राजकुमार के कुछ मशहूर किस्से

 राजकुमार के कुछ मशहूर किस्से

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राज कुमार ने अपनी पढ़ाई के बाद मुंबई पुलिस में सब-इंस्पेक्टर की नौकरी की थी। उनकी रौबीली आवाज़ देखकर लोगों ने उन्हें फिल्मों में काम करने की सलाह दी, जिसके बाद उन्होंने पुलिस की नौकरी छोड़कर अभिनय की दुनिया में कदम रखा।
रजनीकांत भी राजकुमार के व्यक्तित्व से इतने प्रभावित थे कि उन्होंने उनके साथ काम करने से इनकार कर दिया था। एक बार जब उन्हें फिल्म 'तिरंगा' में उनके साथ काम करने का मौका मिला, तो उन्होंने राजकुमार के रौब के कारण फिल्म को छोड़ दिया।
एक इवेंट के दौरान संगीतकार बप्पी लाहिरी ने राजकुमार से मिलने की इच्छा जताई। जब राजकुमार बप्पी लाहिरी से मिले, तो उन्होंने उन्हें देखते हुए कहा, "जानी, गले में सिर्फ मंगलसूत्र की कमी है"। इस बात से बप्पी लाहिरी सकते में आ गए और हाथ जोड़कर वहां से चले गए।
फिरोज खान ने एक बार बताया कि फिल्म 'ऊंचे लोग' की सफलता के बाद, राजकुमार ने फिरोज खान के पास जाकर अपनी हेकड़ी दिखाते हुए कहा था, "जॉनी, तुम अभी बच्चे हो, एक्टिंग क्या होती है, ये हमसे सीखो"।
यह किस्सा उस वक्त का है जब 'दम मारो दम' जैसे गानों के साथ बॉलीवुड में जीनत अमान तेजी से उभर रही थीं. हर ओर जीनत की चर्चा चल रही थी. कहा जाता है कि एक पार्टी में जीनत ने राज कुमार को देखा. इसके बाद वे खुद ही मिलने चली गईं. उन्होंने सोचा होगा कि मैं इतना मशहूर हो रही हूं, जरूर राज कुमार तारीफ करेंगे. पर ये क्या, वो तो राज कुमार ठहरे. उन्होंने जीनत से मिलने के बाद कहा था- तुम तो बहुत खूबसूरत हो. फिल्मों में ट्राई क्यों नहीं करती हो. ये सुन जीनत हैरान रह गईं थीं।
1992 में आई फिल्म तिरंगा में राज कुमार ने ब्रिगेडियर सूर्यदेव सिंह का किरदार निभाया था. फिल्म में इंस्पेक्टर बने नाना पाटेकर ने भी उनका अच्छी तरह से साथ निभाया था. पर इन दो गर्म मिजाज एक्टर को कास्ट करने से पहले निर्देशक-प्रोड्यूसर मेहुल कुमार चिंतित थे. उन्हें डर था कि जानी और नाना सेट पर आपस में भिड़ ना पड़ें. फिल्म में राज कुमार का नाम पहले से ही तय था, पर नाना बाद में इसमें शामिल हुए. निर्देशक को कई लोगों ने समझाया था कि अगर दोनों को साथ काम कराओगे तो पता नहीं तिरंगा लहराएगा भी या नहीं. निर्देशक ने नाना पाटेकर को आश्वासन दिया था कि स्क्रिप्ट का एक अक्षर भी नहीं बदला जाएगा. जब मुहेल ने ये बात राज कुमार के सामने दोहराई थी तो राज साहब ने हंसते हुए कहा था- क्या मैंने कभी दखल दिया है? बता दें कि तिरंगा 6 महीने में बन कर तैयार हुई थी और बॉक्स ऑफिस पर शानदार सफलता पाई थी।
1968 में आई फिल्म आंखें को लेकर भी राजकुमार के साथ एक किस्सा जुड़ा हुआ है. फिल्म तो धमेंद्र ने की थी पर किस्सा राज कुमार का है. हुआ यूं कि रामानंद सागर फिल्म में अपने दोस्त राज कुमार को कास्ट करना चाहते थे. वे उनके घर पहुंचे, कहानी सुनाई. पर शायद राज कुमार को कहानी पसंद नहीं आई और उन्होंने अपने पालतू कुत्ते को आवाज लगाई. जैसे ही उनका डॉगी पहुंचा राज कुमार ने पूछा- क्या तुम रोल करना चाहते हो? कुत्ते ने उनकी ओर देखा और गर्दन हिला दी. इसके बाद राज कुमार रामानंद सागर की ओर मुड़े और कहा- देखा ये रोल तो मेरा कुत्ता भी नहीं करना चाहेगा. रामानंद सागर उस वक्त वहां से चले गए. फिल्म धर्मेंद्र को ऑफर हुई और बॉक्स ऑफिस पर बहुत हिट रही. इसे धर्मेंद्र की अच्छी फिल्मों में गिना जाता है. इस घटना के बाद रामानंद ने कभी भी राज कुमार के साथ काम नहीं किया।
राजकुमार काफी मूडी किस्म के इंसान थे। जिनकी उनके साथ ट्यूनिंग हो जाती थी, उनके साथ उन्हें कोई परेशानी नहीं होती थी, लेकिन कई बार उनका स्वभाव अन्य कलाकारों को भी मुश्किल में डाल देता था।
रजनीकांत शुक्ला की वाल से

खुद-ब-खुद झुक जाते
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सुनते हैं कि एक बार फिल्म अभिनेता राजकुमार जी को किसी ने पूछा - 'सर आपकी जब भी फ़िल्मों में एंट्री होती है तो कैमरे के ऐंगल हमेशा आपके पाँवों से ही क्यों शुरू करते है।
राजकुमार जी बोले कि- ,” जानी हम जब भी कैमरे के आगे आते है तो कैमरे हमें देखकर खुद-ब-खुद झुक जाते है !”
