अमिताभ बच्चन

 एक स्वप्न, एक भविष्यवाणी – जब पिता ने कहा, ‘मेरे पिता लौट आएंगे’— सदी के महानायक — अमिताभ बच्चन। आज जिनके नाम का जादू पूरे संसार में चलता है, उनकी कहानी केवल सिनेमा की नहीं, बल्कि एक पिता की सीख और मूल्यों से बनी विरासत की कहानी है। 11 अक्टूबर 1942 को इलाहाबाद में जन्मे अमिताभ, उस घर में आए जहाँ शब्दों की पूजा होती थी और जीवन कविता की तरह बहता था। उनके पिता, भारत के महान कवि हरिवंशराय बच्चन, और माँ तेजी बच्चन, दोनों ने मिलकर उस बीज को सींचा जिससे एक दिन “अमिताभ” नाम का वृक्ष फूला-फलता गया।


लेकिन इस जन्म के पीछे की कहानी उतनी ही भावनात्मक है जितनी प्रेरणादायक। अमिताभ के जन्म से एक साल पहले हरिवंशराय बच्चन अपने जीवन के सबसे कठिन दौर से गुजर रहे थे। पिता के निधन और माँ के वियोग ने उन्हें तोड़ दिया था। पहली पत्नी श्यामा पहले ही टीबी से चल बसी थीं। ऐसे में जीवन से मोहभंग हो चुका था। परंतु नियति को कुछ और ही मंज़ूर था।


तेजी से मुलाकात – कविता से शुरू हुई प्रेमकथा


1941 में लाहौर के फतेहचंद कॉलेज में जब हरिवंशराय बच्चन एक साहित्यिक गोष्ठी में कविता सुना रहे थे, तो वहां बैठी एक युवती — तेजी सूरी — उनकी आवाज़ में डूब गईं। कविता समाप्त हुई तो तेजी की आंखों से आंसू बह निकले। यही क्षण वह मोड़ था, जिसने दोनों की जिंदगी बदल दी।


हरिवंशराय बच्चन ने उसी क्षण तय कर लिया कि यही वह स्त्री है जिसके साथ वह अपना जीवन बाँटना चाहते हैं। कुछ ही समय में तेजी ने अपनी सगाई तोड़ दी और जनवरी 1941 में दोनों ने सिविल मैरिज कर ली। उसी वर्ष यह खबर आई — “तेजी मां बनने वाली हैं।”


एक स्वप्न, एक भविष्यवाणी – जब पिता ने कहा, ‘मेरे पिता लौट आएंगे’


10 अक्टूबर 1942 की रात। हरिवंशराय बच्चन के पिता की पहली बरसी थी। घर में उनके करीबी कवि-मित्र सुमित्रानंदन पंत ठहरे हुए थे। रात को हरिवंशराय ने सपना देखा — उनके पिताजी पूजा की कोठरी में बैठ रामचरितमानस पढ़ रहे हैं। पाठ में वह पंक्ति आई — “चाहउं तुम्हहि समान सुत” — अर्थात् “मैं तुम्हारे समान पुत्र चाहता हूँ।”


उसी क्षण तेजी ने उन्हें नींद से जगाया — प्रसव पीड़ा शुरू हो चुकी थी। हरिवंशराय बोले, “तेजी, तुम्हें लड़का ही होगा, उसके रूप में मेरे पिताजी की आत्मा आ रही है।” अगले ही दिन 11 अक्टूबर 1942, अमिताभ का जन्म हुआ। शाम को पंत जी ने बालक का नाम रखा — ‘अमिताभ’, जिसका अर्थ है ‘जिसका तेज कभी न मिटे।’


हरिवंशराय ने पुत्र के जन्म पर लिखा –

“फुल्ल कमल, गोद नवल, मोद नवल, गेह में विनोद नवल…”

यह कविता आज भी उस भाव को जीवित रखती है — जब एक पिता ने अपने पुत्र में पुनर्जन्म देखा।


शुरुआती वर्ष – बीमारी, त्याग और पिता का व्रत


अमिताभ जब छोटे थे, तो गंभीर बीमारियों से जूझे। मलेरिया ने हालत बिगाड़ दी। हरिवंशराय बच्चन उस समय महू में ट्रेनिंग पर थे। रोज तेजी के खत आते — “अमित की तबीयत नहीं सुधर रही।” चिंतित पिता ने एक दिन संकल्प लिया — “अगर मेरा बेटा ठीक हो जाए, तो मैं कभी शराब नहीं पीऊंगा।” जल्द ही तेजी का खत आया — “अमित की तबीयत सुधर रही है।” उसी क्षण उन्होंने ताउम्र शराब से दूरी बना ली।


