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फिराक गोरखपुरी

 दूर कहीं सितारों में आज भी शाम होते ही फ़िराक़ साहब, रमेशचंद द्विवेदी के साथ कॉफ़ी पीने निकल जाते होंगे। उन के वो सारे दोस्त जो यहां 50-60 के दशक में साथ रहा करते थे, अब वहां किसी बेंच पर बैठे सवाल पूछ-पूछ कर उनसे घण्टों बातें किया करते होंगे। फ़िराक़ अपने रोबीले अंदाज़ में सिगरेट फूंकते हुए कहते होंगे, " गुज़ारिश है ज़रा सुनिए तो।" नेतराम के अगर पुराने रजिस्टर खोले जाएं तो ज़रूर फ़िराक़ साहब के घर गई कचौड़ियों के हिसाब मिल जाएंगे। उनका माली कहीं आज भी गुलाब खिला रहा होगा। उन के घर शायद अब भी वो अघोरी आता होगा जिसके पीर फ़िराक़ साहब के शे'र गुनगुनाया करते थे।  वो जादूगर ग़ज़ल में शब्दों की ऐसी तरतीब सेट करता मानो शब्द ज़मीन पर पैर पटकते हुए चल रहे हों।  वो नज़र-नज़र की फ़सूंगरी वो सुकूत की भी सुख़नवरी। तेरी आँख जादू-ए-सामरी तेरे लब फ़साना-ए-नल-दमन।। फ़िराक़ की ग़ज़लों में जदीदियत तो बला की थी ही इसके साथ-साथ क्लासिकल शायरी की नींव ज़बरदस्त मजबूती से ग़ज़ल की इमारत को थामे थी। यूँ ही नहीं नासिर काज़मी इन्तिज़ार हुसैन साहब को फ़िराक़ साहब के शे'र सुनाया करते थे। इनका मेरा एक पसंदीदा शे'र  - "...

लताजीओर_राजसिंह

 #प्रिंसेज_ऑफ_डूंगरपुर #लताजी_ओर_राजसिंह लता मंगेशकर नहीं रहीं...वे भारत में किवदंतियों की तरह रहीं...!! नेहरूजी ने बड़ी आत्मीयता से 'स्वर कोकिला' की उपाधि लता मंगेशकर को दी थी, लेकिन लताजी को जिस टाइटल की सबसे ज्यादा चाहत थी वो था  'प्रिंसेज ऑफ डूंगरपुर'....वही डूंगरपुर जो राजस्थान की एक रियासत थी.... प्रसिद्ध क्रिकेटर और भारतीय क्रिकेट टीम के मैनेजर, बीसीसीआई के अध्यक्ष रहे राज सिंह डूंगरपुर के साथ लताजी के खास रिश्तों की चर्चा सोशलाइट और संगीत की दुनिया में बड़े अदब के साथ की जाती है...!!! बीकानेर की राजकुमारी राज्यश्री, जो डूंगरपुर की बहन की बेटी हैं, अपनी आत्मकथा 'पैलेस ऑफ क्लाउड्स- ए मेमॉयर' (ब्लूम्सबरी इंडिया 2018) में लिखती हैं कि दोनों की मुलाकात क्रिकेट के लिए दीवाने लता के भाई हृदयनाथ मंगेशकर के जरिए हुई थी.... हृदयनाथ मंगेशकर और डूंगरपुर में दोस्ती थी, फिर इसी दोस्ती में लता की एंट्री हुई और उनकी मुलाकात राज सिंह डूंगरपुर से हुई. इस रिश्ते पर न सिर्फ डूंगरपुर के शाही घराने की नजर टेढ़ी थी बल्कि डूंगरपुर खानदान से जुड़े दूसरे राज परिवार भी इस रिश्ते क...

