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बदरुद्दीन से जॉनी वाकर होने का सफरW

 "इस शराबी को उठाकर बाहर फेंक दो।" गुरूदत्त जी ने नवकेतन फिल्म्स के स्टाफ से कहा। और वाकई में उस शराबी को बाहर कर दिया गया। हालांकि वो कई शराबी नहीं था। वो थे बदरुद्दीन जमालुद्दीन काज़ी। जो उस वक्त तक जॉनी वॉकर नहीं बने थे। क्या था वो किस्सा? चलिए, जानते हैं। ये तो हम सभी जानते हैं कि बलराज साहनी जी ने एक दिन बदरुद्दीन काज़ी को बस में देखा था। उन दिनों बदरुद्दीन बस कंडक्टर हुआ करते थे। और टिकट बनाते वक्त वो तरह-तरह की आवाज़ें निकालकर लोगों का मनोरंजन करते थे। उनका वही अंदाज़ बलराज साहनी जी को पसंद आ गया। एक दिन बलराज साहनी बदरुद्दीन को अपने साथ लेकर पहुंच गए नवकेतन फिल्म्स के ऑफिस। वहां उन्होंने गुरूदत्त की ओर इशारा करते हुए बदरुद्दीन से कहा,"देखो, वो फिल्म का डायरेक्टर है। उसका नाम गुरूदत्त है। अगर तुमने उसे पटा लिया तो तुम्हारा काम बन गया समझो।" बदरुद्दीन ने सोचा कि वो ऐसा क्या करें जिससे ये डायरेक्टर खुश हो जाए। वो फिल्मों में काम तो करना ही चाहते थे। चंद फिल्मों में वो क्राउड का हिस्सा बन भी चुके थे। लेकिन अब तो चांस था कि उन्हें फिल्म में कोई रोल मिल जाए। बदरुद...

मन्ना डे का साक्षात्कार

 ना तो कारवां की तलाश है" में कितनी बार आया था "इश्क़" और क्यों थे रफी साहेब श्रेष्ठतम गायक जानिए मन्ना डे जी से ------------------------------------------------------ कोई दस बारह साल पुरानी बात है , मैनें  बंगलौर में मन्ना डे जी से उनके निवास पर फिल्म संगीत पर  लंबी बात की थी । कई बातें उनसे जानी जैसे किसी  गीत की लोकप्रियता और उसके कालजई होने के पीछे कौन कौन से तत्व सबसे अहम भूमिका निभाते हैं । हिंदी फिल्म संगीत में आपकी दृष्टि से कौन हैं श्रेष्ठ गायक । उनके गाए  कई फिल्मी गीतों पर विस्तार से बात हुई  और उसी क्रम में " बरसात की रात " मशहूर कव्वाली "ना  तो कारवां  की तलाश है" पर भी कुछ सवाल पूछे थे जिसकी कल इस लेख के पहले भाग में पूरे 12 मिनट की कव्वाली के एक एक बंद  की विस्तृत विवेचना  का प्रयास किया था है मैनें। हालांकि लेख बड़ा हो जाने के कारण कम लोगों ने उसे पढ़ा । आज इस लेख के दूसरे भाग में  जानिए  इस कव्वाली से जुड़ी कुछ और रोचक बातें .... (ये बातचीत के सिर्फ कुछ अंश है ) प्रश्न : किसी फिल्मी गीत की लोकप्रियता और कालजई...

