क्या कर रहे हो देव?
क्या कर रहे हो देव?" ट्रेन के भीतर से आती एक आवाज़ देव साहब के कानों में पड़ी। वो तब ट्रेन में सवार होने ही जा रहे थे। उन्होंने आवाज़ देने वाले की तरफ देखा। वो नामी उर्दू लेखक और फिल्म डायरेक्टर(उस वक्त तक डायरेक्टर नहीं बने थे) शाहिद लतीफ थे। उनकी पत्नी इस्मत चुग़ताई भी तब उनके साथ ही थी। शाहिद लतीफ ने फिर से पूछा,"क्या कर रहे हो?" "ट्रेन पकड़ रहा हूं।" देवानंद ने हंसते हुए जवाब दिया। शाहिद लतीफ ने मुस्कुराकर अगला सवाल पूछा,"काम क्या कर रहे हो?" देव साहब ने उन्हें बताया कि वो फिल्मों में काम कर रहे हैं। फिर शाहिद लतीफ ने देवानंद से कहा कि कल बॉम्बे टॉकीज़ आ जाओ। "कुछ स्पेशल है?" देवानंद ने उनसे पूछा। वो बोले,"तुम बस आ जाओ।" देवानंद ने इस्मत चुगताई की तरफ देखा। उन्होंने भी देवानंद को बॉम्बे टॉकीज़ आने को कहा। देवानंद ने समय पूछा तो शाहिद लतीफ ने कहा कि 11 बजे के बाद कभी भी आ जाना। अगले दिन देवानंद बॉम्बे टॉकीज़ पहुंच गए। उस दिन पहली दफा देवानंद बॉम्बे टॉकीज़ में घुसे थे। ज़ाहिर है वहां का नज़ारा उनके लिए किसी जादू से कम नहीं था। ...