आज जिनका जन्मदिन है
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राज कुमार का जन्म 8 अक्तूबर 1926 बलूचिस्तान (अब पाकिस्तान में) में हुआ। वे हिन्दी फ़िल्मों में एक भारतीय अभिनेता थे। इनका नाम कुलभूषण पंडित था लेकिन फ़िल्मी दुनिया में ये अपने दूसरे नाम 'राज कुमार' के नाम से प्रसिद्ध रहे। पारम्परिक पारसी थियेटर की संवाद अदाइगी को इन्होंने अपनाया और यही उनकी विशेष पहचान बनी। इनके द्वारा अभिनीत प्रसिद्ध फ़िल्मों में पैग़ाम, वक़्त, नीलकमल, पाकीज़ा, मर्यादा, हीर रांझा, सौदाग़र आदि हैं।
राजकुमार स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद मुंबई के माहिम थाने में सब इंस्पेक्टर के रूप में काम करने लगे।
एक दिन रात में गश्त के दौरान एक सिपाही ने राजकुमार से कहा कि हजूर आप रंग-ढंग और कद-काठी में किसी हीरो से कम नहीं है। फ़िल्मों में यदि आप हीरो बन जायें तो लाखों दिलों पर राज कर सकते हैं और राजकुमार को सिपाही की यह बात जंच गयी।
राजकुमार मुंबई के जिस थाने मे कार्यरत थे। वहां अक्सर फ़िल्म उद्योग से जुड़े लोगों का आना-जाना लगा रहता था। एक बार पुलिस स्टेशन में फ़िल्म निर्माता बलदेव दुबे कुछ जरूरी काम के लिये आये हुए थे। वह राजकुमार के बातचीत करने के अंदाज से काफी प्रभावित हुए और उन्होंने राजकुमार से अपनी फ़िल्म 'शाही बाजार' में अभिनेता के रूप में काम करने की पेशकश की। राजकुमार सिपाही की बात सुनकर पहले ही अभिनेता बनने का मन बना चुके थे। इसलिए उन्होंने तुरंत ही अपनी सब इंस्पेक्टर की नौकरी से इस्तीफा दे दिया और निर्माता की पेशकश स्वीकार कर ली।
शाही बाजार को बनने में काफी समय लग गया और राजकुमार को अपना जीवनयापन करना भी मुश्किल हो गया। इसलिए उन्होंने वर्ष 1952 मे प्रदर्शित फ़िल्म 'रंगीली' में एक छोटी सी भूमिका स्वीकार कर ली। यह फ़िल्म सिनेमा घरों में कब लगी और कब चली गयी। यह पता ही नहीं चला। इस बीच उनकी फ़िल्म 'शाही बाजार' भी प्रदर्शित हुई। जो बॉक्स ऑफिस पर औंधे मुंह गिरी।
शाही बाजार की असफलता के बाद राजकुमार के तमाम रिश्तेदार यह कहने लगे कि तुम्हारा चेहरा फ़िल्म के लिये उपयुक्त नहीं है। और कुछ लोग कहने लगे कि तुम खलनायक बन सकते हो। वर्ष 1952 से 1957 तक राजकुमार फ़िल्म इंडस्ट्री में अपनी जगह बनाने के लिए संघर्ष करते रहे।
'रंगीली' के बाद उन्हें जो भी भूमिका मिली राजकुमार उसे स्वीकार करते चले गए। इस बीच उन्होंने 'अनमोल' 'सहारा', 'अवसर', 'घमंड', 'नीलमणि' और 'कृष्ण सुदामा' जैसी कई फ़िल्मों में अभिनय किया लेकिन इनमें से कोई भी फ़िल्म बॉक्स ऑफिस पर सफल नहीं हुई।
वर्ष 1957 में प्रदर्शित महबूब ख़ान की फ़िल्म मदर इंडिया में राज कुमार गांव के एक किसान की छोटी सी भूमिका में दिखाई दिए। हालांकि यह फ़िल्म पूरी तरह अभिनेत्री नरगिस पर केन्द्रित थी फिर भी राज कुमार अपनी छोटी सी भूमिका में अपने अभिनय की छाप छोड़ने में कामयाब रहे। इस फ़िल्म में उनके दमदार अभिनय के लिए उन्हें अंतर्राष्ट्रीय ख्याति भी मिली और फ़िल्म की सफलता के बाद राज कुमार बतौर अभिनेता फ़िल्म इंडस्ट्री में स्थापित हो गए।
