फ़िल्म ‘आनंद’ की हीरोइन सुमिता सान्याल
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फ़िल्म ‘आनंद’ की हीरोइन सुमिता सान्याल को ऋषिकेश मुखर्जी इस फ़िल्म में दिलीप कुमार की सिफारिश पर मौक़ा दिया था, बहुत गिनती के लोगों को ही ये राज़ पता है। ये वह दौर है जब दिलीप कुमार अपने करियर की इकलौती बांग्ला फ़िल्म ‘सगीना महतो’ में काम कर रहे थे और इसी फ़िल्म की शूटिंग के दौरान उनकी मुलाकात हुई दमदार अदाकारा सुमिता सान्याल से।
सुमिता सान्याल को निर्देशक ऋषिकेश मुखर्जी ने इसके पहले फ़िल्म ‘गुड्डी’ में भी मौका दिया। ‘गुड्डी’ में पहले अमिताभ बच्चन भी काम कर रहे थे, लेकिन फ़िल्म ‘आनंद’ में कहीं उनका किरदार इसके चलते कमज़ोर न पड़ जाए, इसीलिए ऋषिकेश मुखर्जी ने फ़िल्म ‘गुड्डी’ से अमिताभ बच्चन की छुट्टी कर दी थी।
सुमिता सान्याल फ़िल्म ‘आनंद’ में अमिताभ बच्चन के साथ नज़र आईं और जिस साल 1971 में ये फ़िल्म रिलीज़ हुई, उसी साल वह फ़िल्म ‘गुड्डी’ और फ़िल्म ‘मेरे अपने’ में भी दिखीं। लेकिन, कम लोगों की पता होगा कि सुमिता सान्याल की पहली हिंदी फ़िल्म ‘आशीर्वाद’ थी जो साल 1969 में ही रिलीज़ हो चुकी थी।
अमिताभ बच्चन की हीरोइन बनने का मौक़ा पाने वाली कई अभिनेत्रियां ऐसी हैं, जिनके साथ उनकी जोड़ी बस एक फ़िल्म भर को ही बनी। अमिताभ की पहली फ़िल्म ‘सात हिंदुस्तानी’ की नायिका का नाम जानते हैं आप? शहनाज़ वाहनवती। जलाल आग़ा की बहन थीं वो, जो आगे चलकर अभिनेता-निर्देशक टीनू आनंद की पत्नी भी बनीं।
दिलचस्प ये भी है कि अमिताभ को इस फ़िल्म में वही किरदार मिला जो पहले टीनू आनंद करने वाले थे, टीनू आनंद ये फ़िल्म इसलिए छोड़कर चले गए थे क्योंकि उन्हें निर्देशक सत्यजीत रे के साथ सहायक निर्देशक बनने का मौक़ा मिल रहा था।
फ़िल्म ‘बॉम्बे टू गोवा’ का ‘बाइस्कोप विद पंकज शुक्ल’ आप पढ़ ही चुके हैं कि कैसे इस फ़िल्म में अमिताभ बच्चन की हीरोइन बनीं अरुणा ईरानी को इस फ़िल्म का कोई लाभ नहीं हुआ और अरसे तक हीरोइनों के किरदारों का इंतज़ार करने के बाद उन्होंने चरित्र भूमिकाएं करनी शुरू कर दीं।
ख़ैर, हम लौटते हैं सुमिता सान्याल और दिलीप कुमार के क़िस्से की तरफ़।
ये तो आप जानते ही होंगे कि निर्देशक ऋषिकेश मुखर्जी की बतौर निर्देशक पहली फ़िल्म ‘मुसाफ़िर’ के हीरो दिलीप कुमार ही थे। ऋषिकेश मुखर्जी ने उस दौर के त्रिदेव कहलाने वाले दिलीप कुमार, राज कपूर और देव आनंद, तीनों को अपनी फ़िल्मों में निर्देशित किया। बाद में, धर्मेंद्र, अमिताभ बच्चन और राजेश खन्ना को भी उन्होंने अपनी फ़िल्मों में ऐसे किरदार किए जो आज तक याद किए जाते हैं।
दिलीप कुमार और ऋषिकेश मुखर्जी के बीच अक्सर सिनेमा को लेकर ख़ूब बातें होती थीं। जब दिलीप कुमार अपनी पहली और आख़िरी बांग्ला फ़िल्म की शूटिंग कर रहे थे, तो अक्सर ऋषिकेश मुखर्जी से वह अपने किरदार के बारे में सलाह-मशविरा करते। ऐसे ही एक दिन उन्होंने बातों ही बातों में सुमिता सान्याल का ज़िक्र कर दिया।
ऋषिकेश मुखर्जी जानते थे कि फ़िल्म ‘सगीना महतो’ की हीरोइन तो सायरा बानो ही हैं, और उनके होते हुए अगर दिलीप कुमार किसी दूसरी अभिनेत्री की तारीफ़ कर रहे हैं तो ज़रूर उसमें कुछ बात होगी।
सुमिता सान्याल के नाम से तो ऋषिकेश मुखर्जी पहले से ही परिचित थे, लेकिन उनके काम की तरफ़ उनका ध्यान इस बातचीत के बाद ही गया। फ़िल्म ‘आनंद’ का गाना “ना जिया लागे ना..” सुमिता सान्याल पर ही फ़िल्माया गया है। अमिताभ बच्चन के किरदार भास्कर चटर्जी के साथ उनका गुलू गुलू फ़िल्म में चलता रहता है।
9 अक्टूबर 1945 को दार्जिलिंग की पहाड़ियों में जन्मी सुमिता सान्याल का असली नाम मंजुला सान्याल है। दार्जिलिंग की धुंध, चाय के बागान और पहाड़ी हवाओं के बीच पली-बढ़ी यह लड़की आगे चलकर बंगाल के सिनेमा परदे पर अपनी अलग पहचान बनाएगी, यह उस समय शायद किसी ने सोचा भी नहीं था। उनके पिता थे गिरिजा गोलकुंडा सान्याल और परिवार का माहौल संस्कारों और शिक्षा से भरा हुआ था।
सुमिता के सिनेमा तक पहुंचने की कहानी भी कम फ़िल्मी नहीं है। मशहूर अभिनेत्री लीला देसाई ने उनका परिचय निर्देशक बिभूति लाहा से कराया जिन्होने उनका नाम मंजुला से बदलकर सुचोरिता रखा। बाद में, निर्देशक कनक मुखोपाध्याय ने इसे और छोटा और सुरीला बनाकर सुमिता कर दिया।
सुमिता को पहली ही फ़िल्म में उनके बांग्ला सिनेमा के महानायक उत्तम कुमार के साथ काम करने का मौक़ा मिला। इसके बाद उन्होंने बंगाली सिनेमा की चालीस से अधिक फ़िल्मों में काम किया। इसमें ‘सगीना महतो’ जैसी चर्चित फ़िल्म भी शामिल है और इसी फ़िल्म ने उनके रास्ते हिंदी सिनेमा के लिए खोले।
सिनेमा के अलावा सुमिता सान्याल का रिश्ता रंगमंच से भी गहरा था। पेशेवर मंच, समूह रंगमंच और नाट्य संस्था रंग सभा के साथ उनका लंबा जुड़ाव रहा। उन्होंने टेलीविजन धारावाहिकों में भी काम किया।
−पकज शुक्ला
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