कुरूष देबू

 कुरूष देबू। ये वही हैं जिन्हें आपने मुन्ना भाई एमबीबीएस में डॉक्टर रुस्तम के किरदार में देखा था। सालों पहले आई शाहरुख खान की फिल्म "कभी हां कभी नाम" में भी इन्होंने काम किया था। इस फिल्म में कुरुष देबू ने यज़दी का किरदार निभाया था। पिछले 35 सालों से कुरूष देबू फिल्म इंडस्ट्री में एक्टिव हैं। ये और बात है कि बहुत खास पहचान इन्हें मिल नहीं सकी। ज़्यादातर लोग इन्हें मुन्ना भाई एमबीबीस के डॉक्टर रुस्तम पावरी के रोल के लिए याद करते हैं। लेकिन इन्होंने और भी कई फिल्मों व टीवी शोज़ में अच्छे किरदार निभाए हैं। चलिए, आज थोड़ा कुरूष देबू के बारे में भी जान लेते हैं। क्यों? क्योंकि आज इनका जन्मदिन है।


12 सितंबर 1963 को कुरूष देबू का जन्म हुआ था। इनका बचपन गुजरात के नवसारी में गुज़रा है। इंटरनेट पर कई जगह ऐसा भी लिखा है कि कुरूष देबू मुंबई में जन्मे थे लेकिन नवसारी में इनका बचपन बीता। इनमें सही बात क्या है, फिलहाल में भी नहीं पता। कुरूष के पिता होमी.एस. देबू भी फिल्म इंडस्ट्री से ही जुड़े थे। एक ज़माने में कुरूष के पिता होमी देबू दिनशॉ बिल्लिमोरिया के असिस्टेंट हुआ करते थे। दिनशॉ बिल्लिमोरिया साइलेंट फिल्मों के दौर के एक एक्टर थे जिन्होंने बाद में साउंड फिल्मों में भी खूब काम किया। दिनशॉ बिल्लिमोरिया ने आज़ादी-ए-वतन(1940) और जवानी की पुकार(1942) नाम से दो फिल्में डायरेक्ट की थी। उन्हीं फिल्मों में कुरूष देबू के पिता होमी देबू दिनशॉ बिल्लिमोरिया के असिस्टेंट थे। दिनशॉ बिल्लिमोरिया की मौत 1942 में ही हो गई थी। उनके बाद कुरूष के पिता होमी देबू कुछ और डायरेक्टर्स के साथ जुड़े और बतौर असोसिएट डायरेक्टर काम किया।


होमी देबू ने भी एक वक्त पर डायरेक्टर बनने का प्रयास किया था। उन्हें एक फिल्म भी मिली थी डायरेक्ट करने के लिए। लेकिन किन्हीं कारणों से वो फिल्म पूरी नहीं बन सकी। और डायरेक्टर बनने का कुरूष देबू के पिता होमी देबू का ख्वाब पूरा ना हो सका। वो फिल्म बंद हुई तो होमी देबू ने किसी और के लिए असिस्टेंट डायरेक्टर के तौर पर काम करने से इन्कार कर दिया। इसी बीच देश का विभाजन हो गया। उस वक्त फिल्म इंडस्ट्री में काम लगभग खत्म सा हो गया। होमी देबू ने मुंबई छोड़ने का फैसला किया। वो नवसारी के रहने वाले थे तो मुंबई छोड़कर वापस नवसारी ही आ गए। नवसारी में उन्होंने फिल्म एग्ज़ीबिशन का काम शुरू कर दिया। साथ ही साथ नाटक लेखन व डायरेक्शन भी करने लगे। 


सिनेमा और थिएटर से पिता के जुड़ाव से कुरूष देबू प्रभावित ज़रूर होते थे। लेकिन पिता की असफलताओं की वजह से वो फिल्मों से खुद को दूर ही रखना चाहते थे। वो एमबीए करके अच्छी सी नौकरी करना चाहते थे। इसलिए नवसारी के एक कॉलेज से कॉमर्स में ग्रेजुएशन करने के बाद एमबीए करने के इरादे से कुरूष मुंबई आ गए। लेकिन उन्हें किसी कॉलेज में दाखिला नहीं मिल सका। क्योंकि ये एंट्रेस एग्ज़ाम में पास ही नहीं हो पाते थे। ऐसे में कुरूष देबू ने ज़ेवियर्स इंस्टीट्यूट ऑफ कम्यूनिकेशन में एडवर्टाइज़िंग एंड मार्केटिंग के डिप्लोमा कोर्स में दाखिला ले लिया। वो डिप्लोमा करने के बाद कुरूष देबू ने जमनादास बजाज मैनेजमेंट कॉलेज से मार्केटिंग मैनेजमेंट में डिप्लोमा किया। 