वर्ष 1959 में प्रदर्शित फ़िल्म 'पैग़ाम' में उनके सामने हिन्दी फ़िल्म जगत के अभिनय सम्राट दिलीप कुमार थे लेकिन राज कुमार ने यहाँ भी अपनी सशक्त भूमिका के ज़रिये दर्शकों की वाहवाही लूटने में सफल रहे। इसके बाद राज कुमार 'दिल अपना और प्रीत पराई-1960', 'घराना- 1961', 'गोदान- 1963', 'दिल एक मंदिर- 1964', 'दूज का चांद- 1964' जैसी फ़िल्मों में मिली कामयाबी के ज़रिये राज कुमार दर्शको के बीच अपने अभिनय की धाक जमाते हुए ऐसी स्थिति में पहुँच गये जहाँ वह फ़िल्म में अपनी भूमिका स्वयं चुन सकते थे। वर्ष 1965 में प्रदर्शित फ़िल्म काजल की जबर्दस्त कामयाबी के बाद राज कुमार बतौर अभिनेता अपनी अलग पहचान बना ली।
वर्ष 1965 बी.आर.चोपड़ा की फ़िल्म वक़्त में अपने लाजवाब अभिनय से वह एक बार फिर से अपनी ओर दर्शक का ध्यान आकर्षित करने में सफल रहे। फ़िल्म वक़्त में राज कुमार का बोला गया एक संवाद "चिनाय सेठ जिनके घर शीशे के बने होते है वो दूसरों पे पत्थर नहीं फेंका करते या फिर चिनाय सेठ ये छुरी बच्चों के खेलने की चीज़ नहीं हाथ कट जाये तो ख़ून निकल आता है" दर्शकों के बीच काफ़ी लोकप्रिय हुआ। फ़िल्म वक़्त की कामयाबी से राज कुमार शोहरत की बुंलदियों पर जा पहुँचे। ऐसी स्थिति जब किसी अभिनेता के सामने आती है तो वह मनमानी करने लगता है और ख्याति छा जाने की उसकी प्रवृति बढ़ती जाती है और जल्द ही वह किसी ख़ास इमेज में भी बंध जाता है। लेकिन राज कुमार कभी भी किसी ख़ास इमेज में नहीं बंधे इसलिये अपनी इन फ़िल्मो की कामयाबी के बाद भी उन्होंने 'हमराज़- 1967', 'नीलकमल- 1968', 'मेरे हूजूर- 1968', 'हीर रांझा- 1970' और 'पाकीज़ा- 1971' में रूमानी भूमिका भी स्वीकार की जो उनके फ़िल्मी चरित्र से मेल नहीं खाती थी इसके बावजूद भी राज कुमार यहाँ दर्शकों का दिल जीतने में सफल रहे।
वर्ष 1978 में प्रदर्शित फ़िल्म कर्मयोगी में राज कुमार के अभिनय और विविधता के नए आयाम दर्शकों को देखने को मिले। इस फ़िल्म में उन्होंने दो अलग-अलग भूमिकाओं में अपने अभिनय की छाप छोड़ी। अभिनय में एकरुपता से बचने और स्वयं को चरित्र अभिनेता के रूप में भी स्थापित करने के लिए राज कुमार ने अपने को विभिन्न भूमिकाओं में पेश किया। इस क्रम में वर्ष 1980 में प्रदर्शित फ़िल्म बुलंदी में वह चरित्र भूमिका निभाने से भी नहीं हिचके और इस फ़िल्म के जरिए भी उन्होंने दर्शको का मन मोहे रखा। इसके बाद राज कुमार ने 'कुदरत- 1981', 'धर्मकांटा- 1982', 'शरारा- 1984', 'राजतिलक- 1984', 'एक नयी पहेली- 1984', 'मरते दम तक- 1987', 'सूर्या- 1989', 'जंगबाज- 1989', 'पुलिस पब्लिक- 1990' जैसी कई सुपरहिट फ़िल्मों के ज़रिये दर्शको के दिल पर राज किया।