यह एक पिता का व्रत था, जिसने आगे चलकर अमिताभ के जीवन में अनुशासन और संयम की नींव रखी।


स्कूल के दिन – ‘बच्चन’ उपनाम और नई पहचान


अमिताभ के चार वर्ष पूरे होते ही इलाहाबाद के सेंट मैरीज कॉन्वेंट स्कूल में उनका दाखिला हुआ। माँ तेजी चाहती थीं कि बेटा अंग्रेजी माध्यम से पढ़े, जबकि पिता सरकारी स्कूल के पक्षधर थे। आखिरकार तेजी की बात मानी गई।


यही वह दौर था जब हरिवंशराय ने तय किया कि उनका बेटा किसी जाति या उपनाम से नहीं, बल्कि “मानवता” से पहचाना जाएगा। उन्होंने अपने उपनाम “श्रीवास्तव” की जगह “बच्चन” अपनाया, जिसका अर्थ है – “बालपन, मासूमियत।” उसी से परिवार की नई पहचान बनी – अमिताभ बच्चन।


बचपन की सीख – जब माँ ने कहा ‘जाओ, जिसने मारा, उसे मारो’


अमिताभ का बचपन भी सामान्य बच्चों की तरह था। एक बार वह बाहर खेलते हुए कुछ बड़े लड़कों से हारकर रोते हुए घर लौटे। माँ ने गुस्से में कहा — “जिसने तुम्हें मारा, जाओ उसे मारकर आओ।” पतले-दुबले अमिताभ बाहर निकले और इस बार जीतकर लौटे।

यह वही सीख थी जिसने आगे जाकर “दीवार” और “जंजीर” के नायक में जज़्बा भरा।


एक और प्रसंग — एक बार उन्होंने दुकान से बिना बताए रबर उठा ली। जब माँ को पता चला तो बेंत उठाई और तब तक मारी जब तक वह टूट नहीं गई। अमिताभ के शरीर पर निशान रह गए, पर उस दिन उन्होंने सच्चाई और ईमानदारी का सबक सीखा जो आज तक कायम है।


शेरवुड कॉलेज – मंच की ओर पहला कदम


इलाहाबाद के बाद उनका दाखिला नैनीताल के शेरवुड कॉलेज में हुआ। यहाँ उन्होंने स्कूल प्ले में हिस्सा लिया और पहले ही साल “बेस्ट एक्टर” का अवॉर्ड पाया। अभिनय की यह कला उन्हें माँ से विरासत में मिली थी। तेजी बच्चन खुद नाट्यकला से जुड़ी थीं, लेकिन शादी के बाद मंच से दूर हो गईं। अमिताभ में उन्होंने अपनी अधूरी ख्वाहिश पूरी होती देखी।


मन का हो तो अच्छा, न हो तो और भी अच्छा – पिता की अमर सीख


एक वर्ष बाद बीमार पड़ने के कारण अमिताभ एनुअल प्ले में भाग नहीं ले पाए। उदासी देख पिता ने कहा –

“मन का हो तो अच्छा, न हो तो और भी अच्छा।”

अमिताभ ने पूछा – “न हो तो अच्छा कैसे?”

हरिवंशराय मुस्कराए – “क्योंकि तब वो ईश्वर का मन होता है, और ईश्वर हमेशा तुम्हारा भला चाहता है।”


यह वही विचार था जिसने अमिताभ को हर असफलता के बाद संभाला। यह वाक्य उनके जीवन का मंत्र बन गया।


युवावस्था – पिता का पत्र जिसने सोच बदल दी


साल 1958। दिल्ली के किरोड़ी मल कॉलेज में पढ़ाई के दौरान अमिताभ को नौकरी नहीं मिल रही थी। एक दिन दोस्तों के बीच बैठे बोले — “हमारे माता-पिता ने हमें पैदा ही क्यों किया?”

घर लौटकर उन्होंने पिता से गुस्से में यही सवाल कह दिया। अगले दिन हरिवंशराय ने उनके सिरहाने एक चिट्ठी छोड़ी —


“मेरे बेटे ने पूछा कि हमें क्यों पैदा किया?