नन्दा ने की मनोजकुमार की मदद किस्सा tV से साभार

 मनोज कुमार जी ने कई हीरोइनों से मदद करने मांगी थी। लेकिन किसी ने मदद नहीं की। तब एक हीरोइन उनके लिए आगे आई थी। कौन थी वो हीरोइन? चलिए, मनोज कुमार जी के जन्मदिन के मौके पर ये कहानी भी जानते हैं। मनोज कुमार बॉलीवुड के उन सितारों में से एक रहे हैं जिन्होंने अपनी मेहनत के दम पर अपना मुकाम बॉलीवुड में बनाया है। अपनी एक्टिंग स्किल्स से मनोज कुमार ने भारत कुमार का खिताब हासिल किया। मनोज कुमार ना केवल एक शानदार अभिनेता हैं। बल्कि एक ज़बरदस्त इंसान भी हैं। फिल्म इंडस्ट्री के जानकार लोग कहते हैं कि मनोज कुमार बहुत बड़े दिल वाले हैं। जब वो फिल्म इंडस्ट्री में एक्टिव थे तो लोगों की खूब मदद भी किया करते थे। मगर एक वक्त ऐसा भी आया था जब मनोज कुमार को खुद भी मदद की ज़रूरत पड़ी थी। ऐसे में अभिनेत्री नंदा उनकी मदद के लिए आगे आई थी। ये कहानी कई साल पुरानी है। बात मनोज कुमार की फिल्म शोर की मेकिंग के दौरान की है। दरअसल, फिल्म की कहानी के मुताबिक फिल्म शुरू होने के कुछ ही देर बाद हीरोइन की मौत हो जानी थी। कोई भी हीरोइन ये रोल करने के लिए तैयार नहीं थी। मनोज कुमार ने कई अभिनेत्रियों से बात की। लेकिन क...

किशोर दा गोल्डन एरा से साभार

 जावेद अख्तर   साहब ने बताया कि जब किशोर दा ने यह गाना गाया, तो वे हैरान रह गए। उन्होंने कहा, तब मैंने जाना कि किशोर कुमार आखिर किशोर कुमार ही है। फिल्म ‘सागर’ में कमल हसन, डिंपल कपाड़िया और ऋषि कपूर लीड रोल में थे। ऋषि कपूर के लिए किशोर कुमार और कमल हसन के लिए बालासुब्रमण्यम गा रहे थे। 'सागर' फिल्म के गाने को रिकाॅर्ड करने से पहले किशोर दा को हार्ट अटैक आया था। किशोर कुमार हिंदी सिनेमा के ऐसे गायक थे, जिनके हुनर की कोई सीमा नहीं थी। उन्होंने गायकी के साथ एक्टिंग की दुनिया में भी अपनी चमक बिखेरी। वहीं, 1985 में रिलीज हुई फिल्म ‘सागर’ में कमल हसन, डिंपल कपाड़िया और ऋषि कपूर लीड रोल में थे। फिल्म का एक गाना 'यूं ही गाते रहो' कमल हसन और ऋषि कपूर के बीच फिल्माया गया था। ऋषि कपूर के लिए किशोर दा और कमल हसन के लिए बालासुब्रमण्यम साहब गा रहे थे। जावेद अख्तर ने इस फिल्म का एक किस्सा सुनाते हुए बताया था कि उस समय टेक्निक इतनी विकसित हो गई थी कि अगर दो लोग एक गाने को गा रहे हैं, तो वे अपने हिसाब से कभी-भी आते थे और गाकर चले जाते थे। गाने को रिकॉर्ड करने के लिए दोनों का एक साथ होन...

गीतकार मुकेश किस्सा tv से साभार

 उस ज़माने में डीजे तो हुआ नहीं करते थे। इसलिए मुकेश जी को बारात का मनोरंजन करने के लिए कहा गया। इनसे कहा गया कि तुम बहुत गाते हो ना। चलो आज कुछ गाने गाओ। उस दिन मुकेश जी की बहन की शादी थी। ज़ाहिर है, वो इन्कार नहीं कर सकते थे। मुकेश जी ने गाना शुरू किया। और उन्होंने के.एल.सहगल साहब का एक गाना गाया। उस शादी में मुंबई(तब बॉम्बे) से भी दो लोग शिरकत करने आए थे। सारी रात गाना-बजाना होता रहा। अगली सुबह बारात विदा होने के बाद बॉम्बे से आए वो दोनों आदमी मुकेश जी के पिता से मिले। उन्होंने मुकेश जी के पिता से कहा कि आपका बेटा तो बहुत अच्छा गाता है। ये तो बहुत अच्छा गायक बन सकता है। अब मुकेश जी के पिता ठहरे सीधे-सादे आम इंसान। उन्हें समझ ही नहीं आया कि ये लोग कहना क्या चाह रहे हैं। उन्होंने हैरत से उन दोनं आदमियों को देखा। फिर मुकेश जी से पूछा कि ये लोग कौन हैं और क्या चाहते हैं? मुकेश जी ने उन्हें बताया कि ये फिल्मी दुनिया के लोग हैं और बहुत मशहूर हैं। उन दोनों में से एक मुकेश जी के पिता से बोला,"आप इसे हमारे साथ फिल्मों में काम करने भेज दीजिए। ये सहगल से भी ज़्यादा नाम कमाएगा।" उस दौ...

