देवानन्द का सवाल
"मिलिट्री की वर्दी पहने खड़ा वो आदमी कौन है? उसने अटल जी को सैल्यूट नहीं किया।" देव साहब ने धीरे से अपने एक दोस्त के कान में फुसफुसाया। ये किस्सा कुछ यूं है कि साल 1999 में जब पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने पाकिस्तान के साथ शांति स्थापित करने का एक बड़ा प्रयास करते हुए दिल्ली से लाहौर बस सेवा शुरू की थी तब उस बस में दिल्ली से पाकिस्तान जाने वाले भारतीय डेलिगेशन में देव साहब भी थे।
खुद वाजपेयी जी ने देव साहब को लाहौर साथ चलने का न्यौता दिया था। देव साहब वैसे भी एक तरह से लाहौरी ही थे। उनकी पढ़ाई-लिखाई लाहौर से हुई थी। लाहौर के गवर्नमेंट कॉलेज से उन्होंने इंग्लिश लिटरेचर में ग्रेजुएशन किया था। दिल्ली से लाहौर जाने तक देव साहब ने बस में सभी को लाहौर के अपने दिनों के कई किस्से सुनाए। और सबका मनोरंजन किया।
बस जब अटारी-वाघा बॉर्डर पहुंची तो वहां तत्कालीन पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ वाजपेयी जी के गले मिले। उसके बाद उन्होंने देव साहब से साथ में एक फोटो खिंचाने की गुज़ारिश की जिसे देव साहब ने बहुत सम्मान के साथ स्वीकार किया। लाहौर में जब अटल जी का सम्मान किया जा रहा था तब देव साहब ने कुछ नोटिस किया। उन्होंने अपने दोस्त से धीरे से पूछा,"मिलिट्री की वर्दी पहने वो आदमी कौन है? उसने अटल जी को सैल्यूट नहीं किया।"
कुछ दिनों बाद खुलासा हुआ था कि वो परवेज़ मुशर्रफ थे जिन्होंने अटल जी को सैल्यूट करने से इन्कार कर दिया था। बाद में नवाज़ शरीफ का तख्तापलट करने के बाद 2001 में जब परवेज़ मुशर्रफ पाकिस्तानी शासक की हैसियत से भारत आए थे तो हमारे तत्कालीन एयर चीफ मार्शल ए.वाय.टिपनिस ने भी मुशर्रफ को सैल्यूट करने से इन्कार कर दिया था।
खैर, उस लाहौर यात्रा के दौरान देव साहब को अपने कॉलेज जाने का मौका भी मिला था। जब देव साहब गवर्नमेंट कॉलेज लाहौर पहुंचे तो पुरानी यादों की वजह से उनकी आंखें नम हो गई थी। कॉलेज में उनका भव्य स्वागत किया गया था। देव साहब ने वहां के छात्रों व अध्यापकों संग अपने किस्से साझा किए।
उस स्वागत से बेहद भावुक हुए देव साहब ने अपने दोस्त, जो कि उनके साथ लाहौर गए थे, उनसे कहा,"हम सब एक ही हैं। लेकिन पाकिस्तान की आर्मी पाकिस्तान के लोगों को हमारा दोस्त नहीं बनने देना चाहती। इन लोगों को अपने वर्दीधारियों से होशियार रहना चाहिए।" देव साहब का इशारा तब परवेज़ मुशर्रफ की तरफ ही था।
साथियों ये एक रीपोस्ट स्टोरी है। कुछ दिनों पहले भी ये स्टोरी पोस्ट की थी हमने। मगर इसके साथ भी वही हुआ जो अधिकतर स्पेशल स्टोरीज़ के साथ होता है। ये भी अधिक लोगों तक नहीं पहुंच सकी। आज देव साहब के जन्मदिन के मौके पर फिर से इसे शेयर किया है। शायद अबकी बार अधिक लोग इस स्टोरी को पढ़ सकें और इस पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकें। देव साहब को किस्सा टीवी का नमन।
किस्साटीवी से साभार
साल 1965 की बात है। मशहूर अभिनेता देव आनंद ‘गाइड’ बना रहे थे। फिल्म के संगीत का जिम्मा एसडी बर्मन पर था। अचानक एक बड़ा हादसा हुआ। बर्मन दादा को हार्ट अटैक हुआ। उन्हें इलाज और आराम दोनों की जरूरत थी। ऐसे मुश्किल वक्त में देव आनंद ने एक बड़ा फैसला लिया। उन्होंने फिल्म की शूटिंग छह महीने के लिए टाल दी।
