गुलशन नंदा
● हिंदी साहित्य जगत की एक बड़ी दिक्कत ये है कि किसी चीज़ के लोकप्रिय होते ही वो उससे यूं किनारा करने लगता है, जैसे उसे छूत की बीमारी हो. श्रेष्ठतावाद का मारा हमारा हिंदी साहित्य गुलशन नंदा की घनघोर उपेक्षा करता रहा. इस बात का उन्हें हमेशा मलाल रहा. इस बारे में वो कहा भी करते थे. इसका एक रोचक किस्सा भी है. हिंदी की अग्रणी प्रकाशन संस्था हिंद पॉकेट बुक्स ने एक तरह से गुलशन नंदा का बॉयकॉट कर रखा था. उनकी किताबें छापने को लेकर अघोषित इनकार सा था. लेकिन चढ़ते सूरज की रोशनी से कब तक मुंह छिपाया जा सकता है. हिंद को अपनी ग़लती का एहसास हुआ और उन्होंने गुलशन नंदा को छापने का इरादा किया. इस बार सिक्का गुलशन नंदा का चल रहा था. उन्होंने मुंहमांगी रकम लेकर किताब दी. किताब का नाम था 'झील के उस पार'. 'झील के उस पार' का करिश्मा हिंदी प्रकाशन के इतिहास में 'झील के उस पार' अद्भुत घटना थी. इस किताब का 'न भूतो न भविष्यति' प्रचार हुआ. भारतभर के अखबारों, पत्रिकाओं के साथ-साथ रेडियो, बिल बोर्ड्स का इस्तेमाल हुआ इसके प्रमोशन में. चौक-चौराहों पर, बस, रेलवे स्टैंड्स पर बड़े-बड़े पो...