वर्ष 1991 में प्रदर्शित फ़िल्म 'सौदागर' में राजकुमार के अभिनय के नए आयाम देखने को मिले। सुभाष घई की निर्मित इस फ़िल्म में राजकुमार 1959 में प्रदर्शित फ़िल्म 'पैगाम' के बाद दूसरी बार दिलीप कुमार के सामने थे और अभिनय की दुनिया के इन दोनों महारथियों का टकराव देखने लायक था।
नब्बे के दशक में राज कुमार ने फ़िल्मों मे काम करना काफ़ी कम कर दिया। इस दौरान राज कुमार की 'तिरंगा- 1992', 'पुलिस और मुजरिम इंसानियत के देवता- 1993', 'बेताज बादशाह- 1994', 'जवाब- 1995', 'गॉड और गन' जैसी फ़िल्में प्रदर्शित हुई।
राजकुमार बेहद मुंहफट आदमी थे। जो दिल में आता था, उसे शब्दों का बाण बनाकर सामने वाले पर दाग देते थे। ये बात तो सोचते भी नहीं थे कि सामने वाले को इसका बुरा लगेगा या नहीं। पेश हैं कुछ ऐसे किस्से, जो बॉलीवुड में बहुत मशहूर हैं। ये कितने सही हैं या गलत, ये तो हम नहीं बता सकते, लेकिन इन्हें खूब चटखारे लेकर सुनाया गया।
राजकुमार और गोविंदा एक फिल्म की शूटिंग कर रहे थे। गोविंदा झकाझक शर्ट पहने हुए राजकुमार के साथ शूटिंग खत्म होने के बाद वक्त बिता रहे थे।। राजकुमार ने गोविंदा से कहा यार तुम्हारी शर्ट बहुत शानदार है। चीची इतने बड़े आर्टिस्ट की यह बात सुनकर बहुत खुश हो गए। उन्होंने कहा कि सर आपको यह शर्ट पसंद आ रही है तो आप रख लीजिए। राजकुमार ने गोविंदा से शर्ट ले ली। गोविंदा खुश हुए कि राजकुमार उनकी शर्ट पहनेंगे। दो दिन चीची ने देखा कि राजकुमार ने उस शर्ट का एक रुमाल बनवाकर अपनी जेब में रखा हुआ है।
एक पार्टी में संगीतकार बप्पी अक्खड़ राजकुमार से मिले। अपनी आदत के मुताबिक बप्पी ढेर सारे सोने से लदे हुए थे। बप्पी को राजकुमार ने ऊपर से नीचे देखा और फिर कहा वाह, शानदार। एक से एक गहने पहने हो, सिर्फ मंगलसूत्र की कमी रह गई है। बप्पी का मुंह खुला का खुला ही रह गया होगा।
जीनत अमान फिल्म इंडस्ट्री में फेमस हो गई थी। दम मारो दम गाना धूम मचा चुका था। फिल्म निर्माता अपनी फिल्म में जीनत को साइन करने के लिए मरे जा रहे थे। एक पार्टी में जीनत की मुलाकात राजकुमार से हुई। जीनत को लगा तारीफ के दो-चार शब्द राजकुमार जैसे कलाकार से सुनने को मिलेगी। जीनत को राजकुमार ने देखा और कहा कि तुम इतनी सुंदर हो, फिल्मों में कोशिश क्यों नहीं करती। अब ये बात सुनकर जीनत का क्या हाल हुआ होगा, समझा ही जा सकता है।
दुनिया जानती है कि राजेश्वर सिंह जब दोस्ती निभाता है तो अफ़साने बन जाते हैं मगर दुश्मनी करता है तो इतिहास लिखे जाते है।
नितांत अकेले रहने वाले राज कुमार ने शायद यह महसूस कर लिया था कि मौत उनके काफ़ी क़रीब है इसीलिए अपने पुत्र पुरू राज कुमार को उन्होंने अपने पास बुला लिया और कहा, "देखो मौत और ज़िंदगी इंसान का निजी मामला होता है। मेरी मौत के बारे में मेरे मित्र चेतन आनंद के अलावा और किसी को नहीं बताना। मेरा अंतिम संस्कार करने के बाद ही फ़िल्म उद्योग को सूचित करना।"
3 जुलाई 1996 को इनका निधन मुम्बई में हुआ।

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