बिना इंटरवल की फिल्म इत्तफाक

 बाइस्कोप विद पंकज शुक्ल' की आज की कड़ी में मैं बात करने वाला हूं आज ही के दिन साल 1969 में रिलीज़ हुई राजेश खन्ना की फ़िल्म ‘इत्तफ़ाक’ की। ये हिंदी सिनेमा की पहली बिना इंटरवल वाली फ़िल्म मानी जाती हैं। और, ये मशहूर निर्माता निर्देशक यश चोपड़ा और अपने ज़माने के सुपरस्टार राजेश खन्ना की दोस्ती का एक ऐसा प्रमाण भी है, जिससे इन दिनों के फ़िल्मकारों व कलाकारों को सबक़ लेना चाहिए।

कभी आपने ऐसी कोई फ़िल्म देखी है जो शुरू हो तो अगले ढाई पौने तीन मिनट तक परदे पर बस अलग अलग तरह की आकृतियां ही दिखती रहें या फिर उनके कोलाज के एक दूसरे में गड्डमगड्ड होते दिखते रहे। परदे के पीछे से तेज संगीत बजता रहे और यूं लगे कि कोई आपको परदे की तरफ ध्यान केंद्रित किए रखने के लिए कह रहा है। सिनेमा में हिप्नोटिज्म के मनोविज्ञान का प्रयोग करने वाले ये पहले भारतीय निर्देशक रहे हैं, यश चोपड़ा।
क्या आपको पता है उस हिंदी फ़िल्म के बारे में जिसमें पहली बार कोई इंटरवल ही नहीं था। ये फ़िल्म थी यश चोपड़ा की अपने भाई बलदेव राज चोपड़ा यानी बी आर चोपड़ा की कंपनी बी आर फिल्म्स के लिए बनाई गई आखिरी फ़िल्म ‘इत्तफ़ाक’, इसी फ़िल्म के बाद यश चोपड़ा ने अपनी खुद की कंपनी यशराज फिल्म्स की नींव डाली। इत्तफ़ाक’ के ही हीरो राजेश खन्ना के साथ यश चोपड़ा ने अपनी कंपनी की पहली फ़िल्म ‘दाग़’ बनाई थी। फ़िल्म ‘दाग’ कैसे बनी, यश चोपड़ा प्रोड्यूसर कैसे बने, ये पूरी कहानी आप इस फ़िल्म के बाइस्कोप पढ़ ही चुके होंगे। आज बारी है फ़िल्म ‘इत्तफ़ाक’ की, यही हमारे आज के बाइस्कोप की फ़िल्म है। इस फ़िल्म को बी आर चोपड़ा के पोते और रवि चोपड़ा के बेटे अभय दोबारा भी बना चुके हैं।
फ़िल्म ‘इत्तफ़ाक’ की रीमेक बनाने वाले अभय चोपड़ा के पिता रवि चोपड़ा फ़िल्म ‘इत्तफ़ाक’ में अपने चाचा यश चोपड़ा के सहायक थे। वैसे इस फ़िल्म में सहायक निर्देशकों की लंबी फेहरिस्त है, जिसमें रवि चोपड़ा के अलावा आर के सिब्बल, महेन वकील, वासुदेव धीर, अरविंद जोशी और रमेश तलवार के नाम शामिल हैं। यशराज फिल्म्स स्टूडियो जब खुला तो उसके पहले कर्मचारी थे महेन वकील। इस लिस्ट में एक नाम मशहूर लेखक सागर सरहदी के भतीजे का भी है। सागर सरहदी दोनों चोपड़ा भाइयों के काफी करीबी रहे। एबटाबाद, पाकिस्तान में जन्मे सागर सरहदी का असली नाम गंगा सागर तलवार है। यश चोपड़ा के लिए इन्होंने ‘कभी कभी’, ‘नूरी’, ‘चांदनी’, ‘सिलसिला’ और ‘फासले’ जैसी फ़िल्मों में लेखन का काम किया।
रमेश तलवार इन्हीं सागर सरहदी के भतीजे हैं। रमेश तलवार ने यश चोपड़ा की बतौर निर्देशक पहली फ़िल्म ‘धूल का फूल’ में भी बतौर बाल कलाकार काम किया। रमेश तलवार की फ़िल्म ‘इत्तफ़ाक’ में बतौर सहायक निर्देशक एंट्री आखिरी मौके पर चोपड़ा कैंप के चर्चित अभिनेता मनमोहन कृष्ण के कहने पर हुई। रमेश तलवार ने एक इंटरव्यू में खुद माना कि फ़िल्म ‘इत्तफ़ाक’ में ज्यादा कुछ खास काम उनके हिस्से नहीं आया। लेकिन, इस दौरान यश चोपड़ा को रमेश तलवार के नाम का एक भरोसेमंद साथी मिला जिसने उनकी तमाम मुश्किलें आगे चलकर हल कीं।
