Posts

Showing posts from September, 2024

ऋषिकेश मुखर्जी जी के 102वें जन्मदिन पर विशेष ----------------------

 जीवन से लंबे हैं बंधु ........                              ऋषिकेश मुखर्जी जी के 102वें जन्मदिन पर विशेष ----------------------------------------------------------------- राज कपूर और बिमल रॉय की फिल्मों के बाद मुझे जिनकी फिल्में सबसे ज्यादा पसंद आईं वो ऋषिकेश मुखर्जी ही है । मुसाफिर (1957) से उन्होंने अपने जीवन काल में जितनी भी फिल्में बनाईं वो सब मैनें देखी । इनमें से कुछ फिल्में जैसे "अनुराधा", "अनुपमा" , "आनंद", "सत्यकाम" और "आशीर्वाद" तो मैनें कई कई बार देखी और आज भी देखना पसंद करता हूं । अपनी इन बेहद पसंदीदा फिल्मों में से अनुराधा के दो गीत सुना चुका हूं और अब इस क्रम में तीसरा गीत फिल्म आशीर्वाद से सुना रहा हूं । मैं इस फिल्म को अशोक कुमार जी के लम्बे कैरियर की सबसे बड़ी उपलब्धि मानता हूं । कहने को फिल्म के नायक संजीव कुमार थे और नायिका सुमिता सान्याल ,थी , लेकिन पूरी फिल्म की आत्मा अशोक कुमार ही थे  । मेरी समझ से  गुलजार ने भी अपने कैरियर के सर्वोत्कृष्ट गीत ( कुछ कविताएं भी ) इस फिल्म के ल...

टॉम ऑल्टर किस्सा tv से साभार

 "टॉम भाई, क्या तुम वाकई में इतनी अच्छी हिंदी व उर्दू बोलते हो?" बड़ी हैरानी से अमजद खान ने टॉम ऑल्टर से पूछा। जवाब में जब टॉम ऑल्टर ने उनसे हिंदी में बात की तो वो जल्दी से यकीन नहीं कर पाए। ये बात साल 1977 में रिलीज़ हुई फिल्म "हम किसी से कम नहीं" की शूटिंग के दौरान की है। उस वक्त तक फिल्म इंडस्ट्री में बात फैल चुकी थी कि एक नया एक्टर आया है जो दिखने में तो अंग्रेज है। लेकिन हिंदी और उर्दू एकदम भारतीयों की तरह बोलता है। उस एक्टर का नाम टॉम ऑल्टर है। "हम किसी से कम नहीं" फिल्म में अमजद खान मुख्य विलेन थे।  अमजद खान ने भी टॉम ऑल्टर के बारे में काफी सुन रखा था। अमजद खान को जब पता चला कि "हम किसी से कम नहीं" फिल्म में टॉम उनके साथ काम करने वाले हैं तो वो टॉम साहब से मिलने को बड़े उत्सुक हो गए। वैसे तो 1976 में आई धर्मेंद्र की फिल्म चरस में भी टॉम ऑल्टर जी ने काम किया था। अमजद खान उसमें भी मुख्य विलेन थे। लेकिन चरस में टॉम साहब संग अमजद खान जी का कोई सीन नहीं था। इसलिए दोनों की मुलाकात भी नहीं हो सकी। "हम किसी से कम नहीं" में भी टॉम ऑल्टर ज...

देव आनन्द किसा tv से साभार

 "कल जब मुझसे मिलने आओगे तो अपनी सबसे बेस्ट शर्ट पहनकर आना।" एक दिन वो लड़की गेस्ट हाउस के डायनिंग रूम में देव आनंद से बोली। वो दिन उस लड़की के लिए बहुत खास था। और फिर वो दिन देव साहब के लिए भी यादगार बन गया।  ये किस्सा तब का है जब देव साहब अपनी पहली फिल्म "हम एक हैं" में काम करने के चलते पूना(पुणे) में थे। उन्हें एक गेस्ट हाउस में ठहराया गया था। दो कमरों के उस गेस्ट हाउस में से एक में देव साहब ठहरे थे। दूसरे कमरे में एक लड़की थी। एक बड़ा सा हॉल और एक डायनिंग रूम भी उस गेस्ट हाउस में थे। कुछ ही दिनों में खूबसूरत सी दिखने वाली उस लड़की से देव साहब की अच्छी दोस्ती हो गई। रात के खाने के वक्त डायनिंग रूम में उस लड़की से देव साहब की खूब बातें होती थी। वो लड़की देव साहब को आकर्षित करने लगी। वो रोज़ रात के खाने का इंतज़ार बेसब्री से करने लगे।  एक रात जब देव साहब शूटिंग खत्म करके वापस लौटे तो उन्होंने देखा कि वो लड़की डायनिंग रूम में नहीं है। रोज़ उन्हें वो वहीं मिलती थी। देवानंद कुछ समझ पाते इससे पहले ही उस गेस्ट हाउस का कुक आकर उनसे बोला,"आज वो यहां खाना नहीं खाएंगी।...

