गूफी पेंटल
गूफी पेंटल का नाम सुनते ही ज़हन में ‘महाभारत’ के चालाक और करिश्माई शकुनी मामा की छवि ताज़ा हो जाती है। 4 अक्टूबर 1944 को पंजाब के तर्न तरन में जन्मे सरबजीत सिंह पेंटल, जिन्हें दुनिया गूफी पेंटल के नाम से जानती है, सिर्फ़ एक कलाकार नहीं बल्कि एक बहुआयामी व्यक्तित्व थे। उनका सफर आर्मी के जवान से लेकर टीवी और फिल्मों के सबसे यादगार खलनायक तक पहुँचना किसी प्रेरणादायक कहानी से कम नहीं है।
आर्मी के मैदान से अभिनय की दुनिया तक
कम ही लोग जानते हैं कि गूफी पेंटल ने अपनी ज़िंदगी की शुरुआत आर्मी से की थी। इंजीनियरिंग की पढ़ाई के दौरान जब 1962 के भारत-चीन युद्ध का माहौल बना, तब उन्होंने आर्मी में भर्ती होकर चीन बॉर्डर पर आर्टिलरी डिवीजन में पोस्टिंग पाई। बॉर्डर की सर्द हवाओं और तनावपूर्ण माहौल के बीच भी उनका मन अभिनय में रमता रहा। टीवी या रेडियो की कमी के कारण जवानों का मनोरंजन करने के लिए रामलीला होती थी और वहां गूफी सीता का किरदार निभाते थे। यह वही मंच था जिसने उनके अभिनय को निखारा और अभिनय की दुनिया में उनके कदमों की आहट सुनाई देने लगी।
बॉलीवुड में पहला कदम
फिल्मों में उनका सफर साल 1975 की फिल्म रफू चक्कर से शुरू हुआ। इसके बाद दिल्लगी, देस-परदेस, सम्राट, सुहाग और दावा जैसी फिल्मों में उन्होंने अलग-अलग भूमिकाओं से पहचान बनाई। 1994 में आई फिल्म सुहाग में अक्षय कुमार के मामा के किरदार में उन्होंने अपनी खास कॉमिक-नकारात्मक छवि पेश की।
टीवी पर अमर हो गया शकुनी मामा
1988 में जब बीआर चोपड़ा का महाभारत दूरदर्शन पर आया तो गूफी पेंटल का शकुनी मामा भारतीय टेलीविजन के इतिहास में स्थायी रूप से दर्ज हो गया। चालाक, चतुर और राजनीति में माहिर शकुनी की मुस्कुराहट और पासों का खेल दर्शकों को हमेशा याद रहेगा। इस सीरियल के लिए वह कास्टिंग डायरेक्टर भी थे, लेकिन किस्मत ने उन्हें ऐसा रोल दिया जिसने उनकी पहचान को अमर बना दिया।
माइथोलॉजिकल शोज़ से गहरा रिश्ता
गूफी का करियर सिर्फ महाभारत तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने ओम नमः शिवाय, कर्मफलदाता शनि, कर्ण संगिनी, राधा कृष्णा और जय कन्हैया लाल की जैसे धारावाहिकों में अहम भूमिकाएं निभाईं। 2011 में द्वारकेश भगवान श्रीकृष्ण में फिर से शकुनी का रूप धारण कर उन्होंने दिखाया कि यह किरदार उनके व्यक्तित्व का हिस्सा बन चुका था।
पर्दे के पीछे का निर्देशक और शिक्षक
अभिनेता होने के साथ-साथ गूफी ने निर्देशन की दुनिया में भी कदम रखा। उन्होंने फिल्म श्री चैतन्य महाप्रभु का निर्देशन किया। इसके अलावा वह अपने महाभारत सह-अभिनेता पंकज धीर की एक्टिंग अकादमी के हेड भी रहे। नई पीढ़ी के कलाकारों को अभिनय की बारीकियां सिखाना उन्हें उतना ही प्रिय था जितना खुद अभिनय करना।
रतन टाटा से अनोखी दोस्ती
गूफी पेंटल की ज़िंदगी का एक अनछुआ पहलू उनकी दोस्ती थी उद्योगपति रतन टाटा से। इंजीनियरिंग पढ़ाई के दौरान जमशेदपुर में वह एक ही हॉस्टल में रहते थे। गूफी ने कई बार किस्से सुनाए कि कैसे रतन टाटा उन्हें अपनी कार में पिकनिक पर ले जाते थे, अपनी सिल्वर प्लेमथ कन्वर्टिबल की चाबी देकर उनकी मां को शहर घुमाने भेजते थे। रतन टाटा की सादगी और देशप्रेम की उन्होंने हमेशा सराहना की। उन्होंने गर्व से कहा था कि जब टाटा समूह ने पाकिस्तान से डील करने से मना किया, तब उन्हें अपने मित्र पर और भी अधिक गर्व हुआ।
आखिरी पड़ाव
गूफी पेंटल का जीवन संघर्ष, मेहनत और सफलता से भरा रहा। 5 जून 2023 को उन्होंने 78 वर्ष की उम्र में इस दुनिया को अलविदा कहा। लंबे समय से बीमार चल रहे गूफी का निधन मुंबई के अस्पताल में हुआ। लेकिन उनकी मुस्कुराहट, शकुनी के संवाद और उनका अद्वितीय व्यक्तित्व हमेशा दर्शकों के दिलों में ज़िंदा रहेगा।
गूफी पेंटल की विरासत
आज जब हम गूफी पेंटल को याद करते हैं तो यह सिर्फ़ एक कलाकार की जन्मतिथि का स्मरण नहीं बल्कि उस इंसान का जश्न है जिसने सेना की वर्दी से लेकर टेलीविजन के स्क्रीन तक हर जगह अपनी छाप छोड़ी। वह सिर्फ़ शकुनी नहीं थे, बल्कि दोस्त, गुरु और प्रेरणा स्रोत भी थे।
Old is Gold Films से साभार
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