प्रख्यात लेखक राजिंदर सिंह बेदी का एक बेहद लोकप्रिय उपन्यास है एक चादर मैली सी। इस उपन्यास पर इसी नाम से साल 1986 में एक फ़िल्म भी आ चुकी है जिसमें हेमा मालिनी, ऋषि कपूर, पूनम ढिल्लों व कुलभूषण खरबंदा जैसे कलाकारों ने काम किया था। और वो बहुत चर्चित फ़िल्म रही है। लेकिन इस बात से बहुत कम लोग वाकिफ़ होंगे कि खुद राजिंदर सिंह बेदी भी अपनी इस कहानी पर एक फ़िल्म बना रहे थे। फिल्म की काफ़ी शूटिंग शुरू भी हो चुकी थी। मगर एक बेहद दुर्भाग्यपूर्ण घटना की वजह से वो फ़िल्म कभी बन नहीं पाई। राजिंदर बेदी उस फ़िल्म को पंजाबी भाषा में बना रहे थे। और नाम था उस फ़िल्म का रानो। उस उपन्यास के मुख्य किरदार का नाम भी यही है। अगर ये फिल्म बन जाती तो राजिंदर सिंह बेदी साहब की पहली फ़िल्म यही होती।
इस उपन्यास की कहानी मोटे तौर पर यही है कि रानो की शादी तांगा चालक त्रिलोक से होती है। रानो और त्रिलोक के चार बच्चे भी होते हैं। लेकिन एक दिन त्रिलोक ही हत्या हो जाती है। उसके बाद समाज रानो की शादी ज़बरदस्ती उसके देवर मंगल से करा देता है। जबकी रानो मंगल को अभी तक अपने बेटे जैसा मानती आई थी। और वो ये भी जानती थी कि मंगल वास्तव में सलामत नाम की एक मुस्लिम लड़की से प्यार करता है।
राजिंदर सिंह बेदी ने 1964 में रानो फिल्म अनाउंस की थी। रानो के क़िरदार में उन्होंने गीता बाली को कास्ट किया था। मंगल का रोल धर्मेंद्र निभाने वाले थे। और मुस्लिम लड़की सलामत का रोल निभाने के लिए मीना राय को चुना गया था। हालांकि उस वक्त तक गीता बाली और शम्मी कपूर की शादी हो चुकी थी। गीता बाली दो बच्चों की मां भी बन चुकी थी। किसी को नहीं लग रहा था कि गीता बाली इस फ़िल्म में काम करने को तैयार होंगी। क्योंकि शम्मी कपूर से शादी करने के बाद उन्होंने अपना करियर त्याग दिया था। लेकिन सरप्राइज़िंगली, शम्मी कपूर ने गीता बाली को रानो में काम करने की परमिशन दे दी। राजिंदर सिंह बेदी बहुत खुश हुए थे तब। क्योंकि उनका मानना था कि रानो के किरदार के लिए गीता बाली से बेहतर कोई एक्ट्रेस हो ही नहीं सकती।
पति शम्मी कपूर से परमिशन मिलने के बाद गीता बाली ने ना सिर्फ़ रानो फिल्म साइन की, उन्होंने रानो को को-प्रोड्यूस करने का फैसला भी किया। बताया जाता है कि राजेश खन्ना, जो तब 21 साल के थे, जब उन्हें इस फिल्म के बारे में पता चला तो उन्होंने मंगल का रोल हासिल करने की कोशिश की थी। लेकिन राजिंदर सिंह बेदी ने उस रोल के लिए धर्मेंद्र को साइन किया, जो तब तक हिंदी फिल्मों में काम करना शुरू कर चुके थे।
साल 1964 में ही पंजाब के बंगा इलाके के पास रानो की शूटिंग स्टार्ट हो गई थी। गीता बाली जी ने रानो के किरदार में खुद को पूरी तरह से ढाल लिया था। वो डूब गई थी उस किरदार में। अपने किरदार को और ज़्यादा रियलिस्टिक और ऑथेंटिक बनाने के लिए गीता बाली ने कुछ लोकल महिलाओं के कपड़े भी पहने थे। लेकिन तभी वो ट्रैजेडी हो गई जिसने शम्मी कपूर के जीवन की सारी खुशियां छीन ली थी। गीता बाली को शटूिंग के दौरान चेचक हो गई। शूटिंग रोककर गीता बाली इलाज के लिए वापस मुंबई गई। उन्हें ठीक करने की बहुत कोशिशें की गई। लेकिन वो ठीक ना हो सकी। 21 जनवरी 1965 को उनकी मृत्यु हो गई।
साल 2011 में गीता बाली जी के पुत्र आदित्य कपूर ने टाइम्स ऑफ़ इंडिया को एक इंटरव्यू दिया था जिसमें उन्होंने बताया था कि वो भी अपनी मां गीता बाली के साथ रानो की शूटिंग लोकेशन पर गए थे। वो तब एक बोर्डिंग स्कूल में पढ़ रहे थे। मां ही उन्हें बोर्डिंग स्कूल से लोकेशन तक साथ लेकर गई थी। मगर वहां उन्हें चेचक का इन्फैक्शन लग गया। वो बीमार पड़ गई। उनकी हालत हर दिन ज़्यादा से ज़्यादा बिगड़ती चली गई। उस वक्त पिता शम्मी कपूर तीसरी मंज़िल फ़िल्म की शूटिंग कर रहे थे। उन्होंने गीता बाली को बचाने की बहुत कोशिशें की थी। लेकिन 15 दिनों के भीतर ही स्मॉल पॉक्स यानि चेचक से गीता बाली की डेथ हो गई।
गीता बाली जी की डेथ हुई तो रानो फिल्म का काम भी रुक गया। राजिंदर सिंह बेदी पर बहुत बुरा असर पड़ा गीता बाली की मृत्यु का। और उन्होंने वो फिल्म फिर कभी ना बनाने का फैसला किया. बताया तो ये भी जाता है(पता नहीं सच है या झूठ।) कि राजिंदर सिंह बेदी ने रानो की स्क्रिप्ट फाड़कर गीता बाली की चिता में ही जला दी थी। आखिरकार राजिंदर सिंह बेदी का डायरेक्टोरियल डेब्यू 1970 की दस्तक फिल्म से हुआ था।
दस्तक में संजीव कुमार व रेहाना सुल्तान हीरो-हीरोइन थे। और दस्तक के लिए इन दोनों कलाकारों को बेस्ट एक्टर व बेस्ट एक्ट्रेस राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिले थे। संगीतकार मदन मोहन जी को बेस्ट म्यूज़िक डायरेक्टर नेशनल अवॉर्ड मिला था। जबकी दस्तक के सिनेमैटोग्राफ़र कमल बोस फ़िल्मफ़ेयर बेस्ट सिनेमैटोग्राफ़ी अवॉर्ड मिला था।
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