. खास बात ये है कि मुंबई में अपनी खास पहचान बनाने वाले अमजद खान और उनके पिता जकारिया खान का अलवर से गहरा नाता रहा है. जकारिया खान भी सफल फिल्मी कलाकार रहे हैं. फिल्मी दुनिया में कदम रखने से पहले जकारिया अलवर में पुलिस ऑफिसर के पद पर तैनात थे. जिले में जहां वह रहते थे, वहां के लोग आज भी उनको याद करते हैं. दिवंगत जकारिया ...

मदनमोहन संगीतकार

 ( इस आलेख को न्यूज़ पोर्टल पर लिया गया, इसका यूट्यूब वीडियो बनाया गया, इसका पॉडकास्ट बना। इसे पहले भी कई बार लगाया है। आगे भी लगाऊंगा। ) मदनमोहन --------------- ■ मदनमोहन जैसा  कोई संगीतकार न हुआ, न होगा। एक फौजी आदमी। फिर रेडियो की नौकरी। उस्तादों की सोहबत। बेगम अख़्तर का साथ।  और नामी गिरामी बेहद सफल संगीतकारों के बीच कितना चमकता हुआ , कितना अलग, कितना अनोखा संगीत। मदनमोहन के कमतर गीतों को खोजना भी एक मुश्किल काम है।  लता मंगेशकर हर संगीतकार के साथ उसकी तरह की लता हैं। पर मदनमोहन के साथ तो वे अपने भी सीमांत को छू लेती हैं। लता - मदनमोहन के गीत और ग़ज़लें हिंदी फ़िल्म संगीत में अलग से अपने सुरों का नूर बिखेरते नज़र आते हैं। कितने अफ़सोस की बात है कि ऐसा नायाब कलाकार इतनी जल्दी दुनिया से चला गया । पता नहीं ऐसा मुझे ही लगता है या क्या है, सत्तर की दहाई में मदनमोहन की रेकॉर्डिंग्स की क्वालिटी भी  बहुत बेहतर है। यह बात तो अलग है ही कि इस दौर में उनका संगीत, उनका ऑर्केस्ट्रेशन भी बहुत आधुनिक है। समय से भी ज़्यादा। इसीलिए बरसों बाद बनने वाली 'वीर ज़ारा' में उनकी धुनें उतनी ह...

कहानी अमर प्रेम की। गोल्डन इरा से साभार

 उन दिनों काका यानि कि राजेश खन्ना की गड्डी सातवें आसमान पर उड़ रही थी. हर तरफ दौलत और शोहरत. एक दिन काका को ख़बर लगी कि शक्ति सामंत के पास बहुत बड़ा सब्जेक्ट हैं और वो बहुत जल्दी फिल्म बनाने जा रहे हैं. काका को हैरानी हुई. शक्ति दा फिल्म बना रहे हैं और हमसे पूछा भी नहीं. यह शक्ति दा ही थे जिनकी 'आराधना' और 'कटी पतंग' ने काका को स्टार बनाया था. काका लपक कर पहुंचे शक्ति दा के घर. शक्ति दा ने बताया - कई साल से अधूरी 'जाने अंजाने' पूरी हो रही है.  अब 'अमर प्रेम' बनाने का इरादा है. हीरो की तलाश है....काका ने खुद को ऑफर किया - मैं हूं न...शक्ति दा ने राजेश को उपेक्षा से देखा - तुम्हारे पास वक्त कहां है? तुम्हारी डायरी में डेट्स ही नहीं हैं. और मैं नहीं चाहता किसी अन्य प्रोड्यूसर की डेट काट कर मुझे दो और मैं उसकी बद्दुआएं लूं...काका गहरी सोच में डूब गए. उन्हें सब्जेक्ट के बारे मालूम था. लाईफ़टाईम रोल समझिये. एक शादी-शुदा आदमी घर जैसी ख़ुशी तलाशने के लिए वेश्यालयों के चक्कर लगाता फिरता है. कहानी में कई और भी ट्विस्ट थे. अचानक काका को आईडिया सूझा. वो उछल पड़े. प्रॉब्ल...

बेमिसाल थे फिल्मी कलाकार प्राण फ़िल्मी मौज.काम से साभार

 प्राण जैसे अभिनेता बॉलीवुड को विरले ही मिले हैं। पेश है चंद बातें हिन्दी सिनेमा के सबसे कामयाब चरित्र अभिनेता बारे में  1) प्राण अपने बुरे किरदारों को इतना डूब कर निभाते थे कि बरसों तक किसी मां ने अपने बेटे का नाम प्राण रखना पसंद नहीं किया।  2) 12 फरवरी 1920 को जन्मे प्राण अपनी मां के लाड़ले थे क्योंकि उनके पिता सरकारी कॉन्ट्रेक्टर थे और अक्सर दौरे पर रहा करते थे।  3) प्राण का मन कभी पढ़ाई में नहीं लगा, लेकिन उन्होंने ये ठान लिया था कि कुछ खास करना है। मैट्रिक के बाद उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी।  4) युवावस्था में प्राण ने अपने फोटोग्राफी के शौक के कारण दिल्ली और शिमला के एक स्टूडियो में नौकरी की और फिर लाहौर चले गए।  5) छठी क्लास से ही उन्हें सिगरेट पीने का चस्का लग गया। सिगरेट उनका पहला प्यार था।   6) सिगरेट का यह शौक ही उनका फिल्म लाइन में प्रवेश का द्वार साबित हुआ। 7) पान की दुकान पर सिगरेट लेने गए प्राण की मुलाकात पटकथा-लेखक मोहम्मद वली से हुई। प्राण को देखते ही वली को लगा कि उन्हें अपनी लिखी कहानी का एक चरित्र मिल गया।  😎 वली के कहने पर ही ...