यश चोपड़ा हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री के उन गिने चुने निर्देशकों में से हैं जिन्होंने न सिर्फ अपने सहायकों को पूर्णकालिक निर्देशक बनने के लिए प्रेरित किया, बल्कि उन्हें हर तरह की सहायता दी और उनकी फ़िल्में प्रोड्यूस भी कीं। फ़िल्म ‘इत्तफ़ाक’ संयोग से बनी एक फ़िल्म है। फ़िल्म में कोई इंटरवल नहीं है। फ़िल्म की कुल अवधि ही एक घंटा 41 मिनट है। ये उन दिनों की बात है जब यश चोपड़ा बी आर फ़िल्म के लिए ‘आदमी और इंसान’ बना रहे थे। फ़िल्म में धर्मेंद्र, फिरोज खान, सायरा बानो और मुमताज जैसे बड़े कलाकार थे। फ़िल्म की पूरी यूनिट बी आर फिल्म्स के अपने नियमित कर्मचारियों की थी और इसकी शूटिंग बहुत बड़े पैमाने पर चल रही थी कि अचानक सायरा बानो की तबीयत खराब हो गई।
अभिनेताओं को तो खैर किसी तरह राजी किया गया तारीखें बदलने के लिए लेकिन तकनीशियन तो खाली बैठ गए। इस पर चोपड़ा बंधुओं को एक फ़िल्म तुरत फुरत बनाने का आइडिया सूझा जिसे सिनेमा की भाषा में ‘क्विकी’ कहते हैं। फ़िल्म के लिए कहानी की तलाश चल ही रही थी कि थिएटर देखने के शौकीन यश चोपड़ा ने एक दिन एक गुजराती नाटक देख लिया, ‘धुम्मस’। नाटक यश चोपड़ा को बहुत अच्छा लगा। वह बीआर फिल्म्स के पूरे स्टोरी डिपार्टमेंट को लेकर अगले दिन ये नाटक देखने फिर पहुंच गए।
सबको कहानी पसंद आई। पता ये भी चला कि ये नाटक एक अंग्रेजी फ़िल्म ‘साइनपोस्ट टू मर्डर’ पर आधारित है। यश चोपड़ा तब तक इस नाटक पर फ़िल्म बनाने का मन बना चुके थे। पूरे स्टोरी डिपार्टमेंट ने बैठकर हफ्ते भर में फ़िल्म की पटकथा लिख डाली। अख्तर उल इमान को स्क्रिप्ट मिली तो उन्होंने फटाफट इसके डॉयलॉग लिख डाले और यश चोपड़ा ने ये पूरी फ़िल्म सिर्फ 28 दिन में शूट कर डाली।
लेकिन, फ़िल्म ‘इत्तफ़ाक’ की मेकिंग इतनी आसान भी नहीं रही, जितनी लिखने या पढ़ने में लगती है। कहानी के नायक दिलीप रॉय का रोल राजेश खन्ना तक पहुंचने से पहले तमाम दूसरे कलाकारों के आगे से होकर गुजरा। फ़िल्म की पटकथा जैसे ही बनकर तैयार हुई, यश चोपड़ा इसे लेकर सबसे पहले राजकुमार के पास गए। राजकुमार के साथ बी आर चोपड़ा ने सुपर हिट फ़िल्में ‘वक़्त’ और ‘हमरा़ज़’ बनाई थी। गाने ‘कानून’ में भी नहीं थे और गाने फ़िल्म ‘इत्तफ़ाक’ में भी नहीं है।
हीरोइन के लिए ‘कानून’ में काम कर चुकीं नंदा ही यश चोपड़ा के जेहन में थीं। उन्हें एक ऐसी अभिनेत्री चाहिए थी जिस पर आखिर तक किसी दर्शक का शक़ ही न जाए। लेकिन, हीरो को लेकर लोचा हो गया जब राजकुमार ने ये किरदार करने से मना कर दिया। संजय ख़ान से भी बात हुई। उनको कहानी पसंद भी आई। लेकिन बताते हैं जितना पैसा संजय ख़ान ने इस फ़िल्म के लिए मांगा, वह फ़िल्म के बजट के हिसाब से ज्यादा था। फिर यश चोपड़ा का ध्यान गया एक नए कलाकार पर, नाम - शत्रुघ्न सिन्हा।
