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Showing posts from August, 2024

गुलशन नंदा

 ●    हिंदी साहित्य जगत की एक बड़ी दिक्कत ये है कि किसी चीज़ के लोकप्रिय होते ही वो उससे यूं किनारा करने लगता है, जैसे उसे छूत की बीमारी हो. श्रेष्ठतावाद का मारा हमारा हिंदी साहित्य गुलशन नंदा की घनघोर उपेक्षा करता रहा. इस बात का उन्हें हमेशा मलाल रहा. इस बारे में वो कहा भी करते थे. इसका एक रोचक किस्सा भी है. हिंदी की अग्रणी प्रकाशन संस्था हिंद पॉकेट बुक्स ने एक तरह से गुलशन नंदा का बॉयकॉट कर रखा था. उनकी किताबें छापने को लेकर अघोषित इनकार सा था. लेकिन चढ़ते सूरज की रोशनी से कब तक मुंह छिपाया जा सकता है. हिंद को अपनी ग़लती का एहसास हुआ और उन्होंने गुलशन नंदा को छापने का इरादा किया. इस बार सिक्का गुलशन नंदा का चल रहा था. उन्होंने मुंहमांगी रकम लेकर किताब दी. किताब का नाम था 'झील के उस पार'. 'झील के उस पार' का करिश्मा हिंदी प्रकाशन के इतिहास में 'झील के उस पार' अद्भुत घटना थी. इस किताब का 'न भूतो न भविष्यति' प्रचार हुआ. भारतभर के अखबारों, पत्रिकाओं के साथ-साथ रेडियो, बिल बोर्ड्स का इस्तेमाल हुआ इसके प्रमोशन में. चौक-चौराहों पर, बस, रेलवे स्टैंड्स पर बड़े-बड़े पो...

शारद सक्सेना

 ट्रिंग-ट्रिंग, ट्रिंग-ट्रिंग। शरत जी ने फोन उठाया। उधर से आवाज़ आई,"मैं प्राण बोल रहा हूं।" वो छुट्टी का दिन था। शरत जी के घर पर एक छोटी सी पार्टी चल रही थी। फुल माहौल बना हुआ था। शरत सक्सेना जी हल्के से सुरूर में थे। उन्होंने कहा,"कौन प्राण?" उधर से जवाब आया,"अरे भई एक्टर प्राण।" शरत जी का नशा फौरन हल्का हो गया। वो एक कुर्सी पर बैठे थे जब उन्होंने फोन उठाया। लेकिन ये पता चलते ही कि प्राण साहब का फोन है, शरत जी कुर्सी से उठ खड़े हुए।  प्राण साहब आगे बोले,"गुंडाराज में तुमने जो काम किया है वो मुझे बहुत अच्छा लगा। शाबास। ऐसे ही काम करते रहो।" प्राण साहब फोन रखने ही वाले थे कि शरत सक्सेना ने उनसे कहा,"सर, मैं एक दफा आपसे मिलना चाहता हूं।" जवाब में प्राण साहब ने कहा,"कभी भी आ जाओ बच्चे। कोई दिक्कत नहीं।" अगले दिन शरत सक्सेना प्राण साहब के घर गए और उनसे मुलाकात की। तमाम ज़रूरी बातें की। प्राण साहब से एक्टिंग की टिप्स ली। और फिर पैर छूकर उनका आशीर्वाद भी लिया।  आज शरत सक्सेना जी का जन्मदिन है। 17 अगस्त 1950 को मध्य प्रदेश के सतना म...

जानी लीवर

 जॉनी लीवर की बेटी जेमी लीवर ने ये मज़ेदार बात उनके बारे में बताई थी। जॉनी जी के बारे में शायद बहुत ही कम लोगों को ये पता होगी। जेमी ने बताया था कि 90s में एक वक्त ऐसा भी था जब जॉनी लीवर एक दिन में पांच-पांच फिल्मों की शूटिंग किया करते थे। जॉनी इतने व्यस्त रहते थे कि वो बस डायरेक्टर द्वारा बताए गए अपने सीन्स शूट करते थे। फिल्म की कहानी क्या है, उन्हें पता ही नहीं होता था। जॉनी की बेटी जेमी उन दिनों स्कूल जाया करती थी। छुट्टी के दिन जब जॉनी जी की कोई फिल्म टीवी पर आती थी तो जेमी वो फिल्म ज़रूर देखती थी।  अगर किसी छुट्टी के दिन जॉनी भी घर पर होते थे तो वो अपना सीन आने से पहले चुपचाप वहां से खिसक लेते थे और पिलर के पीछे जाकर छिप जाते थे। वहीं से छुपते हुए वो अपना सीन देखते थे। अपने डायलॉग्स साथ-साथ फुसफुसाते थे। और फिर वो बेटी जेमी के पास आकर उनसे पूछते थे,"बेटा, तुम्हें मुझ पर गर्व है ना?"  आज जॉनी लीवर का जन्मदिन है। 14 अगस्त 1957 को जॉनी लीवर जी का जन्म आंध्र प्रदेश के प्रकाशम ज़िले के कनीगिरी गांव में हुआ था। जॉनी आज 67 साल के हो चुके हैं। जॉनी बताते हैं कि वो बहुत छोटे ...

