गुलशन नंदा
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हिंदी साहित्य जगत की एक बड़ी दिक्कत ये है कि किसी चीज़ के लोकप्रिय होते ही वो उससे यूं किनारा करने लगता है, जैसे उसे छूत की बीमारी हो. श्रेष्ठतावाद का मारा हमारा हिंदी साहित्य गुलशन नंदा की घनघोर उपेक्षा करता रहा. इस बात का उन्हें हमेशा मलाल रहा. इस बारे में वो कहा भी करते थे. इसका एक रोचक किस्सा भी है. हिंदी की अग्रणी प्रकाशन संस्था हिंद पॉकेट बुक्स ने एक तरह से गुलशन नंदा का बॉयकॉट कर रखा था. उनकी किताबें छापने को लेकर अघोषित इनकार सा था. लेकिन चढ़ते सूरज की रोशनी से कब तक मुंह छिपाया जा सकता है. हिंद को अपनी ग़लती का एहसास हुआ और उन्होंने गुलशन नंदा को छापने का इरादा किया. इस बार सिक्का गुलशन नंदा का चल रहा था. उन्होंने मुंहमांगी रकम लेकर किताब दी. किताब का नाम था 'झील के उस पार'.
'झील के उस पार' का करिश्मा
हिंदी प्रकाशन के इतिहास में 'झील के उस पार' अद्भुत घटना थी. इस किताब का 'न भूतो न भविष्यति' प्रचार हुआ. भारतभर के अखबारों, पत्रिकाओं के साथ-साथ रेडियो, बिल बोर्ड्स का इस्तेमाल हुआ इसके प्रमोशन में. चौक-चौराहों पर, बस, रेलवे स्टैंड्स पर बड़े-बड़े पोस्टर चिपकाए गए. इस बात पर ख़ास ज़ोर दिया गया कि पहली बार किसी हिंदी किताब का पहला एडिशन ही पांच लाख का है.
किताब छपी भी और बंपर बिकी भी. ऐसी धुआंधार कि जिसकी मिसाल मिलना नामुमकिन है. लाखों प्रतियां बिकीं. हिंदी उपन्यासों में लाखों का ऐसा आंकड़ा सिर्फ दो ही अन्य किताबें छू पाईं. वेदप्रकाश शर्मा की 'वर्दी वाला गुंडा' और सुरेंद्र मोहन पाठक की 'पैंसठ लाख की डकैती'. दोनों की क्रमशः 15 और 25 लाख प्रतियां बिकी हैं.
●इस उपन्यास का इंग्लिश ट्रांसलेशन भी आया.
'झील के उस पार' किताब के साथ ही इसी नाम से एक फिल्म भी आई, जिसमें धर्मेंद्र और मुमताज थे.
●किताब और फिल्म लगभग एक ही समय में आई.
●वो जो उन्होंने रचा
उपन्यासों में 'नीलकंठ', 'लरज़ते आंसू', 'कलंकिनी', 'जलती चट्टान', 'घाट का पत्थर', 'गेलॉर्ड' आदि उनकी प्रमुख कृतियां रहीं. फिल्मों में उनकी कलम ने और धमाल मचाया. कितनी ही हिट फिल्मों के क्रेडिट में बतौर कहानीकार उनका नाम दर्ज है. ‘काजल’(1965), सावन की घटा’ (1966), ‘पत्थर के सनम’ (1967), ‘नील कमल’ (1968), ‘खिलौना’ (1970), ‘कटी पतंग’ (1970), ‘शर्मीली’ (1970), ‘नया ज़माना’ (1971), ‘दाग़’ (1973), ‘झील के उस पार’ (1973), ‘जुगनू’ (1973), ‘जोशीला’ (1973), ‘अजनबी’ (1974), ‘भंवर’ (1976), ‘महबूबा’ (1976) वग़ैरह-वग़ैरह. इनमें से ज़्यादातर फ़िल्में बंपर हिट रहीं. एक समय तो ऐसा भी रहा कि पहले फिल्म आती और उसके बाद उसकी कहानी किताब रूप में पब्लिश होती. ऐसी उल्टी गंगा बहने के बावजूद उन किताबों को पसंद किया जाता.
●यशराज बैनर ने भी गुलशन नंदा को आज़माया.
1987 में रिलीज़ हुई राजेश खन्ना, श्री देवी की फिल्म ‘नज़राना’ उनकी आख़िरी फिल्म थी, जो उनकी मौत के बाद रिलीज़ हुई और हिट रही. वो सलीम-जावेद की जोड़ी से काफी पहले स्टार राइटरका दर्जा पा चुके थे. एक दौर तो ऐसा आया था कि फिल्म को हिट कराने के दो अचूक टोटके बताए जाते थे. या तो राजेश खन्ना को हीरो ले लो, या गुलशन नंदा से कहानी लिखवा लो. दोनों साथ हो तो सोने पे सुहागा. 'दाग' इसका शानदार उदाहरण है.
ये किवदंती तो बहुत मशहूर है कि उनके इंतज़ार में प्रकाशक मंडली हाथ में अटैचियां लिए खड़ी रहती थीं. वो जिसकी भी अटैची थाम लेते, उसकी लाइफ बन जाती. एक और दिलचस्प बात उनके बारे में मशहूर है. कहते हैं कि हिंदी उपन्यास जगत का ये सूरज अपनी रचनाएं उर्दू में लिखता था. जिसे बाद में उनके बहनोई बृजेंद्र सान्याल हिंदी में ट्रांसलेट करते थे.
एक समय था जब गुलशन नंदा का नाम हर पढ़ने-पढ़ाने वाला जानता था. फिर चाहे वो लोकप्रिय साहित्य का रसिया हो या गंभीर साहित्य को चाहने वाला पाठक. अब तो ये हाल है कि 20 लोगों से भरे कमरे में अगर ये नाम उछाल दो तो 19 लोग पलट कर पूछेंगे, 'कौन गुलशन नंदा'?
(भूले बिसरे नगमें की फेसबुक वाल से काॅपी पेस्ट)
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