ये डिप्लोमा करने के बाद कुरूष देबू एक कंपनी के मार्केटिंग रिसर्च डिपार्टमेंट में नौकरी करने लगे। कुरूष को फिल्मों और फिल्म स्टार्स के बारे में जानने-पढ़ने का शौक हमेशा से ही था। इसलिए मुंबई में भी वो फिल्मी मैगज़ीन्स खूब पढ़ा करते थे। इन्हीं फिल्मी मैगज़ीन्स के ज़रिए ही कुरूष देबू को रोशन तनेजा के एक्टिंग इंस्टिट्यूट की जानकारी मिली। दरअसल, कुरूष ने इन मैगज़ीन्स में गोविंदा, गुलशन ग्रोवर और अनिल कपूर के इंटरव्यूज़ पढ़े थे। इन तीनों कलाकारों ने अपने इंटरव्यू में रोशन तनेजा की एक्टिंग एकेडेमी का ज़िक्र किया था। अब कुरूष के मन में भी रोशन तनेजा के एक्टिंग स्कूल में दाखिला लेने की ख्वाहिश पैदा हो गई। उन्होंने फैसला किया कि वो रोशन तनेजा के एक्टिंग स्कूल में दाखिला लेंगे। लेकिन घर पर किसी को नहीं बताएंगे। एक्टिंग कोर्स करने के बाद फिल्मों में बात बनी तो ठीक, नहीं तो मार्केटिंग में नौकरी कर लेंगे।


कुरूष देबू ने रोशन तनेजा के इंस्टिट्यूट से एक्टिंग में एक साल के डिप्लोमा कोर्स में दाखिला ले लिया। आमिर खान के भाई फैज़ल खान कुरूष के बैचमेट्स में से एक थे। वो डिप्लोमा कंप्लीट होने के कुछ ही दिन बाद कुरूष देबू को पर्सी नाम की एक गुजराती फिल्म मिल गई जिसमें मुख्य किरदार इन्होंने ही निभाया था। वो फिल्म 1989 में रिलीज़ हुई थी। उस फिल्म को 37वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में बेस्ट गुजराती फीचर फिल्म का अवॉर्ड मिला था। कुरूष देबू के काम को भी काफी सराहा गया था। कुरूष देबू उस किरदार के लिए एकदम परफेक्ट थे। क्योंकि वो फिल्म पारसी समुदाय की एक कहानी पर आधारित थी। और कुरूष देबू खुद भी पारसी ही हैं। 


पर्सी फिल्म में कुरूष को काम मिलने की भी एक कहानी है जो इस प्रकार है। एक दिन कुरूष का एक दोस्त एक अखबार लेकर इनके पास आया। उस अखबार में एक विज्ञापन छपा था। विज्ञापन में कहा गया था कि पर्सी नाम की एक गुजराती फिल्म के लिए एक्टर्स की तलाश है। फिल्म को प्रोड्यूस कर रहा था NFDC यानि नेशनल फिल्म डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया। कुरूष ने पर्सी फिल्म के लीड रोल के लिए ऑडिशन और स्क्रीनटेस्ट दिया। और वो पास भी हो गए। कुरुष ने पर्सी में बहुत बेहतरीन काम किया। उन्हें बेस्ट एक्टर नेशनल अवॉर्ड के लिए नॉमिनेशन भी मिला। कुरूष तो वो अवॉर्ड ना जीत सके। लेकिन उनकी फिल्म पर्सी को ज़रूर बेस्ट गुजराती फीचर फिल्म नेशनल अवॉर्ड मिला।