पीएल सन्तोषी

 आप हैं श्री प्यारे लाल श्रीवास्तव। फिल्मी दुनिया में आप पी.एल.संतोषी के नाम से मशहूर थे। चूंकि आपका पैन नेम संतोषी था तो संतोषी आपका उपनाम बन गया। आज पी.एल.संतोषी साहब का जन्मदिवस है। 07 अगस्त 1916 को जबलपुर में पी.एल.संतोषी साहब का जन्म हुआ था। डायरेक्टर राजकुमार संतोषी इन्हीं के पुत्र हैं। पी.एल.संतोषी जी फिल्मी दुनिया में कैसे आए ये किस्सा जानने लायक है। ये बहुत युवा थे तब इनके शहर जबलपुर में एक फिल्म की शूटिंग चल रही थी। फिल्म वालों को किसी कारणवश डायलॉग लेखन के लिए एक लेखक की ज़रूरत पड़ गई। संतोषी जी को भी लिखने का शौक बचपन से था। छोटी उम्र से ही ये कविताएं लिखने लगे थे। और अपने शहर में होने वाले कवि सम्मेलनों में भाग भी लेने लगे थे। इसलिए जब इन्हें पता चला कि फिल्म वालों को डायलॉग लिखने के लिए कोई चाहिए तो इन्होंने उनसे बात की। इन्हें मौका मिल गया। फिर तो इन्होंने इतना बढ़िया काम किया कि फिल्म वालों ने इनकी खूब तारीफ की। उस दिन से फिल्मों के प्रति इनकी दिलचस्पी बहुत बढ़ गई। टॉकी फिल्मों का ज़माना शुरू हो चुका था। मैट्रिक करने के बाद 1930 के दशक के मध्य में पी.एल.संतोषी मुंबई...

मीनाकुमारी कविता tv से साभार

 मीना कुमारी : जाने क्या ढूंढती रहती थी वो आँखें .... --------------------------------------------------------- कहते हैं, हम जिस तरह जीते हैं उससे अलग कुछ नहीं होते। माहजबीं उर्फ मीना कुमारी ने अपनी जिंदगी यूं जी, जैसे वह उसकी अपनी न थी। जैसे वह अपने तमाम चरित्रों की तरह एक चरित्र मीना को जीये और ढोये जा रही थी लगातार।  अरसे बाद याकि बरसों बाद पाकीज़ा के सेट पर जब वे दुबारा लौटकर आईं तो जो पहला संवाद अदा किया वो यह था- 'बहुत दिनों से मुझे ऐसा कुछ लगता है कि मैं बदलती जा रही हूँ। जैसे मैं किसी अंजाने सफ़र में हूँ। कहीं जा रही हूँ और सबकुछ छूटा जा रहा है।‘ ‘देख न बिब्बन! वो पतंग कितनी मिलती-जुलती है मुझसे! मेरी ही तरह कटी हुई!! ना मुराद... कमबख़्त!’   मीना कुमारी की ज़िंदगी का आखिरी सच भी बिलकुल उस वक्त यही था। रिश्ते, चीजें, पैसे यहाँ तक कि ज़िंदगी भी उनके हाथों से फिसली चली जा रही थी और वे बेबसी में नम आँखों से यह सब झेलते और देखते रहने को विवश थी। ठीक किसी कटी हुयी पतंग की तरह कई घर होते हुये भी उनका अपना कहा जानेवाला कोई एक घर तक न था। मीना के वालिद अलीबख़्श उनके और क...

मोहम्मद रफी

 अकेले -अकेले कहां जा रहे हो.. ----------------- मोहम्मद रफ़ी क्या तुमसे कोई रूठा होगा? नहीं ना....! फिर तुम क्यों सदा के लिए रूठ गये? किसी को बताया नहीं, किसी को जताया भी नहीं....! ऐसा ही होता है अपने फ़न से सबको मनाने वाला, अपनी दिलकश अदाओं से सबको बहलाने वाला, कुछ यूं ही चला जाता है...!  यह 31 जुलाई तुम्हारे पुण्यतिथि होती है। इस तिथि को किस रूप में मनाएं...? तुम्हारे जाने के ग़म में या आसमां पर  हजारों रंग बनकर बिखर जाने की खुशी में!    यूं तो हरेक ख़ास दिन में कोई समारोह होता है। लोग उसे सार्वजनिक मंच पर  अपने ढंग से मनाते हैं। एक उत्सव जैसा, एक त्यौहार जैसा...! मगर तुम्हारे चिर प्रस्थान के दिन जितने मंचों से मनाए जाते हैं, उत से अधिक लाखों करोड़ों दिलों में गुपचुप तरीके से यूं ही मन जाता हैं...! क्या तुम्हें इसका जरा भी इल्म है? हर मनुष्य के जीवन में एक खास दिन, वर्ष चक्र की कड़ी में उत्सव की तरह साल के किसी खास तारीख में जिंदा रहता है। उस तारीख का जश्न कहो या शोक , अपने भीतर ही मना जाता है...!  तुम्हारे चिर प्रस्थान के दिन हमें भी भीतर ही भीतर ब...