शत्रुघ्न ने इस फ़िल्म में इंस्पेक्टर दीवान वाले किरदार के लिए ऑडीशन दिया था। यश चोपड़ा को ये ऑडीशन देखकर लगा कि ये लड़का कहानी के नायक के रूप में अच्छा काम कर सकता है। लेकिन, इसी बीच ये कहानी राजेश खन्ना के पास पहुंच गई। राजेश खन्ना की तब तक दो तीन फ़िल्में रिलीज हो चुकी थीं और चार पांच फ़िल्में फ्लोर पर थीं। राजेश खन्ना को सब रोमांटिक हीरो वाले रोल ही दे रहे थे ऐसे में जब उन्हें ये मानसिक रूप से व्यथित कलाकार का किरदार मिला तो उन्होंने इसे तुरंत लपक लिया।
यश चोपड़ा की तो जैसे मुंहमागी मुराद पूरी हो गई। राजेश खन्ना ने ये भी वादा कर दिया कि वह इस बारे में पैसे की बात नहीं करेंगे और जो भी फ़िल्म का बजट होगा उसके हिसाब से ही पैसे ले लेंगे। फ़िल्म ‘इत्तफ़ाक’ 1969 में ‘बंधन’ और ‘आराधना’ के बाद रिलीज हुई और राजेश खन्ना की हिट फ़िल्मों की पहली हैट्रिक की तीसरी फ़िल्म बनी। फ़िल्म ‘इत्तफ़ाक’ के बाद रिलीज हुई ‘दो रास्ते’ भी सुपरहिट रही, उस फ़िल्म में राजेश खन्ना कुछ दृश्यों में दाढ़ी बढ़ाए दिखे हैं, वह फ़िल्म ‘इत्तफ़ाक’ के किरदार के चलते हैं। इसके बाद तो राजेश खन्ना ने एक दर्जन और सुपरहिट फ़िल्में साल 1971 तक एक के बाद एक दे डालीं।
फ़िल्म ‘इत्तफ़ाक’ की अधिकतर कहानी पूरी एक रात में घटती है। शहर के प्रसिद्ध चित्रकार दिलीप को पुलिस अपनी ही पत्नी की हत्या करने के आऱोप में गिरफ्तार कर लेती है। पुलिस को लगता है कि दिलीप की मानसिक स्थिति ठीक नहीं है। तो उसे इलाज के लिए भेज दिया जाता है। वहां से भाग निकला दिलीप एक ऐसे घर में छुप जाता है, जहां एक विवाहिता अकेले है। दोनों के बीच चूहे बिल्ली का खेल चलता है। और, इस बीच इस घर में एक और लाश सामने आती है। घर की मालकिन का घर में घुसे कथित हत्यारे के प्रति भाव बदलता है और खेल दूसरे पाले में खेला जाने लगता है। यह सब प्रेम प्रकटन इसलिए था क्योंकि घर की मालकिन ने पुलिस को चुपके से फोन कर दिया है।
पुलिस आती है तो लाश भी मिलती है और इस चित्रकार पर दूसरी हत्या का आरोप भी आ जाता है। ये पेंच कैसे सुलझता है, कैसे असली हत्यारा सामने आता है और कैसे आखिर तक ये फ़िल्म दर्शकों को बांधे रखती है, ये देखने वाली बात है। फ़िल्म में अगर कुछ खटकने वाली बात है तो वो ये कि किसी की मानसिक हालत की तमाम वजहें अब समझी जाती हैं, किसी को पागल कह देना अब इतना आसान नहीं रहा। मानसिक बीमारी का भी अब इलाज होता है और ऐसे लोगों के साथ इस फ़िल्म जैसा व्यहार भी अब नहीं होता। लेकिन, ध्यान यहां ये भी रखना है कि ये फ़िल्म पचास साल से पहले बनी है और तब के लेखक वही लिखा करते होंगे, जो उस वक्त का चिकित्सा शास्त्र उन्हें समझाता होगा।
