फिराक गोरखपुरी
दूर कहीं सितारों में आज भी शाम होते ही फ़िराक़ साहब, रमेशचंद द्विवेदी के साथ कॉफ़ी पीने निकल जाते होंगे। उन के वो सारे दोस्त जो यहां 50-60 के दशक में साथ रहा करते थे, अब वहां किसी बेंच पर बैठे सवाल पूछ-पूछ कर उनसे घण्टों बातें किया करते होंगे। फ़िराक़ अपने रोबीले अंदाज़ में सिगरेट फूंकते हुए कहते होंगे, " गुज़ारिश है ज़रा सुनिए तो।" नेतराम के अगर पुराने रजिस्टर खोले जाएं तो ज़रूर फ़िराक़ साहब के घर गई कचौड़ियों के हिसाब मिल जाएंगे। उनका माली कहीं आज भी गुलाब खिला रहा होगा। उन के घर शायद अब भी वो अघोरी आता होगा जिसके पीर फ़िराक़ साहब के शे'र गुनगुनाया करते थे। वो जादूगर ग़ज़ल में शब्दों की ऐसी तरतीब सेट करता मानो शब्द ज़मीन पर पैर पटकते हुए चल रहे हों। वो नज़र-नज़र की फ़सूंगरी वो सुकूत की भी सुख़नवरी। तेरी आँख जादू-ए-सामरी तेरे लब फ़साना-ए-नल-दमन।। फ़िराक़ की ग़ज़लों में जदीदियत तो बला की थी ही इसके साथ-साथ क्लासिकल शायरी की नींव ज़बरदस्त मजबूती से ग़ज़ल की इमारत को थामे थी। यूँ ही नहीं नासिर काज़मी इन्तिज़ार हुसैन साहब को फ़िराक़ साहब के शे'र सुनाया करते थे। इनका मेरा एक पसंदीदा शे'र - "...