मौत एक ख्याल है जैसे ज़िंदगी एक ख्याल है" भारती गौड़ की वॉल से

 " हिंदी सिनेमा में मील का पत्थर साबित हुई फिल्म 'गाइड' मेरे शहर उदयपुर की दिलकश वादियों में रचाई गई थी। अरावली की गोद में बसा एक शहर जिसकी बाहों में मैं पली बढ़ी। राजस्थान का कश्मीर।  झीलों की नगरी, पानी, पत्थर पहाड़ों की पुरी, फाउंटेन व माउंटेन का शहर और ना जाने कितने नामों से नवाज़े गए  मेरे इस शहर में बनी ये फिल्म गाइड। खैर उदयपुर की बात फिर कभी। लेखक आर के नारायण के उपन्यास 'द गाइड' पर बनी फ़िल्म गाइड 1965 में विजय आनंद द्वारा निर्देशित, देव आनंद, वहीदा रहमान की नायाब अदाकारी और एस डी बर्मन के सुरमई संगीत की वजह से अप्सराओं की मानिंद हर दिन बस जवान और खूबसूरत ही हुई है। इस फिल्म की कोई शुरुआत नहीं कोई अंत नहीं। ये सदा बीच से ही मालूम जान पड़ेगी। इसकी कहानी पर बात करना तो यूँ ही होगा, क्योंकि मेरी समझ में इस फिल्म को ना देखने वालें गिनती के ही होंगे। ख़ासकर वो तो बिल्कुल ही नहीं जो फ़िल्मों से और वो भी ऐसी फ़िल्मों से अनछुए रहते हों। लिहाज़ा आगे का पढ़ना गाइड फ़िल्म नहीं देखने वालों के किसी काम का नहीं। साथ में बहने के लिए आपको साथ ही उतरना होता है।  "वहाँ कौन है ते...

वाचस्पति शर्मा जी की वॉल से

तुम्हे याद करते करते ------------------------ भारतीय सिनेमा के इतिहास में यदि किसी गीत को कामुकता का भाव समेटे हुए उत्कृष्टतम गीत कहा जाए, तो वह "आम्रपाली" फिल्म का यह अमर गीत ही होगा. यह गीत अपनी सोलो परफॉर्मेंस और अभिनेत्री वैजयंती माला जी की अनुपम अभिनय क्षमता के कारण विशिष्ट हो जाता है। उन्होंने अपने एकल प्रदर्शन से रुपहले परदे पर अनगिनत भावों की अनूठी छटा बिखेरी है। ये एक सामंती शोषण से ग्रसित समाज में नगरवधू का तमगा लिए एक बेजोड़ कलाकार और एक नर्तकी के मनोभावों को दर्शाता गीत है.जिसमे वो अपने नगरवधू के सामाजिक स्टेटस से बाहर निकल एक आम स्त्री की तरह अपनी मनोव्यथा को व्यक्त करने के लिए व्याकुल है। वो स्त्रैण इच्छाएं जिनमे प्रेम ,कामुकता और अपने प्रियतम के सानिध्य पाने की दबी छुपी लालसा है। गीत की शुरुआत वैजयंती माला जी के "विचित्र-वीणा" वाद्य यंत्र के तारों को छेड़ते अपनी कामनाओं को व्यक्त करने की झिझक भरी कोशिश से होता है। यह दृश्य मानो किसी स्त्री के अंतरंग क्षणों की झलक है, जिसमें वह अपने प्रेम को छिपाने का असफल प्रयास करती है। ये सीन कुछ ऐसा ही ही जिसमे...

उमराव जान किस्सा tv से साभार

मुज़फ्फर अली जब उमराव जान बनाने की प्लानिंग कर रहे थे तब उनके ज़ेहन में हीरोइन की छवि पहले से ही आ गई थी। उन्हें एक ऐसी हीरोइन चाहिए थी जिसमें अदा और नज़ाकत हो। मुज़फ्फर अली को एक ऐसी हीरोइन की तलाश थी जो किसी शायरा और एक तवायफ़, दोनों तरह के किरदारों में फिट लगे। एक दिन उन्होंने रेखा की तस्वीरें एक मैगज़ीन में देखी। उन्हें रेखा में वो दोनों खूबियां दिखी जो उन्हें अपनी फिल्म उमराव जान की हीरोइन के लिए चाहिए थी। किसी ने जब मुज़फ्फर अली से पूछा कि रेखा में उन्हें क्या खास लगा। उन्होंने जवाब दिया, उनकी आंखें। आज उमराव जान फिल्म के 44 साल पूरे हो गए। ये फिल्म रिलीज़ हुई थी 2 जनवरी 1981 के दिन। उमराव जान को डायरेक्ट व प्रोड्यूस किया था मुज़फ्फर अली ने। और इस फिल्म का संगीत दिया था खय्याम साहब ने। रेखा जी के साथ काम करना मुज़फ्फर अली के लिए कतई आसान नहीं था। कई दफ़ा ऐसा हुआ था जब रेखा अचानक ही सेट से गायब हो जाती थी। जबकी उनके अहम दृश्य शूट होने होते थे। कहा जाता है कि रेखा उस सुपरस्टार से मिलने चली जाती थी जिसके साथ उन दिनों उनका कथित अफ़ेयर चल रहा था। और कमाल देखिए। रेखा जी को उमराव जान क...