फ़िल्म ‘इत्तफ़ाक’ पूरी तरह पटकथा पर टिकी फ़िल्म है। फ़िल्म का अधिकतर हिस्सा जिस घर में शूट किया गया है, उसे बनाया भी किसी नाटक के मंच की तरह ही है। सेट के हिस्से अलग अलग हो जाते होंगे तभी यश चोपड़ा के सबसे भरोसेमंद सिनेमैटोग्राफर के जी इतने प्रयोगात्मक फ्रेम इस फ़िल्म में बना पाए। फ़िल्म का कला निर्देशन और सिनेमैटोग्राफी अव्वल नंबर है और उतना ही अव्वल नंबर है यश चोपड़ा का निर्दशन। फ़िल्म में प्रकाश और छाया के मिलन के यश चोपड़ा ने कुछ अद्भुत प्रयोग इस फ़िल्म में किए हैं। छाया से दीवार पर उभारी गई अदालत की प्रतिकृति यश चोपड़ा के निर्देशकीय कौशल की शुरूआती बानगी है।
फ़िल्म की नायिका बनीं नंदा का नाम फ़िल्म का कास्टिंग में राजेश खन्ना से पहले आता है और अभिनय भी उनका यहां अव्वल नंबर है। यश चोपड़ा शुरू से नंदा को लेकर मुतमईन तो थे लेकिन एक दो बार उन्होंने राखी का नाम भी इस रोल के लिए चलाया था, लेकिन राजश्री पिक्चर्स के करार में बंधी होने के चलते तब वह राखी से बात आगे बढ़ा नहीं पाए थे। नंदा ने यहां बिमल रॉय की फ़िल्मों की नायिकाओं सरीखी अभिनय की एक लंबी लकीर खींची है। यश चोपड़ा अपनी फ़िल्मों के महिला किरदारों के लिए अपनी पूरी सिनेयात्रा में जो आकृतियां गढ़ते रहे, उसकी शुरूआती लकीरें नंदा ने इसी फ़िल्म में खींची हैं।
फ़िल्म ‘इत्तफ़ाक’ हिंदी सिनेमा की चौथी ऐसी फ़िल्म है जिसमें कोई गाना नहीं है। इससे पहले ‘नौजवान’, ‘मुन्ना’ और ‘कानून’ में गाने नहीं थी। ‘कानून’ भी चोपड़ा बंधुओं की ही बनाई फ़िल्म है। दोनों फ़िल्मों में कोई गाना नहीं है, लेकिन फ़िल्म के संगीतकार हैं मशहूर सलिल चौधरी। उन्होंने फ़िल्म में जो बैकग्राउंड म्यूजिक बनाया, उसने दोनों फ़िल्मों की नाटकीयता को बहुत मजबूत संबल प्रदान किया है। फ़िल्म ‘इत्तफ़ाक’ के बाद यश चोपड़ा को भी समझ आने लगा कि लोग अब उनके नाम पर और उनके काम पर भरोसा करते हैं और पैसे न भी हो तो भी वह अब अपने नाम और काम से फ़िल्में बना सकते हैं। इसी के बाद उन्होंने अपने बड़े भाई की नौकर छोड़ अपनी अलग कंपनी बनाने का फैसला किया। यश राज फिल्म्स की स्थापना कराने में राजेश खन्ना का सबसे बड़ा योगदान रहा है।
यश राज फिल्म्स ने तब एक साथ तीन फ़िल्में बनाने का फैसला किया था, इनमें से बतौर निर्देशक एक यश चोपड़ा को बनानी थी, एक उस दौर के सबसे प्रसिद्ध वीडियो संपादक प्राण मेहरा को बनानी थी और तीसरी बतौर निर्देशक बनानी थी अभिनेता मनमोहन कृष्ण को। प्राण मेहरा ने अपनी फ़िल्म के लिए अमिताभ बच्चन को लिया था। ये फ़िल्म कभी बन नहीं पाई। मनमोहन कृष्ण के पास तब कोई विषय ही नहीं था, बहुत बाद में यश चोपड़ा ने उनके लिए 1979 में ‘नूरी’ का निर्माण किया।
(यह लेख बौद्क संपदा अधिकारों के तहत संरक्षित है। लेखक: पंकज शुक्ल)
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पंकज शुक्ला की वाल से

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