साधना की झिझक

 साधना जी बड़ी कनफ्यूज़्ड थी। वो फैसला नहीं कर पा रही थी कि एच.एस.रवैल साहब ने उन्हें जो फिल्म ऑफर की है उसमें काम करना चाहिए कि नहीं करना चाहिए। क्योंकि एच.एस.रवैल की फिल्म रूप की रानी चोरों का राजा, जिसमें वहीदा रहमान और देव आनंद थे, वो बुरी तरह फ्लॉप हो चुकी थी। साधना जी ऋषिकेश मुखर्जी के पास पहुंची। उन्होंने अपनी कशमकश से ऋषि दा को अवगत कराया। ऋषि दा ने साधना जी से कहा,"तुम ये फिल्म बेझिझक साइन कर लो। क्योंकि इसमें राजेंद्र कुमार हीरो है। और राजेंद्र कुमार खराब स्क्रिप्ट्स साइन नहीं करता है। मतलब कि फिल्म अच्छी होगी।" ऋषि दा की बात मानते हुए साधना जी ने राजेंद्र कुमार जी के अपोज़िट बतौर हीरोइन वो फिल्म साइन कर ली। फिल्म रिलीज़ हुई तो दर्शकों ने फिल्म की खूब तारीफें की। और बॉक्स ऑफिस पर वो फिल्म ब्लॉक बस्टर साबित हुई। उस फिल्म का नाम था मेरे महबूब, जो साल 1966 में रिलीज़ हुई थी। आज राजेंद्र कुमार जी की पुण्यतिथि है। 12 जुलाई 1999 को 69 साल की उम्र में राजेंद्र कुमार जी का निधन हुआ था। आज राजेंद्र कुमार जी के बारे में कुछ दिलचस्प बातें जानते हैं। संगीतकार नौशाद जब फिल्म मेर...

पाकीज़ा कौन थी ? 😊

  अधिकतर दर्शक यही समझते हैं - इस सिनेमा में मीना कुमारी ही पाकीज़ा हैं - बल्की कहानी कुछ और है - बकौल कमाल अमरोही के पुत्र :  सिनेमा के अंतिम दृश्यों में - जब राजकुमार मीना कुमारी को इज्जत के साथ विदा कर के ले जाते हैं - उसी दृश्य में - एक छोटी सी टीनएजर लड़की पर कैमरा फोकस करता है - वो लड़की बारात को देख बहुत खुश होती है - उसे लगता है एक दिन उसके लिए भी बारात आयेगी और वो भी मीना कुमारी की तरह हंसी खुशी विदा लेगी - पर ऐसा नहीं है - वो लड़की अब बस चंद दिनों में कोठे पर नाचने को थी ।  इस सिनेमा के एडिटर डी एन पाई ने लगभग इस दृश्य को उड़ा दिया था - जब कमाल अमरोही को पता चला - वो पाई साहब को समझाए - पाई साहब बोले - "यही लड़की पाकीज़ा है ..यह बात कौन समझेगा ? " कलाम अमरोही बोले - " अगर एक आदमी भी समझ गया - यही लड़की पाकीज़ा है - समझो मेरी मेहनत पुरी हुई - दिल को तसल्ली मिलेगी " .. 😊 लगभग एक साल बाद - कमाल अमरोही को एक दर्शक का ख़त आया - जिसमे उस मासूम लड़की के पाकीज़ा होने का ज़िक्र था ! कमाल आरोही ने पाई साहब को बुलाया और ख़त दिखाया ...🙂 फिर उस दर्शक को पुरे देश के सिनेमा हॉल के ल...