मोहम्मद रफी
अकेले -अकेले कहां जा रहे हो..
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मोहम्मद रफ़ी क्या तुमसे कोई रूठा होगा? नहीं ना....! फिर तुम क्यों सदा के लिए रूठ गये? किसी को बताया नहीं, किसी को जताया भी नहीं....!
ऐसा ही होता है अपने फ़न से सबको मनाने वाला, अपनी दिलकश अदाओं से सबको बहलाने वाला, कुछ यूं ही चला जाता है...!
यह 31 जुलाई तुम्हारे पुण्यतिथि होती है। इस तिथि को किस रूप में मनाएं...? तुम्हारे जाने के ग़म में या आसमां पर हजारों रंग बनकर बिखर जाने की खुशी में!
यूं तो हरेक ख़ास दिन में कोई समारोह होता है। लोग उसे सार्वजनिक मंच पर अपने ढंग से मनाते हैं। एक उत्सव जैसा, एक त्यौहार जैसा...! मगर तुम्हारे चिर प्रस्थान के दिन जितने मंचों से मनाए जाते हैं, उत से अधिक लाखों करोड़ों दिलों में गुपचुप तरीके से यूं ही मन जाता हैं...! क्या तुम्हें इसका जरा भी इल्म है? हर मनुष्य के जीवन में एक खास दिन, वर्ष चक्र की कड़ी में उत्सव की तरह साल के किसी खास तारीख में जिंदा रहता है। उस तारीख का जश्न कहो या शोक , अपने भीतर ही मना जाता है...!
तुम्हारे चिर प्रस्थान के दिन हमें भी भीतर ही भीतर बहुत सालता रहता है...! यह ख़ास तारीख मेरे जीवन के तमाम तिथियों से भिन्न होती है। अक्सर यह तिथि बीत जाती है और मुझे पता भी नहीं चलता है, किसी अतिथि की तरह।
यह खास तिथि भी चुपके से ऐसे निकल जाती है जैसे तुम कभी चुपके निकल गये थे और दर्द में दीवार फरफराती रही। यह खास तिथि शायद ही कभी पकड़ में आती है ।
दिन जो पखेरू होते तो मैं भी इसे पिंजरे में बंद कर लेता और पालता इसे जतन से और मोतियों के दाने देता ..जैसा तुम अपने गीतों में पकड़ने की बात कह चुके हो।
इस साल भी यह तारीख क्यों मेरी आंखों से गुजर गयी..? तुम्हें पता है?
तो लो चलो बताता हूं...!
क्योंकि इस दिन भी अन्य दिनों की तरह अनेक आसमान आसमान थे मगर एक भी आसमान ने नहीं भिगोया धरती को। तुम्हारे प्रस्थान का वह दिन, जब झमाझम बारिश हो रही थी! मुझे तो नहीं पता मगर तुम्हारा जाना भी मुनासिब रुत लिए हुआ था। इस तारीख को बारिश न हो तो कैसे मनेगा यह दिन...?
वह अमराई की घनी बगिया! छोटी सी वह नदी जिसमें बरसात का पानी पेड़ के पत्तों पर तैरता हुआ जा रहा था और कगारों को चूमकर मस्ती में गा रहा था,याद आ रही है...! याद आ रही है वह पुराना रेडियो, जिसमें स्निग्ध कंठो से किसी एंकर का रफ़ी विशेष कार्यक्रम और कार्यक्रम के दौरान तुम्हारा गुणगान...! याद आ रहा है, आकाशवाणी के सभी स्टेशनों से केवल तुम्हारे गीतों का ही प्रसारण...! याद आ रहा है सुबह से रात भर रेडियो से चिपके रहना,, क्योंकि रफ़ी ही रफ़ी थे...!
तुम्हारे गीतों की प्यास कभी नहीं बुझी और न बुझेगी कभी,, तुम्हारी गीतों में ही तो मंजिल की रौशनी होती थी...सदा रहा है...सदा रहेगी..!
याद आ रहा है जब रेडियो की पहिये दार टुनिंग तुम्हें खोजने के लिए ही उन्नीस मीटर से नब्बे मीटर की हजारों किलोमीटर की दूरी, चंद सेंटीमीटर में माप लेता था।
तुम्हारा आना बहुत खूब हुआ और तुम्हारा जाना उससे भी अधिक विराट हो गया। यह तुम्हारा उत्सव नहीं सही मगर इसमें कहीं न कहीं खुद को ढूंढता चला जाता हूं...!
तुम्हारे गीत पहाड़ों पर बरसे, पत्थरों को भिगोया, सेहरे को डुबोया .... हर कोई रोया..!
बहुत रोया,, तुम्हें पता है, कोई तुम्हारा हो रहा है, तुम्हें पता है.. कोई मिट रहा है! तुम्हें पता है..
अकेले- अकेले कहां चले जा रहे हो...!
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कृष्ण मोहन मिश्र
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