मेरे पास इसका कोई जवाब नहीं, सिवाय इसके कि मेरे बाप ने मुझसे पूछे बिना मुझे पैदा किया,

और उनके बाप ने उनसे पूछे बिना उन्हें।

जिंदगी की कशमकश पहले भी थी, आज भी है, कल भी होगी।

तुम नई राह बनाना — अपने बेटों से पूछकर उन्हें पैदा करना।”


यह चिट्ठी आज भी जीवन का दर्पण है, जो पिता-पुत्र के संवाद को अमर बनाती है।


कोलकाता के दिन – अधूरा प्यार और पहला संघर्ष


कॉलेज के बाद अमिताभ ने कोलकाता में नौकरी शुरू की। “शॉ वॉलेस एंड कंपनी” में क्लर्क के रूप में काम मिला, फिर ICI में 1500 रुपये वेतन। यहीं चंद्रा नाम की लड़की से उन्हें प्रेम हुआ, पर प्रस्ताव अस्वीकार हो गया। टूटा दिल लेकर उन्होंने नौकरी छोड़ दी और निकल पड़े — मुंबई, अपने सपनों की तलाश में।


मुंबई में संघर्ष – असफलताओं की लंबी कतार


रेडियो में आवाज़ बहुत भारी बताकर रिजेक्ट कर दिए गए। कई जगह निराशा मिली। उसी समय उनके भाई अजिताभ के माध्यम से खबर मिली कि डायरेक्टर ख्वाजा अहमद अब्बास नई फिल्म के लिए चेहरों की तलाश कर रहे हैं।

अब्बास साहब ने मुलाकात के बाद पूछा – “क्या अनुभव है?”

अमिताभ बोले – “लोगों ने मुझे कभी फिल्मों में लिया ही नहीं।”

अब्बास ने हँसकर कहा – “हमारी फिल्म में हीरोइन नहीं है, इसलिए ऊँचाई की दिक्कत नहीं।”

और इस तरह 15 फरवरी 1969 को फिल्म ‘सात हिंदुस्तानी’ के लिए अमिताभ साइन किए गए।


फेल्ड न्यूकमर से ‘जंजीर’ तक – संघर्ष का विस्फोट


पहली फिल्म चली नहीं। ‘रेशमा और शेरा’, ‘प्यार की कहानी’, सब फ्लॉप। लोग कहने लगे — “यह लंबा लड़का कभी हीरो नहीं बन सकता।” 30 की उम्र में हार मानने की कगार पर थे। तभी प्रकाश मेहरा ने ‘जंजीर’ शुरू की। जब किसी ने भी फिल्म करने से इनकार किया, तो प्राण ने अमिताभ का नाम सुझाया — “ये लड़का कल का सितारा बनेगा।”


जया भादुरी ने फिल्म में काम करने का फैसला लिया। फिल्म बनी, और 11 मई 1973 को रिलीज हुई। पहले शो में भीड़ कम थी, पर चार दिन बाद मुंबई के थिएटरों के बाहर टिकटों की लूट मच गई। अमिताभ बुखार में थे, पर उनके नाम की तपिश ने सिनेमा को जला दिया। उसी क्षण भारत को मिला उसका एंग्री यंग मैन।


दीवार से आकाश तक – पिता की कविता बनी जीवन दर्शन


‘दीवार’, ‘शोले’, ‘त्रिशूल’, ‘काला पत्थर’ – हर फिल्म के पीछे एक आदमी खड़ा था जिसने पिता की कविताओं में खुद को ढूंढा। हर असफलता पर वो हरिवंशराय की पंक्तियाँ दोहराते —


“जो बीत गई सो बात गई...”

यानी अतीत को पीछे छोड़, वर्तमान को गले लगाओ।


समापन – एक पिता की सीख, एक पुत्र की विरासत


अमिताभ बच्चन की कहानी केवल एक अभिनेता की नहीं, बल्कि एक विचार की है — कि हर संघर्ष में सीख छिपी होती है। हर असफलता में पिता की आवाज़ गूंजती है, “मन का हो तो अच्छा, न हो तो और भी अच्छा।”


आज 83 वर्ष की आयु में भी अमिताभ बच्चन उसी अनुशासन, उस विनम्रता और उसी ऊर्जा के प्रतीक हैं, जो उनके पिता की कविताओं से निकली थी।

हरिवंशराय बच्चन ने कहा था —

“नीड़ का निर्माण फिर से” —

और सचमुच, अमिताभ ने अपने कर्मों से उस नीड़ को नया आकार दिया।

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