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Showing posts from February, 2025

फिराक गोरखपुरी

 दूर कहीं सितारों में आज भी शाम होते ही फ़िराक़ साहब, रमेशचंद द्विवेदी के साथ कॉफ़ी पीने निकल जाते होंगे। उन के वो सारे दोस्त जो यहां 50-60 के दशक में साथ रहा करते थे, अब वहां किसी बेंच पर बैठे सवाल पूछ-पूछ कर उनसे घण्टों बातें किया करते होंगे। फ़िराक़ अपने रोबीले अंदाज़ में सिगरेट फूंकते हुए कहते होंगे, " गुज़ारिश है ज़रा सुनिए तो।" नेतराम के अगर पुराने रजिस्टर खोले जाएं तो ज़रूर फ़िराक़ साहब के घर गई कचौड़ियों के हिसाब मिल जाएंगे। उनका माली कहीं आज भी गुलाब खिला रहा होगा। उन के घर शायद अब भी वो अघोरी आता होगा जिसके पीर फ़िराक़ साहब के शे'र गुनगुनाया करते थे।  वो जादूगर ग़ज़ल में शब्दों की ऐसी तरतीब सेट करता मानो शब्द ज़मीन पर पैर पटकते हुए चल रहे हों।  वो नज़र-नज़र की फ़सूंगरी वो सुकूत की भी सुख़नवरी। तेरी आँख जादू-ए-सामरी तेरे लब फ़साना-ए-नल-दमन।। फ़िराक़ की ग़ज़लों में जदीदियत तो बला की थी ही इसके साथ-साथ क्लासिकल शायरी की नींव ज़बरदस्त मजबूती से ग़ज़ल की इमारत को थामे थी। यूँ ही नहीं नासिर काज़मी इन्तिज़ार हुसैन साहब को फ़िराक़ साहब के शे'र सुनाया करते थे। इनका मेरा एक पसंदीदा शे'र  - "...

लताजीओर_राजसिंह

 #प्रिंसेज_ऑफ_डूंगरपुर #लताजी_ओर_राजसिंह लता मंगेशकर नहीं रहीं...वे भारत में किवदंतियों की तरह रहीं...!! नेहरूजी ने बड़ी आत्मीयता से 'स्वर कोकिला' की उपाधि लता मंगेशकर को दी थी, लेकिन लताजी को जिस टाइटल की सबसे ज्यादा चाहत थी वो था  'प्रिंसेज ऑफ डूंगरपुर'....वही डूंगरपुर जो राजस्थान की एक रियासत थी.... प्रसिद्ध क्रिकेटर और भारतीय क्रिकेट टीम के मैनेजर, बीसीसीआई के अध्यक्ष रहे राज सिंह डूंगरपुर के साथ लताजी के खास रिश्तों की चर्चा सोशलाइट और संगीत की दुनिया में बड़े अदब के साथ की जाती है...!!! बीकानेर की राजकुमारी राज्यश्री, जो डूंगरपुर की बहन की बेटी हैं, अपनी आत्मकथा 'पैलेस ऑफ क्लाउड्स- ए मेमॉयर' (ब्लूम्सबरी इंडिया 2018) में लिखती हैं कि दोनों की मुलाकात क्रिकेट के लिए दीवाने लता के भाई हृदयनाथ मंगेशकर के जरिए हुई थी.... हृदयनाथ मंगेशकर और डूंगरपुर में दोस्ती थी, फिर इसी दोस्ती में लता की एंट्री हुई और उनकी मुलाकात राज सिंह डूंगरपुर से हुई. इस रिश्ते पर न सिर्फ डूंगरपुर के शाही घराने की नजर टेढ़ी थी बल्कि डूंगरपुर खानदान से जुड़े दूसरे राज परिवार भी इस रिश्ते क...

मौत एक ख्याल है जैसे ज़िंदगी एक ख्याल है" भारती गौड़ की वॉल से

 " हिंदी सिनेमा में मील का पत्थर साबित हुई फिल्म 'गाइड' मेरे शहर उदयपुर की दिलकश वादियों में रचाई गई थी। अरावली की गोद में बसा एक शहर जिसकी बाहों में मैं पली बढ़ी। राजस्थान का कश्मीर।  झीलों की नगरी, पानी, पत्थर पहाड़ों की पुरी, फाउंटेन व माउंटेन का शहर और ना जाने कितने नामों से नवाज़े गए  मेरे इस शहर में बनी ये फिल्म गाइड। खैर उदयपुर की बात फिर कभी। लेखक आर के नारायण के उपन्यास 'द गाइड' पर बनी फ़िल्म गाइड 1965 में विजय आनंद द्वारा निर्देशित, देव आनंद, वहीदा रहमान की नायाब अदाकारी और एस डी बर्मन के सुरमई संगीत की वजह से अप्सराओं की मानिंद हर दिन बस जवान और खूबसूरत ही हुई है। इस फिल्म की कोई शुरुआत नहीं कोई अंत नहीं। ये सदा बीच से ही मालूम जान पड़ेगी। इसकी कहानी पर बात करना तो यूँ ही होगा, क्योंकि मेरी समझ में इस फिल्म को ना देखने वालें गिनती के ही होंगे। ख़ासकर वो तो बिल्कुल ही नहीं जो फ़िल्मों से और वो भी ऐसी फ़िल्मों से अनछुए रहते हों। लिहाज़ा आगे का पढ़ना गाइड फ़िल्म नहीं देखने वालों के किसी काम का नहीं। साथ में बहने के लिए आपको साथ ही उतरना होता है।  "वहाँ कौन है ते...