उस याद की एक याद- जगजीत सिंह
मैं जब-जब, जहां-जहां से जगजीत को सुनकर लौटा, तब-तब मैं ज्यादा जगजीत होता गया. जब भी जगजीत गुनगुनाते मिले तब-तब इंदौर, मुम्बई के दर्जनों लाइव शो दिल में धड़कने लगे..!
किसी दोपहर, और आंखों से नींद चुराने वाली रातों के बीच मन के किसी कोने में जगजीत हमेशा बने रहे. गुमसुम, अकेले और जिंदगी की आपाधापी के बीच जगजीत की आवाज और उनकी गजलें एक सहारा देती रहीं.
जब वे गा रहे हों तब भी और जब वे मौन रहे तब भी.
बीते कई दिनों से कई दोपहर और रातें ऐसे ही बीत रही है जैसे सालों पहले जगजीत के रहते बीतती थी.
जगजीत हर गांव, कस्बे के युवा और खासो-आम का बसंत थे जो उन्हें उनकी प्रेम की गहराई का अनुभव कराता था और उसकी आवाज बनकर उन्हें प्रेम की संजीदा खुमारी में डुबकी लगवा देता था.
शहर कई दर्जन दोस्त, जिनकी पान की दुकाने थीं, साइकिल और फूल मालाओं सहित चाय के छोटे होटल थे, वहां उन्हें जगजीत कागज़ की कश्ती के साथ बचपन याद दिलाते रहे..
जगजीत गाते रहे और हर दिल का खालीपन भरते रहे. वे ही उनके और उन जैसे लाखों के लिए असल गजल का अर्थ थे, जो ता-उम्र उनके अंदर अपने संघर्षो, दुखों और मानसिक उलझनों के साथ एक मौन सूकून देते रहे.
इधर घर से कुछ ही दूरी पर बहती नर्मदा की शाम और उसके किनारे पर शांत पड़े ठंडी बालू पर एक वॉकमैन सदा साथ रहा. जगजीत जिंदगी का फलसफा समझाते रहे.
लाल सूरज की बिंदिया से सजी धजी ढलती शाम में रेवा की शांत और यदा-कदा चलने वाली नावों के चप्पुओं की छपा-छप के बीच जगजीत को सुनना गजल को जीने के जैसा ही रहा. लगता था मानों गजल अंदर से कोई और आकार लेने वाली हो.
जगजीत की गजल और मंद साज पर उनकी आत्मिक छुअन के साथ हल्की लहर खाती आवाज उम्र के हर पड़ाव के साथ शब्द बनकर अंदर कविता पैदा करती रही और उसे समय के साथ आंच देती रही.
हरदा छूटा, फिर इंदौर भी छूटा, लेकिन जगजीत ना छूटे, वे समय के साथ और करीब आए. मुंबई ने उसी रफ्तार के साथ जगजीत की गजलों के बेहद करीब ला दिया. जगजीत की दुनिया मन में बसती रही. कभी बांद्रा के बैंड स्टेंड पर समुंदर की उनींदी नींद में ढलती शाम के बीच जगजीत मंथर गति से चिड़ियों को दाने, बच्चों को गुड़धानी देने के लिए गुनगुनाते रहे, तो कभी सायन के सन्मुखानंद में सितारा देवी की पग थापों और गुलाम अली के हारमोनियम-तबले की जुगल स्वरलहरियों के बीच नई साजों की उंगली थामे जगजीत की आवाज जिंदगी के अधूरेपन में राहत देते रहे..!
जगजीत गए कहां? कहीं नहीं वे यहींं रहे..
एक आवाज़ तो और गहरी उतरती जाती है...
अभी कल ही तो सुन रहा था
अम्बे चरण कमल हैं तेरे..
या
वर देss वर दे..वीणा वादिनी वर दे.
वह आवाज जब तब भीतर उतरती रहती है और जिंदगी के किसी खाली कोने का सुकून बन जाती है.
जगजीत को कई बार सुनने के बाद लगने लगा कि वे महज किसी महफिल में समय के किसी हिस्से में गूंजने वाली और साज पर लहर खाती आवाज ही नहीं थे न ही उनकी आवाज किसी समारोह या फिर संगीत लहरियों में कैद आवाज रही. जगजीत की गजलें और उनकी आवाज इस भावविहीन और संवेदनाशून्य समय में इंसानी जज्बातों और इंसान के भीतर के दुख और शोक को सहेजकर उन्हें ममत्व, प्रेम और आत्मिक संतुष्टि पहुंचाती रही.
वह आवाज़ लाखों दिलों के दर्द की आवाज़ थी. वह स्वर हर दर्द की आह रहे.
आह का यह असर एक नहीं कई उम्र तक रहेगा जगजीत.
10 अक्टूबर की यह दोपहर तुम्हारे न होने के बीच सबसे ज्यादा तुम्हारे होने में बीत रही है..
सारंग उपाधयाय
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