देव आनंद ने कहा कि इस फिल्म का संगीत तो बर्मन दादा ही तैयार करेंगे, उसके लिए चाहे उन्हें छह महीने इंतजार क्यों न करना पड़े। इस बीच कुछ और बड़े निर्देशकों ने एसडी बर्मन को दिया हुआ काम वापस लेकर किसी और संगीतकार से कराया, लेकिन देव आनंद अपने फैसले पर अड़े रहे।
खैर, बर्मन दादा स्वस्थ होकर लौटे और फिल्म के संगीत को तैयार करने का काम फिर शुरू किया। न जाने ये संयोग था या बर्मन दादा को अपनी तबीयत के खराब होने की वजह से हुई देरी का अफसोस, लेकिन कहते हैं कि एसडी बर्मन ने सिर्फ पांच दिन में फिल्म ‘गाइड’ के सभी गानों को तैयार कर दिया। देव आनंद को तो उन पर भरोसा था ही, उन्होंने सभी गानों को तुरंत ‘अप्रूव’ कर दिया।
मुसीबत ये थी कि देव आनंद को एक गाना पसंद नहीं आया, लेकिन फिल्म आने के बाद राग मिश्र भैरवी में तैयार किया गया वही गाना फिल्म ‘गाइड’ का सबसे हिट गाना साबित हुआ। जो आज भी हिंदी फिल्मी संगीत में एक अमर गाना है। इस गाने के बोल थे-आज फिर जीने की तमन्ना है।
इस गाने की शूटिंग उदयपुर में हुई थी। देव आनंद इस गाने को मुंबई में रिकॉर्ड करवाकर आ तो गए, लेकिन उन्हें ये गाना पसंद नहीं आ रहा था। उन्होंने अपने साथियों से इस बात की चर्चा भी की। देव आनंद इस गाने को लेकर बर्मन दादा के काम से खुश नहीं थे। हालांकि, जब गाना यूनिट के बाकी लोगों ने सुना तो सभी ने खुलकर तारीफ की लेकिन देव आनंद अड़े रहे।
बाद में फिल्म के डायरेक्टर विजय आनंद ने ये कहकर बात टाली कि फिलहाल इस गाने को शूट कर लेते हैं। अगर बाद में फिल्म में अच्छा नहीं लगा तो कोई दूसरा गाना रिकॉर्ड कर लेंगे। अगले जितने भी दिन इस गाने की शूटिंग हुई, देव आनंद ने एक बात नोटिस की। सेट से लेकर होटल तक आते-जाते यूनिट का हर सदस्य यही गाना गुनगुना रहा होता था।
देव आनंद ने सैकड़ों बार लोगों को यही गुनगुनाते हुए सुना। आखिर में वो भी मान गए कि ये गाना फिल्म में इस्तेमाल किया जाएगा। देव आनंद ने बाद में माना कि इस गाने को जैसे का तैसा ही फिल्म में इस्तेमाल किया जाएगा। कहरवा ताल पर तैयार किए गए इस गीत को शैलेंद्र ने लिखा था, जो बाद में कितना लोकप्रिय हुआ वो हम सभी जानते हैं। गाने के बोल भी कमाल के थे।
इस गाने की एक और खासियत थी कि इसे एसडी बर्मन ने एक ही धुन पर तैयार किया था। आमतौर पर फिल्मी संगीत में सबसे ज्यादा मेहनत मुखड़े की लाइनों पर की जाती है। एक बार अच्छा मुखड़ा बन गया तो अंतरे पर काम होता है। अंतरा अलग तरीके से उठाया जाता है और अंतरे की आखिरी लाइन घूमकर मुखड़े की धुन से आ मिलती है। लेकिन इस गाने को आप गुनगुना कर देखिए। जिस धुन में मुखड़ा है यानी ‘कांटों से खींच के ये आंचल’ उसी धुन को अंतरों में भी रिपीट किया गया है, चाहे वो ‘अपने ही बस में नहीं मैं’ हो या फिर ‘मैं हूं गुबार या तूफां हूं।
ये एक अनोखा प्रयोग एसडी बर्मन ने इस गाने में किया था, जहां पूरा का पूरा गाना यानी मुखड़ा और अंतरा सब एक ही धुन में तैयार किया गया था। राग अलग है, लेकिन यही प्रयोग एसडी बर्मन ने एक और गाने में भी किया था, जहां मुखड़े और अंतरे की धुन एक थी-फूलों के रंग से, दिल की कलम से।
गोलडन एरा सोंग से साभार

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