मुकेश चंद माथुर 

 मुकेश चंद माथुर जुलाई २२, १९२३, दिल्ली, भारत - अगस्त २७, १९७६, लोकप्रिय तौर पर सिर्फ मुकेश के नाम से जाने वाले, हिन्दी सिनेमा के एक प्रमुख पार्श्व गायक थे। मुकेश की आवाज बहुत मधुर थी लेकिन उनके एक दूर के संबंधी मोतीलाल ने उन्हें तब पहचाना जब उन्होंने उसे अपनी बहन की शादी में गाते हुए सुना। मोतीलाल उन्हें बम्बई ले गये और अपने घर में रहने दिया। यही नहीं उन्होंने मुकेश के लिए गायन अभ्यास का पूरा इन्तजाम किया। इस दौरान मुकेश को एक हिन्दी फिल्म निर्दोष (१९४१) में मुख्य कलाकार का काम मिला। पार्श्व गायक के तौर पर उन्हें अपना पहला काम १९४५ में फिल्म पहली नजर में मिला। मुकेश ने हिन्दी फिल्म में जो पहला गाना गाया, वह था दिल जलता है तो जलने दे जिसमें अभिनय मोतीलाल ने किया। इस गीत में मुकेश के आदर्श गायक के एल सहगल के प्रभाव का असर स्पष्ट दिखाई देता है। 1959 में अनाड़ी फ़िल्म के ‘सब कुछ सीखा हमने न सीखी होशियारी’ गाने के लिए सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायन का फिल्मफेयर पुरस्कार मिला था। १९७४ में मुकेश को रजनीगन्धा फिल्म में "कई बार यूँ भी देखा है" गाना गाने के लिए राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार मिल...

जी एल दुर्रानी

 "जला है जिस्म अगर, दिल भी जल गया होगा। कुरेदते हो जब राख, जुस्तजू क्या है?" जी.एम.दुर्रानी अपने करियर के शिखर पर थे जब फिल्मी दुनिया से इनका मोहभंग हो गया था। एक बहुत पुराने रेडियो इंटरव्यू में जी.एम.दुर्रानी साहब ने कहा था कि ईश्वर के करीब जाने के लिए साल 1951 में उन्होंने गाना-बजाना छोड़ दिया था। फिल्मी दुनिया छोड़ने के बाद जी.एम.दुर्रानी ने अपनी दाढ़ी बढ़ा ली। इसलिए ताकि लोग फिल्मी दुनिया के लोग उन्हें जल्दी से पहचान ना सकें। अगर कोई फिल्मी दुनिया का इंसान इन्हें दिख भी जाता था तो ये अपनी गर्दन नीची कर लेते थे। दुर्रानी साहब का कहना है कि जो ज़िंदगी वो फिल्म लाइन में जी रहे थे उससे उन्हें विरक्ति हो गई थी। फिल्मी दुनिया में रहते हुए जी.एम.दुर्रानी ने अच्छा पैसा कमाया था। मगर फिल्म लाइन छोड़ने के बाद वो दान-पुण्य में इतने ज़्यादा मशग़ूल हो गए कि पता ही नहीं चला कब बैंक-बैलेंस खत्म हो गया और वो फक्कड़ हो गए। ज़िंदगी चलाने के लिए उन्होंने एक परीचित से कुछ रुपए उधार लिए और किराने की एक दुकान शुरू कर दी। और फिर यूं ही उनकी ज़िंदगी की गाड़ी आगे बढ़ती चली गई। आज ग़ुलाम मुस्तफा द...

कुरूष देबू

 कुरूष देबू। ये वही हैं जिन्हें आपने मुन्ना भाई एमबीबीएस में डॉक्टर रुस्तम के किरदार में देखा था। सालों पहले आई शाहरुख खान की फिल्म "कभी हां कभी नाम" में भी इन्होंने काम किया था। इस फिल्म में कुरुष देबू ने यज़दी का किरदार निभाया था। पिछले 35 सालों से कुरूष देबू फिल्म इंडस्ट्री में एक्टिव हैं। ये और बात है कि बहुत खास पहचान इन्हें मिल नहीं सकी। ज़्यादातर लोग इन्हें मुन्ना भाई एमबीबीस के डॉक्टर रुस्तम पावरी के रोल के लिए याद करते हैं। लेकिन इन्होंने और भी कई फिल्मों व टीवी शोज़ में अच्छे किरदार निभाए हैं। चलिए, आज थोड़ा कुरूष देबू के बारे में भी जान लेते हैं। क्यों? क्योंकि आज इनका जन्मदिन है। 12 सितंबर 1963 को कुरूष देबू का जन्म हुआ था। इनका बचपन गुजरात के नवसारी में गुज़रा है। इंटरनेट पर कई जगह ऐसा भी लिखा है कि कुरूष देबू मुंबई में जन्मे थे लेकिन नवसारी में इनका बचपन बीता। इनमें सही बात क्या है, फिलहाल में भी नहीं पता। कुरूष के पिता होमी.एस. देबू भी फिल्म इंडस्ट्री से ही जुड़े थे। एक ज़माने में कुरूष के पिता होमी देबू दिनशॉ बिल्लिमोरिया के असिस्टेंट हुआ करते थे। दिनशॉ बिल्लि...