राजेश खन्ना

 ये कहानी तब की है जब राजेश खन्ना कोई फिल्मस्टार नहीं, कॉलेज स्टूडेंट हुआ करते थे। तब वो राजेश खन्ना भी नहीं, जतिन खन्ना थे। उनका एक कॉलेज फ्रेंड एक ड्रामा कंपनी से जुड़ा था, जिसका नाम था आईएनटी ड्रामा कंपनी। उस ड्रामा कंपनी के डायरेक्टर थे वी.के.शर्मा। मशहूर लेखक व डायरेक्टर सागर सरहदी भी तब उसी ग्रुप का हिस्सा थे। राजेश खन्ना साहब की बायोग्राफी लिखने वाले लेखक यासिर उस्मान को सागर सरहदी जी ने एक इंटरव्यू दिया था, जिसमें उन्होंने वी.के.शर्मा साहब के बारे में कहा था,"उस ड्रामा ग्रुप के सबसे महत्वपूर्ण शख्स हुआ करते थे वी.के.शर्मा। वो उत्तर प्रदेश से थे। कद तो उनका छोटा था। पर प्रतिभा के मामले में वो बहुत बड़े थे। वो नाटक लिखते थे। नाटकों का निर्देशन करते थे। और उनमें अभिनय भी करते थे। जतिन(राजेश खन्ना) उन्हें अपना गुरू मानते थे। हालांकि शुरुआत में ना तो वी.के.शर्मा, और ना ही अन्य लोग जतिन को गंभीरता से लेते थे।" सागर सरहदी जी के मुताबिक, जतिन हर शाम रिहर्सल में आते थे और एक कोने में खड़े होकर अन्य एक्टर्स को अपने-अपने किरदारों की प्रिपेरेशन करते देखते थे। तब शायद जतिन इसी उम्...

नोशाद साहब किस्सा tv से साभार

 बैजू बावरा के हर गीत को नौशाद साहब ने किसी ना किसी राग पर आधारित रखा था। हालांकि नौशाद जब बैजू बावरा का म्यूज़िक कंपोज़ कर रहे थे तब उनके सामने एक चुनौती भी थी। नौशाद चाहते थे कि बैजू बावरा के गीतों में भारतीय शास्त्रीय संगीत को प्रमुखता से जगह दी जाए। लेकिन नौशाद को ये भी पता था कि आम जनता, जिसे शास्त्रीय संगीत सुनने की आदत नहीं थी, वो एक हैवी क्लासिकल संगीत की डोज़ को शायद हजम ना कर पाए।  नौशाद की ख्वाहिश थी कि आम लोग भी शास्त्रीय संगीत को सुनने की आदत डालें। इसलिए उन्होंने एक योजना बनाई। उन्होंने गीतों का संगीत कुछ इस तरह से रचा कि शुरुआती गीत रागों पर आधारित भी रहें, और उनकी ट्यून इतनी हल्की-फुल्की हो कि लोगों को सुनने में मज़ा आए। जबकी आखिर में तानसेन व बैजू के बीच हुए संगीत के महा मुकाबले में उन्होंने विशुद्ध भारतीय शास्त्रीय संगीत रखा। "आज गावत मन मेरो झूमके।" राग देसी पर आधारित इस गीत को उस्ताद अमीर खान और पंडित डी.वी.पलुस्कर ने गाया था।  तानसेन की आवाज़ बने थे उस्ताद अमीर खान। और बैजू को आवाज़ दी थी पंडित डी.वी.पलुस्कर जी ने। नौशाद ने बहुत सोच-समझकर पंडित डी.वी....