संजीव कुमार

 संजीव कुमार 

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हरफन मौला कलाकार संजीव कुमार की आज  6 नवंबर को पुण्यतिथि है, साल 1985 में उनका निधन हो गया था। उस दिन संजीव कुमार अपने कमरे में जमीन पर पेट के बल पड़े मिले थे और उन्हें हार्ट अटैक भी आया था।


हिंदी सिनेमा के महान कलाकारों में शुमार रहे  संजीव कुमार सत्तर के दशक के टॉप स्टार्स में शुमार रहे। वह उस वक्त अन्य हीरो से भी ज्यादा मेहनताना पाते थे। वह एक हरफनमौला स्टार थे, जिन्होंने रोमांटिक से लेकर थ्रिलर फिल्में तक कीं। दो फिल्मों के लिए उन्होंने नेशनल अवॉर्ड तक जीते। सबकुछ अच्छा चल रहा था, लेकिन एक वक्त ऐसा आया, जब संजीव कुमार को फिल्में मिलना बंद हो गईं। इस वजह से वह डिप्रेशन में चले गए। लेकिन जब 6 नवंबर 1985 में संजीव कुमार की मौत हुई, तो उनकी 10 से भी ज्यादा फिल्में रिलीज हुई थीं, जिनमें से कुछ हिट रहीं।


फिल्मों में आने से पहले Sanjeev Kumar का नाम हरिहर जरीवाला था। चूंकि संजीव के पिता भगवान श्री कृष्ण के भक्त थे, तो उन्होंने बेटे का नाम हरिहर जरीवाला रख दिया था। लेकिन फिल्मों में आने के बाद वह संजीव कुमार बन गए और सबके दिलों पर राज करने लगे। संजीव कुमार ने 'खिलौना', 'अंगूर', 'शोले', 'दस्तक' और 'कोशिश' जैसी फिल्में कीं। पर क्या पता था कि बुरा वक्त संजीव कुमार को घेर लेगा।


जब फिल्में मिलना बंद हुईं तो संजीव कुमार को डिप्रेशन हो गया। करीब 1978 के आस-पास उन्हें हार्ट अटैक आया, जिसके बाद उनकी हार्ट सर्जरी करनी पड़ी थी। संजीव कुमार आखिरी दिनों में एकदम तन्हा हो गए थे। आपको जानकर हैरानी होगी कि उनके परिवार में सभी पुरुषों की मौत 50 साल की उम्र से पहले हो जाती थी। संजीव कुमार के साथ भी यही हुआ। उनकी मौत 47 साल की उम्र में हो गई थी। इससे पहले उनके दादा और पिता की भी मौत 50 साल की उम्र से पहले हो गई थी।


संजीव कुमार ने कहा था- बूढ़ा होना मेरे नसीब में नहीं इसलिए फिल्मों में बूढ़े का रोल करके दिल के अरमान पूरे कर रहा हूँ।


 हार्ट अटैक आने के बाद से संजीव कुमार की सेहत को लेकर और एहतियात बरती जाने लगी थी। संजीव कुमार के कमरे में हर किसी को जाने की इजाजत नहीं थी। उनके कमरे में घंटी लगाई गई थी। एक्टर जब घंटी बजाते तो ही कोई अंदर जाता था। संजीव कुमार के कमरे में अगर किसी को जाने की इजाजत थी। पूरी एहतियात और परहेज के साथ संजीव कुमार ने पांच साल निकाल लिए थे और उन्होंने फिल्मों की शूटिंग भी शुरू कर दी थी। लेकिन 5 नवंबर 1985 को सब बदल गया। उस दिन वह फिल्म 'कत्ल' की शूटिंग और फिर डबिंग का काम करने के बाद रात को पार्टी में चले गए और फिर वहां से प्रोड्यूसर नारी शिप्पी की बेटी के घर खाने पर चले गए। वहां से वह सुबह 4 बजे लौटे।


उदय जरीवाला ने बताया कि हाउसकीपर को लगा कि संजीव कुमार सुबह देर से उठेंगे। इस चक्कर में किसी ने उन्हें नहीं उठाया। थोड़ी देर बाद जमनादास जी आए और वह हाउसकीपर से उनके बारे में पूछने के बाद कमरे में चले गए। वहां उन्होंने देखा कि संजीव कुमार उल्टियां कर रहे थे। जमनादास तुरंत डॉक्टर को लाने चले गए। उसी बीच सचिन पिलगांवकर भी वहां आए और जब उन्हें पता चला कि डॉक्टर को बुलाया गया है, तो वह घबरा गए। जब डॉक्टर के साथ सभी लोग संजीव कुमार के कमरे में पहुंचे तो देखा कि वह जमीन पर पेट के बल पड़े थे। उनके बगल में सॉर्बिट्रेट टैबलेट की शीशी पड़ी थी। डॉक्टर ने तुरंत ही संजीव कुमार को CPR दिया, पर संजीव कुमार तब तक इस दुनिया से जा चुके थे।


संजीव कुमार ने अपने करियर की शुरुआत थियेटर से की थी। 22 साल की उम्र में उन्होंने 'All My Sons' नाम के नाटक में एक बुजुर्ग का किरदार निभाया था। उन्हें फिल्म 'दस्तक' और 'कोशिश' में अभिनय के लिए 2 बार नेशनल फिल्म एवार्ड से सम्मानित किया गया था। ‘खिलौना’, ‘आंधी’, ‘मौसम’ ‘नया दिन नयी रात’ और ‘अंगूर’ जैसी फिल्मों में उनके अभिनय की जमकर सराहना हुई।

Rajnikant shukla

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