साल 1990 में कुरूष देबू का टीवी डेब्यू भी हो गया। उस वक्त के बहुत प्रसिद्ध टीवी सीरियल चाणक्य में कुरूष देबू ने एक ग्रीक कमांडर का किरदार निभाया था। कैमरा के सामने एक्टिंग करने के अलावा कुरूष देबू थिएटर से भी जुड़े थे। इसिलिए स्टेज पर भी खूब एक्टिंग करते थे। कहना चाहिए कि करियर की शुरुआत में कुरूष देबू ने थिएटर ही ज़्यादा किया था। कुरूष की दूसरी फिल्म थी "आसमान से गिरा" जो 1993 में रिलीज़ हुई थी। 


1994 में कुरूष देबू ने शाहरुख खान के साथ "कभी हां कभी ना" में काम किया था। कुरूष उस फिल्म में शाहरुख के दोस्त बने थे। कुरूष को ये फिल्म कुंदन शाह ने उस वक्त ऑफर की थी जब पर्सी के लिए वो नेशनल अवॉर्ड  जीतने के संभावित एक्टर्स की कतार में खड़े थे। कुंदन शाह उस साल नेशनल अवॉर्ड्स के ज्यूरी मेंबर्स थे और उन्हें पर्सी में कुरूष देबू का काम पसंद आया था। इसिलिए उन्होंने कुरुष को कभी हां कभी ना फिल्म में काम करने का ऑफर दिया।


फिल्मों के साथ-साथ टीवी पर भी कुरुष काम कर रहे थे। उन्होंने बाइबिल की कहानियां, बनेगी अपनी बात, बॉम्बे ब्लू, शाका लाका बूम बूम, करिश्मा का करिश्मा, होटल किंग्सटन जैसे शोज़ में काम किया। और टीवी पर कुरूष लगातार काम करते रहे। उनका अब तक का आखिरी शो था "एक नई उम्मीद- रोशनी" जो साल 2015 में टेलिकास्ट होना शुरू हुआ था और 2016 में ऑफ एयर हो गया। बात अगर फिल्मों की करें तो कुरूष ने "सच ए लॉन्ग जर्नी" नाम की अंग्रेजी फिल्म में भी काम किया था। वो फिल्म 1998 में आई थी। विदेशों में तो वो फिल्म काफी सराही गई थी। लेकिन भारत में उस फिल्म को किसी ने भाव नहीं दिया। 


अपने अब तक के करियर में कुरूष देबू ने कसूर, झनकार बीट्स, चुपके से, वैसा भी होता है पार्ट 2, मुझसे शादी करोगी, पेज थ्री, एक खिलाड़ी एक हसीना, क्यों कि, टैक्सी नंबर 9211, लगे रहो मुन्ना भाई, हैट्रिक, क्रेज़ी 4, धमाल और भी कई फिल्मों में काम किया। कुरूष की अब तक की आखिरी फिल्म थी 2023 में आई नॉन स्टोप धमाल। इंटरनेट के इस दौर में कुरूष कुछ वेब सीरीज़ में भी काम कर चुके हैं जैसे अकूरी, परछाई, द वर्डिक्ट और दुरंगा। 


कुरूष देबू उन एक्टर्स में से एक हैं जिन्होंने फिल्मों में अच्छे किरदार निभाने पर ज़्य़ादा भरोसा किया। इसका खामियाज़ा भी उन्हें उठाना पड़ा। एक वक्त आया था जब कुरूष को फिल्मों में काम मिलना बहुत कम हो गया था। ऐसे में कुरूष को फिल्मों में छोटे-मोटे किरदार निभाने पड़े। मुन्ना भाई एमबीबीएस कुरूष के करियर की वो फिल्म बनी जिसने एक सपोर्टिंग एक्टर के तौर पर कुरूष देबू को ख्याति दिलाई। वो ख्याति जो कोई भी एक्टर अपने लिए चाहता है। इनका वो किरदार बहुत मशहूर हुआ। लोग इन्हें जहां भी देखते तो डॉक्टर रुस्तम कहकर ही पुकारते। सच तो ये है कि आज भी अधिकतर लोगों को ये पता नहीं है कि इनका असली नाम कुरूष देबू है। #kurushdeboo #happpybirthday #biography #BiographyinHindi #

KissaTV से साभार

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